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कृषि

पेप्सिको पेटेंट आलू विवाद तथा बीज संप्रभुता एवं अनुबंध कृषि

  • 18 Jun 2019
  • 16 min read

इस Editorial में 13 जून को The Hindu Business Line में प्रकाशित लेख का विश्लेषण किया गया है, जो हाल ही में बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको और कुछ किसानों के बीच आलू की एक विशेष किस्म को उगाने के विवाद से संबंधित है। इसमें बीज अनुसंधान की आवश्यकता बताने के साथ इस विवाद के सभी पक्षों पर चर्चा की गई है तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

अभी अधिक समय नहीं हुआ जब अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के साबरकांठा ज़िले में कुछ आलू किसानों के विरुद्ध पेटेंट कानून (Patent Law) का उल्लंघन करने के आरोप में मुकदमा दायर किया था। कंपनी ने किसानों पर FC5 किस्म के उस आलू की खेती करने का आरोप लगाया था, जिसका पेटेंट पेप्सिको के पास है। पेप्सिको का कहना था कि आलू की इस किस्म के बीजों की आपूर्ति करने का अधिकार केवल उसी के पास है और इन बीजों का प्रयोग भी कंपनी के साथ जुड़े हुए किसान ही कर सकते है। अन्य कोई भी व्यक्ति  आलू की खेती के लिये इन बीजों का प्रयोग नहीं कर सकता। कंपनी ने 9 किसानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर 4.2 करोड़ रुपए का हर्जाना मांगा था। इसके बाद पेप्सिको की चहुँमुखी सार्वजनिक आलोचना हुई, जिसके बाद कुछ शर्तें तय करते हुए कंपनी ने मुकदमा वापस ले लिया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने बीज संप्रभुता (Seed Sovereignty) और अनुबंध कृषि (Contract Farming) पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिये हैं।

कई सवाल खड़े किये इस विवाद ने

  • पेप्सिको का कहना था कि किसान अगर उसका पेटेंट आलू उगाना बंद कर देंगे तो वह मुकदमा वापस ले लेगी।
  • पेप्सिको ने FC5 नाम के आलू की किस्म का पेटेंट अपने नाम कराया हुआ है।
  • पेप्सिको ने इन किसानों से मौजूदा स्टॉक को नष्ट करने के लिये कहा था।
  • पेप्सिको ने कहा कि किसान उसके साथ अनुबंध कर बीज ले सकते हैं और होने वाली फसल वापस उसे ही बेच सकते हैं।
  • पेप्सिको ने FC5 नाम के आलू की किस्म प्लांट वैरायटी प्रोटेक्शन अधिकार नियम के तहत रजिस्टर्ड करा रखी है।
  • यह रजिस्ट्रेशन वर्ष 2031 तक वैध है और तब तक बिना अनुबंध किये किसान इस आलू की फसल नहीं ले सकते।

विवाद के निहितार्थ

पेप्सिको बनाम किसानों के इस नवीनतम विवाद से कुछ बुनियादी तथ्य सामने आए हैं, जिन पर विचार करना अनिवार्य है:

बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति भारतीय किसानों की संवेदनशीलता

भारत में किसान अक्सर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ इस प्रकार के विवाद में उलझ जाते हैं, क्योंकि :

  • अधिकतर भारतीय किसान कम पढ़े-लिखे तथा निम्न आय वर्ग से संबंध रखते हैं जिसके कारण वे पेटेंट जैसे तमाम जटिल क़ानूनों को समझने में असमर्थ होते हैं।
  • भारतीय किसान फसल के समय उसका कुछ हिस्सा बीज के रूप में भविष्य में इस्तेमाल के लिये रख लेते हैं। इसके अलावा आपस में बीजों की अदला-बदली की जाती है तथा बाज़ार से भी बीज खरीदे जाते हैं।
  • इसके अलावा भारत में बुनियादी ढाँचे का अभाव होने के कारण खेती-किसानी बहुत अधिक लाभकारी नहीं रह गई है और इस वज़ह से भी बड़ी कंपनियाँ किसानों का उत्पीड़न करती हैं।

अनुबंध कृषि के नियमों का निम्नस्तरीय कार्यान्वयन

प्रायः यह देखने में आता है कि कृषि अनुबंध में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया जाता। इसके पीछे प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

  • अनुबंध तथा अनुबंध की शर्तों के कारण उत्पन्न विवादों के समाधान के लिये उपयुक्त संस्थागत तंत्र का न होना।
  • किसानों का अशिक्षित होना।
  • अनुबंधित कृषि के लिये समान नीति का अभाव।

अनुबंध कृषि क्या है?

