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लॉ इन द मेकिंग : मोटर वाहन संशोधन विधेयक, 2017

  • 29 Nov 2018
  • 23 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि


मोटर वाहन संशोधन विधेयक, 2017 मौजूदा 1988 के अधिनियम में व्यापक संशोधन के लिये लाया गया है। यह सड़क सुरक्षा, मुआवज़ा और बीमा, टैक्सी एग्रीगेटर्स के विनियमन तथा वाहनों के रिकॉल जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बात करता है। यह संशोधन विधेयक सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा 9 अगस्त, 2016 को लोकसभा में पेश किया गया। लोकसभा की स्थायी समिति तथा चयन समिति द्वारा विधेयक के परीक्षण के पश्चात् लोकसभा ने इसे 2017 में पारित किया जिसे मंज़ूरी के लिये राज्यसभा में भेजा गया है। संसद के शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को चर्चा के लिये पेश किया जाएगा।

  • यह अधिनियम मोटर वाहनों के लिये मानकों का प्रावधान करता है। साथ ही ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने और इन प्रावधानों के उल्लंघन करने के संबंध में दंड का प्रावधान भी करता है।
  • उल्लेखनीय है कि अंतर्राष्ट्रीय सड़क संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 12.5 लाख लोग प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं और इसमें भारत की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज़्यादा है।

सड़क सुरक्षा पर समिति की रिपोर्ट

  • अंतर्राष्ट्रीय सड़क संगठन के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल सड़क दुर्घटनाओं की वज़ह से बारह लाख लोग मारे जाते हैं और करीब पचास लाख लोग प्रभावित होते हैं। इनमें करीब बारह फीसदी हादसे केवल भारत में होते हैं, जो दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं।
  • भारत में बढ़ते वाहनों के कारण सड़क दुर्घटनाएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। वर्ष 2007 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने सड़क सुरक्षा पर एक समिति गठित की जिसने अपनी रिपोर्ट में केंद्र और राज्य स्तर पर रोड सेफ्टी अथॉरिटी गठित करने का सुझाव दिया था।
  • वर्ष 2016 में राज्य परिवहन मंत्रियों के एक समूह ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में संशोधन का सुझाव दिया था ताकि सड़क सुरक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों को हल किया जा सके।
  • तद्नुसार मोटर वाहन संशोधन विधेयक में अनेक उपायों को अपनाने पर सुझाव दिया गया है।
  • वर्तमान में मोटर वाहन अधिनियम में 223 धाराएँ हैं जिनमें से 68 धाराओं में संशोधन करना इस विधेयक का लक्ष्य है।
  • इसमें अध्याय 10 को हटा दिया गया है और अध्याय 11 को नए प्रावधानों से बदला गया है ताकि तीसरे पक्ष के बीमा दावों और निपटान की प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके।

मोटर वाहन संशोधन विधेयक, 2017 : प्रमुख प्रावधान
इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं-


1. राष्ट्रीय परिवहन नीति

  • विधेयक में केंद्र सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह राज्यों के साथ विचार-विमर्श कर राष्ट्रीय परिवहन नीति तैयार करेगी।
  • इस नीति के तहत सड़क परिवहन के लिये योजना संबंधी तंत्र, परमिट देने और योजनाओं के लिये तंत्र विकसित करना तथा सड़क परिवहन प्रणाली के लिये प्राथमिकताओं को चिन्हित करना शामिल है।

2. दुर्घटना के शिकार लोगों की देखभाल

  • केंद्र सरकार द्वारा ‘गोल्डन आवर’ के दौरान सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों का कैशलेस उपचार करने की एक योजना विकसित की जाएगी।
  • विधेयक के अनुसार, ‘गोल्डन आवर’ घातक चोट लगने के बाद की वह समयावधि होती है जब तुरंत मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराकर मौत की संभावना को कम किया जा सके।

3. वाहनों का रिकॉल

  • विधेयक केंद्र सरकार को ऐसे मोटर वाहनों को रीकॉल (वापस लेने) करने का आदेश देने की अनुमति देता है, जैसे-कोई ऐसी खराबी जो पर्यावरण या ड्राइवर या सड़क का प्रयोग करने वाले लोगों को नुकसान पहुँचा सकती है।
  • अगर केंद्र सरकार को वाहन में खराबी की सूचना मिलती है तो वाहन को रीकॉल किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वाहन निर्माता को खरीदार को वाहन की पूरी कीमत लौटानी होगी या ख़राब वाहन को दूसरे वाहन (जो कि समान या बेहतर विशेषताओं वाला हो) से बदलना होगा।

