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स्वच्छ भारत अभियान और शहरी चुनौतियाँ

  • 14 Nov 2019
  • 14 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) के समक्ष मौजूद चुनौतियों पर चर्चा की गई है। साथ ही उन चुनौतियों से निपटने के लिये आवश्यक उपायों का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

देश में सार्वभौमिक स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित करने के प्रयासों में तेज़ी लाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा 2 अक्तूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की गई थी। गौरतलब है कि इस मिशन को दो अलग-अलग मंत्रालयों- ग्रामीण क्षेत्रों के लिये पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय और शहरी क्षेत्रों के लिये आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा निष्पादित किया जा रहा है। अभियान को दो भागों में बाँटकर देखने का मुख्य कारण यही है कि दोनों क्षेत्रों (ग्रामीण और शहरी) की अपनी स्वच्छता संबंधी अलग-अलग  आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें अलग-अलग दृष्टिकोणों की आवश्यकता है। खुले में शौच की समस्या, जिसका उन्मूलन स्वच्छ भारत अभियान का प्राथमिक उद्देश्य है, सिर्फ ग्रामीण भारत तक ही सीमित नहीं है। जहाँ एक ओर संपूर्ण स्वच्छता का कार्यान्वयन ग्रामीण भारत में एक बड़ी चुनौती है, वहीं शहरी स्वच्छता के मोर्चे पर कुछ अलग गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं, जिनसे अलग दृष्टिकोण से निपटने की आवश्यकता है।

स्वच्छता 

  • सामान्य शब्दों में स्वच्छता का आशय कीटाणु, गंदगी, कचरा और अपशिष्ट से मुक्त होने की स्थिति और उसे बनाए रखने की स्थिति से है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WTO) के अनुसार, स्वच्छता का तात्पर्य मानव अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन हेतु सुविधाओं और सेवाओं के प्रावधान से है। व्यापक तौर पर स्वच्छता में ठोस कचरे और जानवरों के कचरे का सुरक्षित प्रबंधन भी शामिल होता है।
  • स्वच्छ भारत अभियान 
    • स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2 अक्तूबर, 2014 को महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर राजघाट, नई दिल्ली से की गई। 
  • स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य: 
    • भारत में खुले में शौच की समस्या को समाप्त करना अर्थात् संपूर्ण देश को खुले में शौच करने से मुक्त (ओ.डी.एफ.) घोषित करना, हर घर में शौचालय का निर्माण, जल की आपूर्ति और ठोस व तरल कचरे का उचित तरीके से प्रबंधन करना है।
    • इस अभियान का उद्देश्य सड़कों और फुटपाथों की सफाई, अनधिकृत क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाना, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन तथा स्वच्छता से जुड़ी प्रथाओं के बारे में लोगों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
  • इस अभियान में दो उप-अभियान स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) तथा स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) सम्मिलित हैं। इसमें जहाँ ग्रामीण इलाकों के लिये ‘पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय’ व ‘ग्रामीण विकास मंत्रालय’ जुड़े हुए हैं, वहीं शहरों के लिये शहरी विकास मंत्रालय ज़िम्मेदार है।

शहरों से अलग हैं गाँव

वर्ष 2017 के आँकड़ों के अनुसार, देश की तकरीबन 66 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और इतनी बड़ी आबादी को संपूर्ण स्वच्छता की ओर ले जाने में सबसे बड़ी चुनौती लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाना था ताकि वे खुले क्षेत्रों में शौच करने के बजाय घरेलू शौचालयों का उपयोग करें। ग्रामीण मानसिकता के कारण वहाँ के अधिकांश घरों में शौचालय नहीं थे, इसी कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लिये स्वच्छ भारत अभियान के घटकों में शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ सूचना, शिक्षा और संचार (Information, Education and Communication-IEC) संबंधी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल था। उल्लेखनीय है कि ग्रामीण क्षेत्रों में एक समर्पित सीवरेज नेटवर्क की आवश्यकता कम होती है, क्योंकि वहाँ जो भी शौचालय मौजूद होते हैं वे घर के सोक पिट (Soak Pit) से जुड़े हुए होते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू कचरे को भी बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जाता है क्योंकि यह कार्य घरेलू स्तर पर किया जाता है, अतः इसके अधिकांश हिस्से का प्रयोग खेतों में किया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्र के स्वच्छता स्तर में सुधार करना शहरी क्षेत्र की अपेक्षा बहुत कम जटिल है।

