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एम.जे. अकबर बनाम प्रिया रमानी मामला

  • 22 Feb 2021
  • 9 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में एम.जे. अकबर बनाम प्रिया रमानी मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया फैसले के महत्त्व व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एम.जे. अकबर बनाम प्रिया रमानी मामले में एक सशक्त निर्णय दिया, जो भारत के #मीटू (#MeToo) आंदोलन और महिला अधिकारों के संघर्ष में एक मील के पत्थर के रूप में कार्य कर सकता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्रकार प्रिया रमानी को पूर्व केंद्रीय मंत्री और संपादक एम. जे. अकबर द्वारा उनके खिलाफ दायर किये गए आपराधिक मानहानि मामले में बरी कर दिया।

यौन हिंसा के आरोप के मामलों में अधिकांशतः मज़बूत पृष्ठभूमि वाले वर्गों के पुरुष पीड़ित महिलाओं पर अपनी प्रतिष्ठा और ओहदे को चोट पहुँचाने का आरोप लगाते हैं। यह यौन उत्पीड़न के मामलों को कमज़ोर करने के साथ महिलाओं की आवाज़ को दबाता है और उन्हें बदनाम करता है।

इस संदर्भ में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रतिष्ठा के अधिकार की रक्षा एक महिला के जीवन और उसकी गरिमा की कीमत पर नहीं की जा सकती है। इसके अतिरिक्त न्यायालय ने अपने फैसले में कई अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला जो समाज में पितृसत्तात्मक सत्ता से जुड़ी विषमता को दूर करने में सहायक हो सकते हैं।

निर्णय का महत्त्व:

यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली महिलाओं पर अक्सर विश्वास नहीं किया जाता है और उनसे सवाल पूछे जाते हैं जिनका उद्देश्य उन्हें चुप कराना तथा उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाना होता है। उच्च न्यायालय का निर्णय इस प्रकार के सवालों का जवाब देने की कोशिश करता है।

  • दुर्व्यवहार के बारे में तत्काल क्यों नहीं बताया गया? उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में समाज से यह समझने का आग्रह किया कि “कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात के कारण वर्षों तक घटना के बारे में खुलकर नहीं बोल पाता।" साथ ही न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि महिलाओं को दशकों बाद भी अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बोलने का अधिकार है।
    • मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने बताया कि एक महिला का अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के विरुद्ध बोलने का अधिकार समय बीतने के साथ सीमित नहीं होता।
  • आपराधिक मामला दर्ज करने के बजाय मीडिया या सोशल मीडिया का सहारा क्यों लिया गया? न्यायालय ने अपने निर्णय में तर्क दिया कि संस्थागत तंत्र महिलाओं की सुरक्षा या न्याय प्रदान करने में प्रणालीगत रूप से विफल रहा है।
    • ऐसे में पीड़ितों द्वारा अपनी आत्म-रक्षा में मीडिया या सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्मों पर अपने बयान को साझा करना न्यायसंगत है।
  • उपलब्ध साक्ष्य क्या है? इस निर्णय में कहा गया कि चूँकि यौन उत्पीड़न आमतौर पर निजी स्थलों पर होता है, इसलिये महिलाओं की गवाही को सिर्फ इसलिये असत्य या मानहानि के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता है कि वे अपने आरोपों की पुष्टि करने के लिये अन्य गवाहों को प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं।
  • पुरुष की प्रतिष्ठा पर प्रश्न? जब भी कोई पेशेवर महिला शक्तिशाली पुरुषों के खिलाफ न्याय प्राप्त करने का प्रयास करती है, तो आमतौर पर आरोपी के खिलाफ काफी रोष देखने को मिलता है और ऐसे पुरुष की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचती है।
    • प्रिया रमानी के फैसले में उच्च न्यायालय ने यह रेखंकित किया कि मानहानि की आपराधिक शिकायत के बहाने एक महिला को यौन शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिये दंडित नहीं किया जा सकता है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त प्रतिष्ठा के अधिकार की रक्षा किसी दूसरे के जीवन और सम्मान/गरिमा की कीमत पर नहीं की जा सकती है।

निर्णय का प्रभाव:

रमानी फैसला #MeToo आंदोलन की एक बहुत बड़ी नैतिक जीत है और उम्मीद है कि यह पीड़ितों की आवाज़ दबाने के लिये शक्तिशाली पुरुषों को मानहानि कानून का दुरुपयोग करने से रोकेगा। हालाँकि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अकेले व्यक्ति तक सीमित होने के बजाय एक संस्थागत समस्या है।

  • महिला उत्पीड़न: विश्व भर में नियोक्ताओं द्वारा महिला कर्मचारियों को नियंत्रित करने के लिये यौन उत्पीड़न एक प्रमुख माध्यम/हथियार रहा है। कई रिपोर्टों के अनुसार, भारत और बांग्लादेश में कपड़ा कारखानों में काम करने वाले कम-से-कम 60% श्रमिक कार्यस्थल पर उत्पीड़न का सामना करते हैं।
    • भारत में इस प्रकार के भेदभाव तथा पुरुषों को पहले से ही प्राप्त दंडमुक्ति पर प्रश्न उठाना अधिक कठिन है। मनोरंजन उद्योग में महिलाओं को ऐसे दुर्व्यवहार के विरूद्ध आवाज़ उठाने के लिये विरोध का सामना करना पड़ता है, जबकि कई मामलों में गंभीर अपराधों के आरोप के बावजूद पुरुषों को उनके पद पर पुनः बहाल कर दिया गया है।
  • कमज़ोर वर्गों के लिये चुनौती: घरेलू श्रमिकों, कारखाना श्रमिकों, स्ट्रीट वेंडर्स, स्वच्छता और अपशिष्ट श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों आदि के लिये श्रम कानून या यौन उत्पीड़न के खिलाफ बने कानून केवल कागज़ों तक ही सीमित हैं।
    • ऐसे में अपने मालिक के विरुद्ध आवाज़ उठाने का अर्थ है कि तत्काल नौकरी और वेतन का नुकसान।
  • यूनियन बनाने में नई कठिनाई: नई श्रम संहिता के तहत सरकार द्वारा ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार करने की परिकल्पना की गई है। इस संदर्भ में नई श्रम संहिता अब श्रमिकों को यूनियन बनाने के लिये हतोत्साहित करती है।
    • ऐसे में यौन उत्पीड़न से लड़ने वाली ऐसी महिला कार्यकर्त्ता जिनका संघर्ष इन संहिताओं से प्रभावित होता है, को अधिक समर्थन और उनके प्रति ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

रमानी फैसला #MeToo आंदोलन की एक बहुत बड़ी नैतिक जीत है और उम्मीद है कि यह पीड़ितों की आवाज़ दबाने के लिये शक्तिशाली पुरुषों को मानहानि कानून का दुरुपयोग करने से रोकेगा। हालाँकि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न एक सामाजिक समस्या है जिसकी जड़ें समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता से जुड़ी हुई हैं।

ऐसे में इस तरह के न्यायिक फैसलों के अलावा समाज को एक सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता है ताकि महिलाओं के साथ समानता, निष्पक्षता और सम्मान के साथ व्यवहार किया जा सके।

अभ्यास प्रश्न: एम.जे. अकबर बनाम प्रिया रमानी मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय भारत के #मीटू (#MeToo) आंदोलन और महिला अधिकारों के संघर्ष में एक मील के पत्थर के रूप में कार्य कर सकता है। समीक्षा कीजिये।

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