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बोडो समझौता

  • 01 Feb 2020
  • 17 min read

संदर्भ

हाल ही में भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में दशकों से चले आ रहे आतंरिक संघर्ष पर विराम लगाने के लिये भारत सरकार, असम राज्य सरकार एवं बोडो समुदाय के बीच एक महत्त्वपूर्ण समझौता हुआ। ध्यातव्य है कि बोडो जनजाति के लोग दशकों से ब्रह्मपुत्र नदी के तट के ऊपरी क्षेत्र को एक अलग बोडोलैंड राज्य बनाने की मांग कर रहे थे। बोडो आंदोलन के पीछे यह तर्क दिया जाता रहा है कि बोडो जनजातीय क्षेत्र में अन्य समुदायों की अधिकृत मौजूदगी से इस समुदाय के प्रभुत्त्व, पहचान और संस्कृति को खतरा है। बोडो आंदोलन से जुड़े लोगों ने अपनी मांगों को मनवाने के लिये कई बार हिंसा का रास्ता अपनाया जिसके कारण लंबे समय से इस क्षेत्र में अशांति बनी हुई थी।

बोडो समझौता:

केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में 27 जनवरी, 2020 को राजधानी दिल्ली में दशकों पुरानी बोडो समस्या के समाधान के लिये एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये गए। इस समझौते में भारत सरकार, असम राज्य सरकार और बोडोलैंड आंदोलन से जुड़े उग्रवादी समूहों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इस समझौते में असम के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड’ (National Democratic Front of Boroland- NDFB) के साथ बोडोलैंड आंदोलन से जुड़े अन्य संगठनों के सदस्य भी शामिल थे।

समझौते के मुख्य बिंदु:

  • इस समझौते के तहत सभी पक्षकारों ने पृथक बोडोलैंड राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की बजाय असम राज्य के अंतर्गत ही स्वायत्त बोडोलैंड क्षेत्र की व्यवस्था पर अपनी सहमति जताई।
  • इस समझौते के अनुसार, नई व्यवस्था में बोडोलैंड क्षेत्र के अंतर्गत 4 ज़िलों के स्थान पर 7 ज़िले होंगे।
  • इस समझौते के परिणामस्वरूप बोडो हिंसक समूहों के 1,500 से अधिक सदस्यों ने क्षेत्र के विकास एवं शांति के लिये हथियार छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ने का निर्णय लिया।
  • समझौते के तहत केंद्र और राज्य सरकार बोडो क्षेत्रों के विकास के लिये 1,500 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज़ जारी करेगी।
  • इसके साथ ही बोडो आंदोलन में मारे गए लोगों के परिवारों को 5 लाख रुपए मुआवज़े के रूप में दिये जाएंगे।
  • समझौते के अनुसार, बोडो बाहुल्य क्षेत्र के भविष्य और इसके विकास की रूपरेखा तैयार करने के लिये संविधान की छठी अनुसूची के सेक्शन 14 के तहत एक आयोग का गठन किया जाएगा।
  • इस आयोग की देख-रेख में बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (BTAD) से सटे उन बोडो बाहुल्य गाँवों को को भी क्षेत्र में शामिल किया जाएगा जो वर्तमान में BTAD से बाहर हैं।
  • असम सरकार निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार BTAD से बाहर राज्य के अन्य बोडो गाँवों के विकास के लिये बोडो-कचारी कल्याण परिषद की स्थापना करेगी।
  • समझौते के तहत बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट (Bodoland Territorial Area Districts- BTAD) का नाम बदलकर बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (Bodoland Territorial Region-BTR) कर दिया जाएगा।
  • इसके साथ ही बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (Bodoland Territorial Council-BTC) के कार्यों की समीक्षा भी की जाएगी और BTC से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिये असम सरकार द्वारा एक अलग विभाग का गठन किया जाएगा।
  • BTC इलाकों के विकास के लिये राज्य सरकार 3 साल तक 250 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की आर्थिक सहायता प्रदान करेगी।
  • इसके अतिरिक्त समझौते के क्रियान्वन की निगरानी के लिये केंद्रीय गृह मंत्रालय, असम सरकार, बीटीसी और बोडो संगठन की साझा कमेटी बनाई जाएगी।
  • बोडो लोगों की पहचान, भाषा, शिक्षा और भूमि अधिकार से जुड़े मुद्दों का समाधान किया जाएगा।
  • असम सरकार द्वारा बोडो भाषा को राज्य में सहयोगी आधिकारिक भाषा के रूप में अधिसूचित किया जाएगा।
  • बोडो माध्यम स्कूलों के लिये एक अलग निदेशालय की स्थापना की जाएगी।
  • NDFB के सदस्यों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास को भी इस समझौते में शामिल किया गया है।
  • समझौते के तहत NDFB गुट हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करेंगे साथ ही समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक माह के भीतर ये लोग अपने सशस्त्र संगठनों की सभी गतिविधियों को समाप्त करेंगे।
  • समझौते के अन्य प्रावधानों में आदिवासियों के भूमि अधिकारों के लिये विधि के तहत सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही जनजातीय क्षेत्रों के त्वरित विकास को सुनिश्चित करना भी शामिल है।