शहरी क्षेत्रों की चुनौती  

  • वर्तमान में शहरी क्षेत्र मुख्यतः 2 चुनौतियों का सामना कर रहे हैं:
    • ठोस और तरल अपशिष्ट का निपटान
    • शहरी क्षेत्रों में सीवरेज का प्रबंधन
  • उल्लेखनीय है कि ठोस अपशिष्ट के निपटान में 3 प्रमुख घटक होते हैं: (1) अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण, (2) अपशिष्ट का स्थानांतरण और (3) लैंडफिल क्षेत्र में उचित निपटान। अपशिष्ट संग्रह और लैंडफिल साइट तक उसके स्थानांतरण दोनों ही कार्यों में जनशक्ति के साथ-साथ एक कुशल परिवहन प्रणाली की आवश्यकता होती है।
  • विदित हो कि अधिकांश शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट का निपटान करना मुख्य रूप से नगरपालिकाओं की ज़िम्मेदारी होती है। हालाँकि इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि देश की कई नगरपालिकाएँ अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु जनशक्ति, वित्तीय संसाधनों और प्रौद्योगिकी की कमी से जूझ रही हैं। अधिकांश नगरपालिकाएँ संसाधनों के लिये राज्य सरकारों पर निर्भर रहती हैं। 
  • दूसरी चुनौती शहरी क्षेत्रों में सीवरेज का प्रबंधन करना है। केवल शौचालय निर्माण से समस्या का समाधान नहीं हो सकता क्योंकि शहरी क्षेत्रों में उचित सीवरेज नेटवर्क की भी आवश्यकता है। 
    • अधिकांश भारतीय शहरी महानगर ऐसे सीवेज सिस्टम का प्रयोग कर रहे हैं जो दशकों पहले निर्मित किये गए थे और अभी भी सीवेज को नदियों या नहरों में ले जाने के पैटर्न का पालन करते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत का 70 प्रतिशत शहरी सीवेज अनुपचारित है। दशकों पुराने होने के कारण कई सीवेजो में सुपोषण (Eutrophication) की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
    • कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) भारतीयों के लिये वरदान से ज़्यादा अभिशाप हैं, क्योंकि आँकड़ों के अनुसार देश में मौजूद कुल STPs में से 35 प्रतिशत से अधिक बेकार हैं। 
    • चूँकि हम कई दशकों पुरानी सीवेज प्रणाली का प्रयोग कर रहे हैं, इसलिये यह वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करने में भी सक्षम नहीं हैं। 
  • सोक पिट जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग में लाया जाता है, शहरी इलाकों में जगह की कमी और बढ़ती जनसंख्या घनत्व के कारण काम नहीं कर सकती है।
  • यदि हम शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत मिशन के लिये अपनाई गई रणनीति को देखें तो यह मुख्यतः व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों, सामुदायिक शौचालयों और IEC गतिविधियों के पर केंद्रित है।
  • ठोस कचरा प्रबंधन के लिये जो फंड निर्धारित किया गया है वह अपेक्षाकृत न्यूनतम है जो कि संपूर्ण स्वच्छता के उद्देश्य को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न कर रहा है। इसी प्रकार सीवरेज नेटवर्क के लिये भी धन का जो प्रावधान किया गया है वह काफी कम है।
  • भारत के शहरी महानगरों और कस्बों में जगह की कमी है जिसके कारण अक्सर शहरी नगरपालिकाओं को शौचालय बनाने के लिये पर्याप्त स्थान खोजने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • दिल्ली, पुणे और मुंबई जैसे महानगरों में कई अनधिकृत कॉलोनियों और बस्तियों के कारण व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण करना एक बड़ी चुनौती है।
    • उल्लेखनीय है कि देश की शहरी जनसंख्या भी लगातार बढ़ रही है और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्ष 2040 तक भारत की शहरी आबादी वर्तमान 330 मिलियन से बढ़कर 830 मिलियन हो जाएगी।
  • आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) की कुल लागत 62,000 करोड़ रुपए है, जिसमें से एक-चौथाई राशि का वहन केंद्र सरकार द्वारा और बाकी राज्य सरकारों एवं स्थानीय नगर निकायों द्वारा वहन किया जाना था। परंतु देश के स्थानीय नगर निकायों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है और इसीलिये लागत का कुछ हिस्सा चुकाना भी उनके लिये मुश्किल हो जाता है, जिसके कारण परियोजनाएँ रुक जाती हैं।
    • उदाहरण के लिये दिल्ली नगर निगम वर्ष 2016 में स्वच्छ भारत से संबंधित किसी भी परियोजना पर काम शुरू नहीं कर पाया था, क्योंकि उसके पास अपने योगदान की पूर्ति के लिये आवश्यक वित्त की कमी थी।
  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के दिशा-निर्देशों में एक अन्य समस्या यह है कि इसके तहत निजी घरों में शौचालयों के निर्माण के लिये तो वित्त प्रदान किया जाता है, परंतु सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के लिये किसी भी प्रकार की धन सहायता का उल्लेख नहीं है।

