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चक्रीय अर्थव्यवस्था: एक अनुकरणीय विचार

  • 20 Jun 2019
  • 9 min read

इस Editorial में 18 जून को The Hindustan Times में प्रकाशित संपादकीय Circular Economy: An Idea Worth Emulating का विश्लेषण करते हुए इसके सभी पक्षों पर चर्चा की गई है।

संदर्भ

हाल ही में नीति आयोग के अध्यक्ष अमिताभ कांत ने फिक्की (Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry-FICCI) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सतत विकास और संसाधन दक्षता को समय की आवश्यकता बताते हुए चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के मॉडल पर विचार करने का सुझाव दिया।

क्या है चक्रीय अर्थव्यवस्था?

  • इसमें एक ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था की अवधारणा पर काम किया जाता है जो टिकाऊ (Sustainable) हो और उसमें नवीन संसाधनों का इस्तेमाल न्यूनतम हो।
  • इसमें एक बार इस्तेमाल करो और फेंको (Use Once & Throw) मॉडल की जीवनशैली में बदलाव की बात की जाती है। यह रैखिक अर्थव्यवस्था से विपरीत है।
  • यह एक पुनर्सर्जक व्यवस्था है जिसमें निविष्ट संसाधन, बर्बादी, उत्सर्जन, ऊर्जा लीकेज आदि को विभिन्न उपाय अपनाकर न्यूनतम कर दिया जाता है।
  • संसाधनों की कमी और अभाव जैसी परिस्थितियों में संसाधनों का न्यायोचित उपयोग केवल संसाधन सक्षमता या दक्षता से संभव है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था में द्वितीयक संसाधन अर्थात् अनुपयोगी सामग्री का इस्तेमाल वस्तुओं के उत्पादन में किया जाता है।
  • संसाधन सक्षमता और चक्रीय अर्थव्यवस्था न केवल भौतिक जीवन चक्र में, बल्कि खपत के बाद के चरण में भी सतत विकास के प्रमुख तत्त्व हैं ।

संसाधन दक्षता/सक्षमता

चक्रीय अर्थव्यवस्था में संसाधनों का दक्षतम इस्तेमाल किया जाता है। संसाधन दक्षता से तात्पर्य कम-से-कम संभावित संसाधन इनपुट के साथ अधिकतम संभावित लाभ प्राप्त करने की एक रणनीति पर काम करना है। संसाधन दक्षता को बढ़ावा देने का लक्ष्य संसाधन उपयोगिता को उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी तरीके से बेहतर करना है। ऐसे न्‍यायपूर्ण संसाधनों का उपयोग सतत विकास के तीनों आयामों- आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरण के लिये काफी फायदेमंद है। संसाधन दक्षता के जरिये कुछ ही सामग्रियों का इस्तेमाल करके अधिकतम की प्राप्ति की जा सकती है। जीवन-चक्र दृष्टिकोण के ज़रिये पर्यावरण एवं संबंधित सामाजिक बोझ को कम किया जा सकता है। अपशिष्‍ट को संसाधन में बदलकर संसाधन सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

वर्ष 2024 तक 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था

हाल ही में नीति आयोग की संचालन समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को वर्ष 2024 तक 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को चुनौतीपूर्ण, लेकिन हासिल कर सकने योग्य बताया। मार्च 2019 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 2750 अरब डॉलर रहा। चक्रीय अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाकर भारत 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर हो सकता है।