बोडो जनजाति:

बोडो समुदाय भारत के संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) के अंतर्गत भारतीय समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी असम की सबसे बड़ी जनजाति है। बोडो समुदाय के लोग असम के मूल निवासी हैं तथा राज्य की कुल आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी 5-6 प्रतिशत से अधिक है।

  • असम राज्य में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर में स्थित चार ज़िलों कोकराझार (Kokrajhar), बक्सा (Baksa), उदलगुरी (Udalguri) और चिरांग (Chirang) को मिलाकर बोडो प्रादेशिक क्षेत्र ज़िला (Bodo Territorial Area District- BTAD) का गठन किया गया है।

बोडोलैंड विवाद का इतिहास:

  • अंग्रेज़ी उपनिवेश के दौरान बोडो बाहुल्य क्षेत्रों में देश के अन्य हिस्सों से बड़ी संख्या में अप्रवासियों के आकर बसने को बोडो समुदाय ने अपनी संस्कृति, सभ्यता, कला आदि की संप्रभुता को खतरे पर तरह देखा।

गिरमिटिया मज़दूर और अप्रवासी समस्या: 19वीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेज़ी शासन के अंतर्गत इस क्षेत्र में देश के अन्य हिस्सों (जैसे-बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, छोटा नागपुर आदि) से बड़ी संख्या में मज़दूरों को चाय बागानों में काम करने के लिये लाकर बसाया गया, जो इस क्षेत्र के स्थानीय समुदायों में असंतोष का एक बड़ा कारण था। स्वतंत्रता के बाद भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का संपर्क पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के बाज़ारों और बंदरगाहों से लगभग समाप्त हो गया, साथ ही स्थानीय उत्पादों के भारत के अन्य बाज़ारों तक आसानी से न पहुँच पाने के कारण इस क्षेत्र में भारी आर्थिक गिरावट देखने को मिली। अन्य कारकों के साथ मिलकर यह आर्थिक असंतोष स्थानीय समुदायों और अप्रवासियों की बीच हिंसा का कारण बना।

  • बोडो लोगों ने पहली बार वर्ष 1966-67 में ‘प्लेन्स ट्राइबल कौंसिल ऑफ़ असम (Plains Tribals Council of Assam-PTCA)’ नामक राजनीतिक संगठन के माध्यम से अपने लिये अलग बोडोलैंड राज्य की मांग की थी।
  • वर्ष 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (All Bodo Students Union-ABSU) ने एक बार फिर पृथक बोडोलैंड की मांग तेज़ की और संघ के अध्यक्ष उपेन्द्रनाथ ब्रह्म ने असम राज्य को दो बराबर हिस्सों में बाँटने (Divide Assam fifty-fifty) की मांग रखी।
  • असम आंदोलन (1979-85) के पश्चात् असमिया लोगों की सुरक्षा तथा उनके हितों की रक्षा के लिये हुए असम समझौते के बाद यह विवाद और भी बढ़ गया।
  • असम समझौते के बाद बोडो समुदाय के लोगों ने अपनी संस्कृति और पहचान बचाने के लिये पुनः आंदोलन शुरू कर दिया।
  • वर्ष 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों में सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 5 लाख लोग विस्थापित हुए।
  • दिसंबर 2014 में अलगावादियों ने सोनितपुर और कोकराझार में 30 से अधिक लोगों की हत्या कर दी।

बोडो समस्या पर पूर्व में हुए समझौते:

वर्षों से इस क्षेत्र में शांति स्थापना के कई प्रयास किये गए हैं और हाल ही में हुआ यह समझौता पिछले 27 वर्षों के दौरान हुआ तीसरा बोडो समझौता है।

  • वर्ष 1993 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन के साथ पहला बोडो समझौता हुआ।
    • इस समझौते के तहत स्वायत्त बोडोलैंड परिषद का गठन हुआ था, जिसे सीमित राजनीतिक अधिकार दिये गए थे।
    • इस समझौते के लिये किये गए प्रयास बहुत अधिक सफल नहीं हुए और इन क्षेत्रों में विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया।
  • फरवरी 2003 में बोडो लिबरेशन टाइगर्स फोर्स (Bodo Liberation Tigers Force-BLTF) के साथ दूसरा बोडो समझौता हुआ।
    • इस समझौते के बाद संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद का गठन किया गया था।
    • इस परिषद के अंतर्गत कोकराझार, चिरांग, बक्सा, और उदालगुड़ी ज़िलों को शामिल किया गया था।
    • यह समझौता समुदाय के असंतोष को दूर करने में सफल रहा परंतु बोडो विद्रोहियों के कई गुटों में बँटे होने के कारण यह समझौता भी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहा।
    • वर्ष 2005 में NDFB के साथ भी एक युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे परंतु यह समझौता कभी सफल रूप से लागू नहीं हुआ और इस दौरान क्षेत्र में हिंसा बहुत अधिक बढ़ गई।