4. हिट एंड रन के मामले

  • विधेयक में हिट एंड रन जैसे मामलों में मृत्यु होने पर मुआवज़ा राशि 25,000 रुपए से बढ़ाकर दो लाख रुपए या उससे अधिक (जैसा कि केंद्र सरकार प्रस्तावित करेगी) करने का प्रावधान है।

5. मोटर वाहन दुर्घटना कोष

  • विधेयक में केंद्र सरकार से मोटर वाहन दुर्घटना कोष बनाने की अपेक्षा की गर्ई है। यह कोष भारत में सड़कों का प्रयोग करने वाले सभी लोगों को अनिवार्य बीमा कवर प्रदान करेगा।

6. एग्रीगेटर सेवाएँ

  • विधेयक एग्रीगेटर को डिजिटल इंटरमीडियरी या मार्केट प्लेस के रूप में परिभाषित करता है। इसके अंतर्गत टैक्सी हीलिंग एप लाए जाने की बात कही गई है।
  • परिवहन के उद्देश्य से ड्राइवर से कनेक्ट होने के लिये यात्री एग्रीगेटर जैसी सेवाओं का इस्तेमाल कर सकता है। इन एग्रीगेटरों को लाइसेंस लेना होगा तथा इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 का अनुपालन करना होगा।
  • विधेयक में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के गाइडलाइन के तहत एग्रीगेटर को लाइसेंस देने का अधिकार दिया गया है।

7. नेक व्यक्तियों (गुड समैरिटन) का संरक्षण

  • विधेयक के अनुसार, नेक व्यक्ति (गुड समैरिटन) वह होता है जो दुर्घटना के समय पीड़ित को आपातकालीन मेडिकल या नॉन मेडिकल मदद देता है।
  • ऐसा व्यक्ति दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को किसी प्रकार की चोट लगने या उसकी मृत्यु होने की स्थिति में किसी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही के लिये उत्तरदायी नहीं होगा।
  • केंद्र सरकार नियमों द्वारा उससे पूछताछ करने या व्यक्तिगत सूचना का खुलासा करने से संबंधित प्रकियाओं का प्रावधान कर सकती है।

8. परिवहन योजनाएँ

  • विधेयक में राज्य सरकारों से अपेक्षा की गई है कि वे विशिष्ट उद्देश्यों को पूरा करने वाली परिवहन योजनाएँ बनाएंगे।
  • इनमें अंतिम स्थान से कनेक्टिविटी, ट्राफिक की भीड़-भाड को कम करना तथा सड़क का प्रयोग करने वालों की सुरक्षा शामिल है।

9. इलेक्ट्रॉनिक सेवाएँ

  • विधेयक में कुछ सेवाओं के कंप्यूटरीकरण का प्रावधान किया गया है। इनमें शामिल हैं- लाइसेंस या परमिट जारी करना, फॉर्म या आवेदन-पत्र भरना (जैसे-लाइसेंस और पंजीकरण), धन की प्राप्ति (ज़ुर्माना) तथा पता बदलना।
  • राज्य सरकार को राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों और शहरी सड़कों पर सड़क सुरक्षा के लिये इलेक्ट्रॉनिक निरीक्षण और प्रवर्तन सुनिश्चित करना होगा।
  • केंद्र सरकार ऐसे निरीक्षण के लिये नियम बनाएगी।

10.ड्रंक ड्राइविंग

  • विधेयक में अधिनियम के तहत विभिन्न अपराधों के लिये दंड को बढ़ाया गया है।
  • उदाहरण के लिये शराब या ड्रग्स के नशे की हालत में वाहन चलाने के लिये अधिकतम दंड 2,000 रुपए से बढ़ाकर 10,000 रुपए किया गया है।

