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लॉगरहेड टर्टल

  • 19 Feb 2026
  • 16 min read

स्रोत: द हिंदू 

एक अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन लॉगरहेड सी टर्टल की प्रजनन क्षमता और शारीरिक संरचना को कमज़ोर कर रहा है, जिससे उनके दीर्घकालिक अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। 

  • परिचय: लॉगरहेड सी टर्टल (केरेट्टा-केरेट्टा) एक सर्वाहारी समुद्री सरीसृप है, जिसे सी टर्टल की सात विद्यमान प्रजातियों में से एक के रूप में मान्यता प्राप्त है। 
    • इसका नाम इसके बड़े, चौकोर आकार के सिर पर रखा गया है, इसके जबड़े की मांसपेशियाँ इतनी शक्तिशाली होती हैं कि यह कठोर खोल वाले शिकार को भी कुचल सकती हैं।
  • वैश्विक वितरण: लॉगरहेड टर्टल अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के साथ-साथ भूमध्य सागर में पाया जाता है, जिसकी दस मान्यता प्राप्त उप-प्रजातियाँ हैं।
  • खतरे: महासागरों की उष्णता और घटती समुद्री खाद्य आपूर्ति के कारण मादा लॉगरहेड अब कम बार प्रजनन कर रही हैं — प्रत्येक दो वर्ष से बदलकर चार वर्ष के अंतराल पर—और प्रति घोंसला कम अंडे दे रही हैं।
    • “कैपिटल ब्रीडर” होने के नाते ये कछुए प्रजनन के लिये कई वर्षों तक भोजन खोजकर संचित की गई ऊर्जा पर निर्भर रहते हैं। नर और मादा दोनों ही भोजन स्थलों और अंडे देने वाले समुद्रतटों के बीच सैकड़ों से लेकर हज़ारों किमी. तक की प्रजनन यात्राएँ करते हैं। हालाँकि सैटेलाइट आँकड़ों से महासागरीय क्लोरोफिल में कमी दिखती है, जो भोजन की उपलब्धता घटने का संकेत है, यह इनके ऊर्जा भंडार को क्षीण कर रही है।
  • संरक्षण स्थिति: इस प्रजाति को IUCN द्वारा 'सुभेद्य' के रूप में मूल्यांकित किया गया है। इसे वर्ष 1979 में वन्य जीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण हेतु अभिसमय (CMS) के परिशिष्ट II में शामिल किया गया था और 1985 में परिशिष्ट I में उन्नत किया गया। भारत में यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तंत्र: लॉगरहेड पर विभिन्न CMS के माध्यम से संरक्षण लागू है, जिनमें अफ्रीका के अटलांटिक तट और हिंद महासागर–दक्षिण‑पूर्व एशिया क्षेत्रों के लिये समझौता ज्ञापन (MOU) और दक्षिण प्रशांत महासागर के लिये एक एकल प्रजाति कार्ययोजना शामिल हैं।

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