बोडो आंदोलन के हिंसक समूह:

1980 के दशक में उल्फा-यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (United Liberation Front of Assam-ULFA) के नेतृत्व में स्वायत्त असम राज्य की मांग के लिये इस क्षेत्र में सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ। इसके बाद बोडो समूहों ने भी स्वायत्त बोडो राज्य के लिये राजनीतिक आंदोलनों के साथ-साथ अलग बोडो राज्य की मांग करते हुए हिंसा का रास्ता अपनाया, बोडो उग्रवादियों पर हिंसात्मक गतिविधियों, उगाही और हत्या जैसी घटनाओं के आरोप लगे। इन हिंसक घटनाओं में अब तक 2,823 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

  • अक्तूबर 1986 में रंजन दैमारी ने उग्रवादी गुट बोडो सिक्योरिटी फोर्स (Bodo Security Force) का गठन किया बाद में इस समूह ने अपना नाम नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड-NDFB कर लिया।
  • इस संगठन के ज़रिये विरोध इतना बढ़ गया था कि केंद्र सरकार ने इसे गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून 1967 के तहत गैर कानूनी घोषित कर दिया।
  • वर्ष 1990 में सुरक्षा बलों ने NDFB के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया, जिसे देखते हुए इस समूह के अधिकतर उग्रवादी पड़ोसी देश भूटान भाग गए और वहीं से अपना अभियान जारी रखा।
    • वर्ष 2000 में भूटान की शाही सेना (Royal Bhutan Army) और भारतीय सेना के संयुक्त अभियानों द्वारा इस समूह का लगभग खात्मा कर दिया गया, इसके बाद कई बोडो समूहों ने हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा की राजनीति में आने की इच्छा जाहिर की।

NDFB के चार गुट:

वर्ष 2008 में एक बार फिर NDFB पुनः सक्रिय हुआ और इस समूह ने असम के कई क्षेत्रों में बमों द्वारा हमले किए, जिनमें 90 लोगों की मृत्यु हुई। इन हमलों के लिये रंजन दैमारी को दोषी ठहराया गया।

1. NDFB(P): इन हमलों के बाद NDFB दो भागों में बँट गई एवं गोविंदा वसुमतारी के नेतृत्व में एक अलग NDFB (P) गुट बना।

2. NDFB (RD): NDFB के विभाजन के बाद रंजन दैमारी के नेतृत्व वाले गुट को NDFB (RD) नाम से जाना जाता है।

  • वर्ष 2009 में NDFB (P) ने केंद्र सरकार से बातचीत शुरू की और वर्ष 2010 में बांग्लादेश सरकार ने रंजन दैमारी को गिरफ्तार कर भारत को सौंप दिया।
  • वर्ष 2013 में रंजन दैमारी को ज़मानत मिलने के बाद NDFB (RD) भी केंद्र सरकार के साथ बातचीत में शामिल हुआ।

3. NDFB (S): वर्ष 2012 में इंगती कठार सोंगबिजित ने NDFB से अलग NDFB (S) की स्थापना की, यह समूह सरकार से बातचीत के खिलाफ था, इस समूह पर वर्ष 2014 में 66 आदिवासियों की हत्या करने का आरोप लगा।

4. बाद में इंगती कठार ने अपना एक और अलग गुट बनाया।

27 जनवरी को हुआ समझौता इन्हीं चार समूहों और केंद्र व असम सरकार के बीच किया गया है।

निष्कर्ष :

  • इस समझौते द्वारा बोडो समस्या से जुड़े सभी पक्षकारों को एक मंच पर लाना सरकार के लिये बड़ी सफलता है।
  • इस समझौते के माध्यम से बोडो जनजाति के विकास के साथ असम राज्य की आतंरिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  • इस समझौते में हिंसा से जुड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने के साथ क्षेत्र के विकास के लिये समुदाय के हर वर्ग का ध्यान रखा गया है।
  • भारत के पूर्वोतर क्षेत्र की आतंरिक अस्थिरता के समाधान के लिये हाल ही में हुए ब्रू-समझौते के साथ यह समझौता बहुत ही महत्त्वपूर्ण साबित होगा।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता इस क्षेत्र में निवेश के लिये एक बड़ी बाधा बनी हुई थी, ऐसे में इस समझौते के बाद देश के पूर्वोत्तर भाग में भी निवेश को बल मिलेगा।

अभ्यास प्रश्न: पूर्वोत्तर राज्य असम की दशकों पुरानी बोडोलैंड समस्या के समाधान के लिये जनवरी 2020 में हुए बोडो समझौते की भूमिका और इसके महत्त्व की विवेचना कीजिये।

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