11. वाहन निर्माण में खराबी

  • अगर मोटर वाहन मैन्युफैक्चरर मोटर वाहनों के निर्माण या रख-रखाव के मानदंडों का अनुपालन करने में असफल रहता है तो अधिकतम 100 करोड़ रुपए तक का दंड या एक वर्ष तक का कारावास या दोनों सज़ा दी जा सकती है।

12. किशोरों के अभिभावकों का उत्तरदायित्व

  • विधेयक में किशोरों द्वारा किये जाने वाले अपराधों को भी संज्ञान में लिया गया है।
  • ऐसे मामलों में किशोरों के अभिभावक या मोटर वाहन के मालिक तब तक उत्तरदायी माने जाएंगे जब तक कि वे यह साबित न कर दें कि अपराध अभिभावक की जानकारी के बिना किया गया था या उन्होंने अपराध को रोकने के लिये सम्यक तत्परता बरती थी।

ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता

  • मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अंतर्गत ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता इसके जारी होने की तिथि से 20 वर्ष तक वैध होती है या लाइसेंस धारक की आयु 50 वर्ष पूरी होने तक होती है।
  • 50 साल की आयु पूरी कर लेने के पश्चात् लाइसेंस की वैधता 5 साल के लिये बढाई जा सकती है।
  • वर्तमान विधेयक में लाइसेंस की अग्रिम वैधता के लिये 7 श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं।
  • 30 से 50 साल की आयु के बीच के धारक का लाइसेंस 10 वर्ष के लिये वैध होगा।
  • 50 से 55 साल की आयु के बीच के धारक का लाइसेंस 60 साल की आयु तक वैध होगा।
  • 55 साल की आयु के बाद इसकी वैधता 5 वर्ष के लिये होगी। विधेयक में ड्राइविंग लाइसेंस के मामले में कंप्यूटराइजेशन, परमिट तथा पेमेंट ऑफ़ फाइन को आवश्यक बनाया गया है।
  • लर्निंग लाइसेंस के लिये टेस्ट की विडीयो रिकॉर्डिंग अनिवार्य बनाई गई है। अतः बिना टेस्ट के ड्राइविंग लाइसेंस जारी नहीं हो सकता।

यह विधेयक महत्त्वपूर्ण क्यों है तथा भारत के नागरिकों पर इसका क्या प्रभाव होगा?

  • देश में पिछले दशकों में लाखों की संख्या में लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए हैं। देश में प्रतिदिन 400 से अधिक मौतें सड़क दुर्घटनाओं के कारण होती हैं जो किसी महामारी से कम नहीं है।
  • दुर्भाग्य से मोटर वाहन अधिनियम, 1988 ट्रांसपोर्टेशन तथा सुरक्षा पहलुओं पर खरा नहीं उतर पाया है। इसलिये मौजूदा विधेयक में ऐसे कई प्रावधान जोड़े गए हैं जो 1988 के अधिनियम में नहीं थे।
  • उदाहरण के लिये 1988 के अधिनियम में किशोरों की सुरक्षा के संबंध में कोई प्रावधान नहीं है।
  • हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर गाइडलाइन तैयार की है फिर भी भारत में प्रतिदिन 14 वर्ष से कम आयु के 20 बच्चे सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं।
  • विधेयक की मंशा हेलमेट का प्रयोग, बच्चों पर प्रतिबंध संबंधी तंत्र और वयस्क जवाबदेही तंत्र की शुरुआत कर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
  • दोषपूर्ण सड़कों की वज़ह से अक्सर सड़क दुर्घटनाएँ देखने को मिलती हैं। पहली बार देश के इतिहास में रोड डिज़ाइनिंग इंजीनियरिंग को दोषपूर्ण सडकों के लिये ज़िम्मेदार ठहराया गया है।
  • देश में सडकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। 2005 से 2015 के बीच देश में सडकों की लम्बाई में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
  • सड़कों की संख्या जितनी ही बढ़ेगी उतनी ही तेज़ी से वाहन भी सडकों पर आएंगे तथा सड़क दुर्घटनाओं की संख्या भी उतनी ही बढ़ेगी। लेकिन उसी गति से दुर्घटनाएँ रोकने के लिये कारगर कदम नहीं उठाया जा सका है।
  • इंजीनियरिंग पहलू को देखें तो यह रोड के डिज़ाईन तथा सड़क पर ट्रैफिक मैनेजमेंट योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये ज़िम्मेदार है। इस पहलू का पूर्व के विधेयक में विस्तृत रूप से प्रावधान नहीं किया गया है।
  • किंतु इस विधेयक में रोड डिज़ाइनर, कंसल्टेंट्स तथा स्टेकहोल्डर एजेंसी को डिज़ाइन तथा ऑपरेशन के लिये उत्तरदायी बनाया गया है।
  • निश्चित रूप से इस विधेयक से सड़कों को और अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी।

सड़कों के डिज़ाइन में क्या बदलाव किये जाने की ज़रूरत है?