  • अनुबंध खरीदार और किसानों के मध्य हुआ एक ऐसा समझौता है, जिसमें इसके तहत किये जाने वाले कृषि उत्पादन की प्रमुख शर्तों को परिभाषित किया जाता है।
  • इसमें कृषि उत्पादों के उत्पादन और विपणन के लिये कुछ मानक स्थापित किये जाते हैं।
  • इसके तहत किसान किसी विशेष कृषि उत्पाद की उपयुक्त मात्रा खरीदार को देने के लिये सहमति जताते हैं और खरीदार उस उत्पाद को खरीदने के लिये अपनी स्वीकृति देता है।
  • अनुबंध कृषि के तहत खरीदार (जैसे-खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ और निर्यातक) और उत्पादक (किसान या किसान संगठन) के बीच हुए फसल-पूर्व समझौते के आधार पर कृषि उत्पादन (पशुधन और मुर्गीपालन सहित) किया जाता है।

अनुबंध कृषि के लाभ

  • प्रायः देखने में आता है कि पर्याप्त खरीदार न मिलने पर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। किसान और बाज़ार के बीच तालमेल की कमी इसकी सबसे बड़ी वज़ह है।
  • अनुबंध कृषि की ज़रूरत इसीलिये महसूस की गई ताकि किसानों को भी उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल सके।

फसल उत्पाद के लिये तयशुदा बाज़ार तैयार करना अनुबंध कृषि का प्रमुख उद्देश्य है। कृषि के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा देना भी इसका उद्देश्य है। इससे कृषि उत्पाद के कारोबार में लगी कई कॉर्पोरेट कंपनियों को कृषि प्रणाली को सुविधाजनक बनाने में आसानी रहती है और उन्हें अपनी पसंद का कच्चा माल तय समय और कम कीमत पर मिल जाता है।

  • अनुबंध कृषि के तहत किसानों को बीज, ऋण, उर्वरक, मशीनरी और तकनीकी सलाह सुलभ कराई जा सकती है, ताकि उनकी उपज कंपनियों की आवश्यकताओं के अनुरूप हो सके।
  • इसमें कोई बिचौलिया शामिल नहीं होता और किसानों को कंपनियों की ओर से पूर्व निर्धारित कीमत मिलती है।

इस तरह के अनुबंध से किसानों के लिये बाज़ार में उनकी उपज की मांग एवं इसके मूल्यों में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है और इसी तरह कंपनियों के लिये कच्चे माल की अनुपलब्धता का जोखिम भी घट जाता है।

भारत में बौद्धिक संपदा अधिकार

  • बीज अधिनियम (Seeds Act), 1968 के अनुसार बीज बौद्धिक संपदा अधिकार व्यवस्था के तहत नहीं आते और इस पर पूर्ण रूप से किसानों का अधिकार होता है।
  • पौधों की किस्मों और किसानों के अधिकार संरक्षण अधिनियम (Protection of Plant Varieties and Farmers' Rights Act-PPVFR Act) 2001 की धारा 39 किसानों को संरक्षित बीजों सहित सभी प्रकार के बीजों को बचाकर रखने, प्रयोग करने, बुआई करने, विनिमय करने, साझा करने और यहाँ तक कि उन्हें बेचने की भी अनुमति देता है।
  • अगर पौधों की कुछ किस्में विशिष्ट, समान और स्थायी पाई जाती हैं तो यह अधिनियम कुछ वर्षों के लिये उनकी सुरक्षा की अनुमति भी देती है।
  • इसके अलावा यह अधिनियम उन किसानों तथा समुदायों के अधिकारों की रक्षा करता है, जो पौधों की किस्मों का प्रयोग करते हैं और सालों तक उन्हें संरक्षित रखते हैं।
  • भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ किसानों को किसी भी संरक्षित किस्म का बीज प्रयोग करने, उनकी संख्या में वृद्धि करने और अनौपचारिक रूप से साझा करने या औपचारिक रूप से बेचने की अनुमति (जब तक वे इसकी ब्रांडिंग नहीं करते) प्रदान की गई है।
  • लेकिन हमारे यहाँ सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसानों को IPR (Intellectual Property Rights) के संबंध में कोई जानकारी नहीं है।

क्या करें कि हालात बेहतर हों?

  • अनुसंधान ही प्रगति की कुंजी है। जलवायु परिवर्तन, नए कीट और रोग, अजैविक दबाव और आय में वृद्धि जैसे कारक नई-नई किस्मों की आवश्यकता को जन्म देते हैं, क्योंकि पुरानी किस्में नई मांगों को पूरा नहीं करती हैं।
  • भिन्न-भिन्न योजनाओं जैसे- किसान कॉल सेंटर (Kisan Call Centres), किसान विज्ञान केंद्र (Kisan Vigyan Kendra) आदि के माध्यम से किसानों को शिक्षित करना।
  • किसान संगठनों को बढ़ावा देना।
  • विवाद के निपटारे के लिये मुक़दमे को अंतिम उपाय के रूप में समझा जाना चाहिये।
  • किसानों सहित किसी को भी अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होना चाहिये।
  • कृषि उत्पादों में मूल्य वृद्धि को अनुबंधित कृषि से और अधिक बढ़ाया जा सकता है, इससे उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाली वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और किसानों को एक निश्चित आय प्राप्त होती है।
  • किसानों की सुरक्षा के लिये अनुबंधित कृषि में फसल बीमा को अनिवार्य बनाना आवश्यक है।
  • पेप्सिको और किसानों का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के लिये एक अच्छा अवसर है कि वह PPV&FR तथा अनुबंध अधिनियम की विस्तृत व्याख्या करे और अनुबंधित कृषि में सुधार करके उसे एक नई दिशा प्रदान करे।
  • राज्यों को आदर्श अनुबंधित कृषि अधिनियम (Model Contract Farming Act), 2018 को अपनाने के लिये प्रोत्साहित करना।

