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प्रिलिम्स फैक्ट्स : 05 जुलाई, 2021

  • 05 Jul 2021
  • 4 min read

प्रोजेक्ट बोल्ड : KVIC

Project BOLD: KVIC

हाल ही में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) ने राजस्थान के उदयपुर में निचला मांडवा (Nichla Mandwa) गाँव से "सूखे भू-क्षेत्र पर बाँस मरु-उद्यान" (BOLD) नामक एक परियोजना शुरू की।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)

  • खादी और ग्रामोद्योग आयोग 'खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम-1956' के तहत एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ भी आवश्यक हो अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर खादी एवं ग्रामोद्योगों की स्थापना तथा विकास के लिये योजनाएँ बनाना, उनका प्रचार-प्रसार करना तथा सुविधाएँ एवं सहायता प्रदान करना है।
  • यह भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (Ministry of MSME) के अंतर्गत कार्य करता है।

प्रमुख बिंदु 

परिचय :

  • इस परियोजना के अंतर्गत विशेष रूप से असम से लाए गए बाँस की विशेष प्रजातियों- बंबुसा टुल्डा (Bambusa Tulda) और बंबुसा पॉलीमोर्फा (Bambusa Polymorpha) के 5,000 पौधों को  निचला मांडवा ग्राम पंचायत की 25 बीघा (लगभग 16 एकड़) खाली शुष्क भूमि पर लगाया गया है।
    • इस तरह KVIC ने एक ही स्थान पर एक ही दिन में सर्वाधिक संख्या में बाँस के पौधे लगाने का विश्व रिकॉर्ड बनाया है।
  • यह भारत में इस तरह का पहला अभ्यास है। यह परियोजना शुष्क व अर्द्ध-शुष्क भूमि क्षेत्रों में बाँस आधारित हरित पट्टी बनाने का प्रयास करती है। 
  • इसे 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर "आज़ादी का अमृत महोत्सव" मनाने के लिये  KVIC के "खादी बाँस महोत्सव" के हिस्से के रूप में लॉन्च किया गया है।

बाँस को चुनने का कारण:

  • यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है और लगभग तीन वर्ष के समय में इसकी कटाई की जा सकती है।
  • बाँस को पानी के संरक्षण और भूमि की सतह से पानी के वाष्पीकरण को कम करने के लिये भी जाना जाता है, जो शुष्क और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

महत्त्व:

  • यह मरुस्थलीकरण को कम करेगा और आजीविका तथा बहु-विषयक ग्रामीण उद्योग में सहायता प्रदान करेगा।
  • यह सतत् विकास और खाद्य सुरक्षा के रूप में भी कार्य करेगा।

विस्तार:

  • KVIC इस साल अगस्त तक गुजरात के अहमदाबाद ज़िले के धोलेरा गाँव और लेह-लद्दाख में भी इसी तरह की परियोजना शुरू करने वाला है।
    • अगस्त 2021 से पहले कुल 15,000 बाँस के पौधे लगाए जाएंगे।

मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु अन्य पहलें:

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