  • मई 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सड़क दुर्घटना के कारण चोट लगने और दुनिया भर में होने वाली मौतों की तेजी से बढ़ती संख्या को देखते हुए वर्ष 2011-2020 तक के लिये सड़क सुरक्षा कार्यवाही की घोषणा की।
  • इसका लक्ष्य "2020 तक वैश्विक सड़क यातायात दुर्घटना में मृत्यु के आँकड़े को स्थिर करना या फिर कम करना" है।
  • इसमें पाँच फोकस पिलर निर्धारित किये गए हैं:
  1. सड़क सुरक्षा प्रबंधन
  2. सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर
  3. सुरक्षित वाहन
  4. सड़क उपयोगकर्त्ताओं का व्यवहार
  5. दुर्घटना के बाद प्रतिक्रिया
  • सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर के लिये डिज़ाइनर, इंजीनियर तथा ट्रैफिक मैनेजर की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। किसी भी तरह की दुर्घटना में रोड उपयोगकर्त्ताओं को भुक्तभोगी नहीं बनाया जाना चाहिये।
  • इसे सुनिश्चित करने के लिये सड़क सुरक्षा की अवधारणा के साथ सड़क के डिज़ाइन को ध्यान में रखना बेहद महत्त्वपूर्ण है।
  • हमें रोड सेफ्टी ऑडिट को लागू करना चाहिये। यह ऐसी अवधारणा है जिसके अंतर्गत एक स्वतंत्र पक्ष जो कि डिज़ाइनर या क्रियान्वयन एजेंसी नहीं है, क्रियान्वयन से पूर्व सुरक्षा से संबंधित सभी पहलुओं पर गौर करता है।
  • दुर्घटना के शिकार लोगों की सहायता तथा मुआवज़ा
  • जहाँ तक पीड़ितों की सहायता की बात है, तो इस विधेयक में सहायता के लिये आगे आने वाले नेक व्यक्तियों हेतु गाइडलाइन तय की गई है जो गेम चेंजर साबित होगी। यह बचावकर्त्ताओं को सहायता के लिये प्रोत्साहित करेगी।
  • विधि आयोग की 2001 की रिपोर्ट में कहा गया था कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले 50 प्रतिशत लोगों को समय पर इलाज मुहैया कराकर बचाया जा सकता है।
  • दूसरा पहलू मुआवज़ा है। वर्तमान में पीड़ित तथा उसके परिवार को मुआवज़ा प्राप्त करने के लिये लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती थी।
  • लेकिन वर्तमान विधेयक में दुर्घटना के तुरंत बाद पीड़ित परिवार को कुछ पैसे प्रदान कराने की व्यवस्था की गई है। उसके पश्चात् पीड़ित के लिये बीमा तथा मुआवज़े की कार्यवाही शुरू होगी।