यद्यपि भारत सरकार वैश्विक व्यापार व्यवस्थाओं के चलते कड़े बौद्धिक संपदा अधिकार नियम लागू कर रही है, लेकिन यह भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिये ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसे कठोर उपाय भारत में कुछ गिनी-चुनी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित कर देंगे, जो राष्ट्रीय हित में नहीं है।

प्रस्तावित अनुबंध कृषि अधिनियम

किसानों की आय बढ़ाने और उपज की बेहतर कीमत दिलाने के लिये केंद्र सरकार ने अनुबंध कृषि यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर मॉडल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अधिनियम, 2018 को स्वीकृति दी है और इसका मसौदा जारी किया है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • इसमें केवल खेती ही नहीं बल्कि डेयरी, पोल्ट्री और पशुपालन को भी शामिल किया गया है।
  • इसके तहत किसान अपनी फसलों को बेचने के लिये निजी कंपनियों से अनुबंध कर सकेंगे।
  • विवाद निपटारे के लिये शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाएगा और खेती का बीमा भी होगा।

शिकायत निवारण तंत्र की व्यवस्था

वर्तमान में मौजूद अनुबंध कृषि की संरचना के साथ विभिन्न प्रकार की समस्याएँ हैं, जिनके विषय में विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इस प्रस्तावित अधिनियम में इन समस्याओं के निराकरण के व्यापक प्रावधान किये गए हैं। ऐसी किसी भी स्थिति का सामना करने के लिये ब्लॉक, ज़िला या क्षेत्रीय स्तर पर विवाद निवारण तंत्र की स्थापना की जा सकती है। राज्य सरकार द्वारा निर्दिष्ट विवाद निपटान अधिकारी विवाद का निपटारा कर सकता है। विवाद निपटान अधिकारी के फैसले से संतुष्ट नहीं होने पर प्रत्येक राज्य में स्थापित अनुबंध कृषि (संवर्द्धन और सुविधा) प्राधिकरण-Contract Farming (Promotion and Facilitation) Authority) से अपील कर सकते हैं।

  • किसानों के हितों की रक्षा के साथ कंपनियों के लिये भी नियम उदार बनाने पर ज़ोर दिया गया है।
  • राज्यों को अपनी सुविधानुसार प्रावधानों में संशोधन करने की छूट दी गई है, लेकिन कानून में किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकेगा।
  • इसका मुख्य उद्देश्य फलों और सब्जियों का उत्पादन करने वाले किसानों को कृषि प्रसंस्करण इकाइयों से सीधे तौर पर (बिचौलियों के बिना) एकीकृत करना है।
  • इससे उन्हें अपनी उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा और साथ ही फसल की कटाई के बाद होने वाले नुकसान को भी कम किया जा सकेगा।
  • अनुबंध कृषि के उत्पादों के मूल्य निर्धारण में पूर्व, वर्तमान और आगामी उपज को करार में शामिल किया जाएगा।
  • किसान और संबंधित कंपनी के बीच होने वाले करार में प्रशासन तीसरा पक्ष होगा।
  • कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में भूमि पर कोई स्थायी निर्माण करना संभव नहीं होगा।
  • छोटे व सीमांत किसानों को एकजुट करने के लिये किसान उत्पादक संगठनों, कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • अनुबंध कृषि से संबंधित विवादों के त्वरित निपटान के लिये सुगम और सामान्य विवाद निपटान तंत्र का गठन किया जाएगा।
  • अनुबंध कृषि के उत्पादों पर फसल बीमा के प्रावधान लागू किये जाएंगे।
  • किसानों के लिये कुशल बाजार संरचना तैयार करने और विपणन दक्षता बढ़ाने में मदद करेगा तथा उत्पादन में विविधता से जुड़े जोखिम को भी कम करेगा।
  • यह सभी वस्तुओं के लिये मूल्य श्रृंखला (Value Chain) बनाने में भी सहायक होगा।
  • नीति आयोग द्वारा तैयार किये गए इस प्रस्तावित कानून में सभी कृषि जिंसों को शामिल किया जाएगा।

अभ्यास प्रश्न: भारतीय किसानों को एक ओर बौद्धिक संपदा अधिकार का भय रहता है तथा दूसरी ओर अनुकूल कानून के बावजूद बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा अनुबंध की शर्तें न मानने का खतरा भी। टिप्पणी कीजिये।

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