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दसवीं अनुसूची की समीक्षा की आवश्यकता

  • 27 Feb 2021
  • 9 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में दसवीं अनुसूची और उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ:

हाल ही में पुद्दुचेरी विधानसभा में विधायकों के इस्तीफे ने फिर से दलबदल विरोधी कानून की विसंगति को उजागर किया है। पुद्दुचेरी विधानसभा में विधायकों ने अविश्वास प्रस्ताव को सफल बनाने के लिये सदन की सदस्य संख्या को कम करने के इरादे से इस्तीफे दिये। इससे पहले इस तरीके का प्रयोग हाल ही में मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे अन्य राज्यों में भी देखा गया।

इस तरह किसी भी विधायक को दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ता है। "राजनीतिक दलबदल की समस्या" का समाधान करने के उद्देश्य से वर्ष 1985 में दलबदल विरोधी कानून को दसवीं अनुसूची के रूप में संविधान में शामिल किया गया था।

दलबदल विरोधी कानून का प्राथमिक उद्देश्य सरकारों को स्थिरता प्रदान करना था। हालाँकि इस कानून ने पार्टी के प्रति विधायकों की जवाबदेहिता को सीमित किया है, साथ ही यह सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करने में भी विफल रहा है।

दलबदल विरोधी कानून से संबंधित मुद्दे

  • निर्विवाद प्रतिनिधि लोकतंत्र: सामान्यतः विधायिका सदस्यों की मतदाताओं के एजेंट के रूप में और जनहित के विभिन्न मुद्दों पर अपने निर्णय का प्रयोग करने के हेतु व्यापक रूप से स्वीकृत दो भूमिकाएँ होती हैं।
    • दलबदल-निरोधी कानून लागू करने के बाद सांसद या विधायक को आवश्यक रूप से पार्टी के निर्देश का पालन करना होता है जो किसी मुद्दे पर उनकी स्वयं की मौलिकता प्रकट करने की स्वतंत्रता को सीमित करता है।
    • इस प्रकार की व्यवस्था प्रतिनिधि को निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि और राष्ट्रीय विधायिका का सदस्य होने के बजाय केवल राजनीतिक दल के एजेंट के रूप में रूपांतरित करता है।
    • इस प्रकार यह प्रावधान प्रतिनिधि लोकतंत्र की अवधारणा के विरुद्ध है।
  • विधायी कानून: विधायिका की शक्तियों को सीमित करना दलबदल विरोधी कानून का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम रहा है।
    • इसकी वजह से नीति निर्माण, बिल और बजट की जाँच तथा निर्णयों में सांसद की मुख्य भूमिका केवल पार्टी को समर्थन या विरोध करने वाले एक वोट तक सीमित रह जाती है।
  • संसदीय लोकतंत्र को रेखांकित करना: संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते समय डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा सरकार के राष्ट्रपति/अध्यक्षीय और संसदीय शासन स्वरूपों के बीच मतभेदों को रेखांकित किया गया।
    • उनके अनुसार, राष्ट्रपति को उच्च स्थायित्व तथा कम जवाबदेही के साथ चार साल के लिये निर्वाचित किया जाता है और केवल महाभियोग के माध्यम से ही  हटाया जा सकता है।
    • राष्ट्रपति शासन व्यवस्था की तुलना में संसदीय शासन व्यवस्था में सरकार अधिक जवाबदेह होती है और लोकसभा में अविश्वास की स्थिति में सरकार को सदन से हटाया जा सकता है।
    • भारत में विधायकों की जवाबदेही मुख्य रूप से राजनीतिक पार्टी तक ही सीमित रही है। इस प्रकार दलबदल विरोधी कानून संसदीय लोकतंत्र की अवधारणा के खिलाफ काम करता है।
  • दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता का अभाव: दलबदल विरोधी कानून यह सुनिश्चित कर राजनीतिक स्थिरता की परिकल्पना करता है कि यदि सदस्य को इस कानून के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है तो वह बिना दोबारा चुनाव जीते मंत्री पद नहीं प्राप्त कर सकता है।
    • हालाँकि वर्तमान पुद्दुचेरी के उदाहरण से पता चलता है कि इस प्रकार की राजनीतिक प्रणाली में पार्टी के खिलाफ वोट देने के बजाय इस्तीफा देकर सरकारों को गिराने का कार्य किया जाता है।
  • अध्यक्ष की विवादास्पद भूमिका: सदन की सदस्यता से इस्तीफा देना प्रत्येक सदस्य का अधिकार है।
    • हालाँकि संविधान के अनुच्छेद 190 के अनुसार, इस्तीफा स्वैच्छिक या वास्तविक होना चाहिये, यदि अध्यक्ष को किसी बाह्य दबाव से संबंधित जानकारी मिलती है, तो वह इस्तीफा स्वीकार करने के लिये बाध्य नहीं है।
    • सामान्यतः सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की योग्यता पर निर्णय लेने में देरी के कई उदाहरण देखे गए हैं।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अध्यक्ष को तीन महीने में निर्णय देना होगा लेकिन इस संबंध में अध्यक्ष की बाध्यता को निर्धारित नहीं किया गया है।

आगे की राह 

  • पार्टी के आंतरिक स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत करना: अगर राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने में पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण है तो पार्टी के आंतरिक स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत किया जाना चाहिये।
    • पार्टी में लोगों को विरासत के बजाय उनकी क्षमता के आधार पर पद और उत्तरदायित्व प्रदान किया जाना चाहिये।
  • राजनीतिक दलों का विनियमन: भारत में राजनीतिक दलों को नियंत्रित करने वाले कानून की सख्त आवश्यकता है। इस तरह के कानून द्वारा राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाया जाना चाहिये और पार्टी के आंतरिक स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत करने जैसे प्रयास किये जाने चाहिये।
  • चुनाव आयोग का अंतिम अधिकार: सदन का अध्यक्ष, दलबदल के मामले में अंतिम प्राधिकारी होने के कारण शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित करता है।
    • दलबदल के मामले में चुनाव आयोग के पास निर्णय का अंतिम अधिकार होना चाहिये ताकि इसके दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जा सके।
  • दलबदल विरोधी कानून के दायरे को विनियमित करना: प्रतिनिधि लोकतंत्र में दलबदल विरोधी कानून के हानिकारक प्रभाव को कम कर कानून के दायरे को  केवल सरकार के उत्तरदायित्व वाले क्षेत्रों तक सीमित रखा जाना चाहिये।

निष्कर्ष

संक्षेप में बात करें तो दलबदल विरोधी कानून, विधायिका के कामकाज और उत्तरदायित्व (नागरिकों की ओर से कार्यपालिका पर नियंत्रण) हेतु हानिकारक प्रतीत हो रहा है। इस अधिनियम ने सदस्यों को विधेयकों और बजट पर सरकार के निर्णय का समर्थन करने हेतु एक मंच के रूप में रूपांतरित कर दिया है। वर्तमान घटनाएँ संविधान की दसवीं अनुसूची की प्रासंगिकता को अधिक उपर्युक्त बनाने हेतु समीक्षा की मांग करती हैं।

प्रश्न: विधायिका के सदस्यों को मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात करने के आधार पर दलबदल विरोधी कानून के माध्यम से दंडित करना स्वयं में त्रुटिपूर्ण है। चर्चा कीजिये?

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