देश में सेंट्रल ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम की ज़रूरत

  • देश में ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम तथा सेफ्टी सिस्टम के नियंत्रण के लिये एक केंद्रीय एजेंसी की सख्त आवश्यकता है जो सड़क के डिज़ाइन तथा बेहतर रोड के लिये उत्तरदायी हो।
  • परिवहन व्यवस्था राज्य का विषय है। इसलिये सड़क सुरक्षा से संबंधित कुछ कानूनों के क्रियान्वयन के लिये केंद्र का अधिक नियंत्रण नहीं होता है। ऐसी स्थिति में एक ऐसी केंद्रीय एजेंसी की आवश्यकता है जो पूरे देश में एक समान दिशा-निर्देश लागू करने में सक्षम हो।
  • जहाँ तक विभिन्न विभागों की ज़िम्मेदारी का सवाल है, तो यह ज़िम्मेदारी सबसे पहले सड़क निर्माण एजेंसी पर डालनी चाहिये क्योंकि उसी पर बेहतर एवं सुरक्षित रोड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने की ज़िम्मेदारी है।
  • दूसरी ज़िम्मेदारी ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी की है जो वाहनों की सुरक्षा, देखभाल तथा ड्राइविंग लाइसेंस ज़ारी करने के लिये उत्तरदायी है क्योंकि सुरक्षा तंत्र में ड्राइवर महत्त्वपूर्ण कड़ी होते हैं।
  • अतः चालकों को ड्राइविंग लाइसेंस उचित एवं पेशेवर तरीके से जारी किये जाने चाहिये। जब एक प्रशिक्षित ड्राइवर को उचित चैनल तथा न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के माध्यम से लाइसेंस जारी किया जाएगा तो योग्य एवं सुरक्षित ड्राइवर वाहनों का चालन कर सकेंगे जिससे दुर्घटनाएँ कम होगी।

आगे की राह

  • अप्रशिक्षित चालक को ड्राइविंग लाइसेंस देना उसके हाथ में हथियार देने के सामान है क्योंकि हथियार लोगों को मारने का ही काम करता है। अतः प्रशिक्षण तंत्र तथा मूल्यांकन तंत्र को बेहतर बनाए जाने की आवश्यकता है।
  • अक्सर देखा जाता है कि एक ही व्यक्ति के नाम विभिन्न प्रदेशों से कई-कई ड्राइविंग लाइसेंस जारी हो जाते हैं जो एक बहुत बड़ी चुनौती है। अतः ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को केंद्रीयकृत किये जाने की आवश्यकता है।
  • वर्तमान में ड्राइविंग लाइसेंस को बायोमेट्रिक सिस्टम के ज़रिये केंद्रीयकृत किये जाने का प्रयास किया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो कि एक व्यक्ति को केवल एक ही लाइसेंस जारी किया जा सके।
  • ड्राइविंग लाइसेंस को फिंगरप्रिंट तथा आईरिस स्कैन के साथ लिंक किया जाना चाहिये।
  • बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करते हुए लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिये।
  • जहाँ तक सुरक्षा का प्रश्न है, तो राज्य सरकारें इसके लिये समान रूप से ज़िम्मेदार हैं। इसलिये ड्राइविंग लाइसेंस तथा वाहन के रजिस्ट्रेशन में देश भर में एकरूपता होनी चाहिये।
  • किसी भी वाहन का पंजीकरण प्रमाण पत्र, डाटा तथा रजिस्ट्रेशन प्लेट ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाना चाहिये, साथ ही रजिस्ट्रेशन प्लेट देश भर में एक समान होनी चाहिये।
  • देश में सड़क इंजीनियरिंग की गुणवत्ता में आवश्यक सुधार अपेक्षित है, ताकि यह गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो सके।

निष्कर्ष


सड़क दुर्घटनाओं को रोकने हेतु एक मज़बूत पक्ष नागरिकों का राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को समझने और यातायात नियमों के समुचित पालन से जुड़ा है। देश में सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले रहम दिल लोगों को कानूनी सुरक्षा देकर, अन्य लोगों को भी घायलों के प्रति संवेदनशील बनने के लिये उन्हें प्रोत्साहित किये जाने की व्यवस्था इस विधेयक में की गई है जो काफी महत्त्वपूर्ण है। बढ़ते शहरीकरण और बढ़ते सड़क यातायात के बीच दुनिया में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में भारत में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक है और इस कारण यह मुद्दा और भी गंभीर बन गया है। देश में अधिकांश सड़क हादसे सड़क सुरक्षा के प्रति लापरवाही, यातायात नियमों के उल्लंघन और मानवीय चूक की वज़ह से होते हैं। सड़क हादसों को रोकना भी नागरिकों के हाथ में ही है। सरल यातायात नियमों का सहजता से पालन कर और वाहन चालकों और यात्रियों के बीच जागरूकता पैदा कर सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। मोटर वाहन संशोधन विधेयक, 2017 में ऐसे सभी कदम उठाए गए हैं जिससे सड़क हादसों में निश्चय ही कमी आएगी, ज़रूरत है इसे उचित तरीके से लागू करना।

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