आगे की राह  

  • ठोस अपशिष्ट और सीवर प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) को पुनर्निर्मित करने की आवश्यकता है। ताकि शहरों में मौजूद चुनौतियों को विशिष्ट रूप से संबोधित किया जा सके। 
  • आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय को राज्य सरकारों से कचरे से निपटने में उनकी क्षमताओं का आकलन करने के लिये कहना चाहिये, जिससे प्रत्येक राज्य की क्षमता और कमियों को ध्यान में रखकर रूपरेखा तैयार की जा सके।
  • कचरे के संग्रहण और उसके निपटान हेतु सरकारों को स्थानीय निकायों की क्षमता का ध्यान रखना चाहिये और आवश्यक वित्तीय संसाधनों की पूर्ति करने का प्रयास करना चाहिये।
  • नगरपालिकाओं को उनके राजस्व में वृद्धि करने हेतु अवसर दिया जा सकता है।
  • लैंडफिल क्षेत्रों के विकास के लिये भी अलग से धन आवंटित किया जाना चाहिये।
  • साथ ही देश के प्रमुख शहरों में अपशिष्ट संग्रहण और निपटान हेतु किये जा रहे सर्वोत्तम प्रयासों का अध्ययन और अनुकरण किया जाना चाहिये।
  • ध्यातव्य है कि जब तक हम सड़कों से कचरे को व्यवस्थित रूप से उठाने में सक्षम नहीं होंगे, तब तक स्वच्छता का कोई अर्थ नहीं होगा।

निष्कर्ष 

शहरी भारत में स्वच्छता की चुनौतियाँ कई मोर्चों पर ग्रामीण भारत से भिन्न हैं। स्थान, जनसांख्यिकी, व्यवहार और वित्त की समस्या शहरी और ग्रामीण भारत दोनों में एक जैसी है, परंतु दोनों क्षेत्रों में इस समस्या की प्रकृति अलग-अलग है। अतः स्वच्छ भारत की समग्र सफलता सुनिश्चित करने के लिये दोनों क्षेत्रों की समस्याओं को अलग-अलग संबोधित किये जाने की आवश्यकता है। 

प्रश्न : शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत अभियान की चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए इनसे निपटने के उपायों पर चर्चा कीजिये।

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