चीन में हो चुका है काफी काम

चीन ने भी इसी रास्ते का अनुसरण कर अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाया है। वहां की पंचवर्षीय योजना के लिये चीन का राष्ट्रीय विकास व सुधार आयोग चक्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियाँ तैयार करता हैं। विश्व में पहली राष्ट्रीय चक्रीय आर्थिक परियोजना का कार्यान्वयन भी चीन में ही किया जा रहा है, जिसमें ऊर्जा दक्षता पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। चीन में आधुनिक चक्रीय अर्थव्यवस्था अनुसंधान केंद्र आदि संस्थाएँ चक्रीय अर्थव्यवस्था को एक नये स्तर पर ले जाने के लिये काम करती हैं और उन्होंने चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी तकनीक तथा उपकरण भी मुहैया कराए हैं। चीन आज जिस नीति पर काम कर रहा है उसमें उद्यमों के उत्पादन, आर्थिक विकास, ऊर्जा की किफायत और पर्यावरण संरक्षण के लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था को एक नवोदित तरीका माना जाता है। आज चीन की पंचवर्षीय योजनाओं सहित अन्य योजनाओं में चक्रीय अर्थव्यवस्था को पर्याप्त महत्त्व दिया जाता है।

नीति आयोग का क्या है कहना?

  • नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने देश में चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल की ओर अंतरण को प्रोत्साहित करने के लिये कानून बनाने पर विचार करने को कहा है।
  • अमिताभ कांत चक्रीय अर्थव्यवस्था के वास्तविक लाभों की गणना करते हुए बताते हैं कि आने वाले 5-7 सालों में इससे लाखों नए उद्यमी सामने आएँगे तथा लगभग 15 मिलियन रोज़गार सृजित होंगे।
  • अर्थव्यवस्था में अपशिष्ट निर्माण की मात्रा को कम कर, टिकाऊ उत्पादों के प्रयोग को बढ़ाकर और दिन-प्रतिदिन के उत्पाद निर्मित करने के लिये अधिकाधिक जैव-अपघट्य सामग्री का उपयोग कर चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा जा सकता है।
  • संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट के अनुसार एक दशक से भी कम समय में भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा। यह तब हो रहा है जब अनुमान है कि हमारी विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक होगी।
  • इन दो वज़हों से देश में सभी प्रकार की वस्तुओं की मांग में अत्यधिक वृद्धि होना अवश्यंभावी है। उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में सतत नवोन्मेष से अपशिष्ट का उत्पादन बढ़ रहा है।
  • हमारे दिन-प्रतिदिन के क्रिया-कलापों से अर्थव्यवस्था और अधिक व्यावसायिक होती जा रही है, यहाँ तक कि भोज्य पदार्थों से संबंधित अपशिष्ट, जैसे- दूध के पैकेटों और पानी की बोतलों का ढेर लगता जा रहा है।
  • भारत के बड़े शहरों में ठोस अपशिष्ट निपटान पहले ही एक गंभीर समस्या है और यथास्थिति इन मुद्दों को हल करने में कोई मदद नहीं कर सकती।
  • वर्तमान में अपशिष्ट उत्पन्न करने वाले अधिकतर कारकों को इसके निपटान की आर्थिक लागत नहीं चुकानी पड़ती। लेकिन अब हमारे पर्यावरण पर आर्थिक विकास के बोझ को कम करना मात्र पसंद की बात नहीं रह गई है।

वर्ष 2050 तक विश्व की जनसंख्या 9.7 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है,जिसमें से 3 बिलियन लोग मध्यम वर्ग के उपभोग स्तर तक पहुँच जाएंगे। इसके लिये प्रति व्यक्ति 71 प्रतिशत अधिक संसाधनों की आवश्यकता होगी अर्थात् वर्ष 2014 में कुल सामग्री की मांग 50 बिलियन टन थी जो वर्ष 2050 में बढ़कर 130 बिलियन टन हो जाएगी। ऐसे में चक्रीय अर्थव्यवस्था अपनाने के अलावा कोई अन्य विकल्प कारगर नहीं हो सकेगा।

भारत जैसे देशों के सामने दो ही रास्ते हैं...या तो चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसे सुविचारित सुधार लागू करें या अराजकता और अव्यवस्था का सामना करें। इसके लिये गैर-सरकारी संगठनों को शामिल कर चक्रीय अर्थव्यवस्था को लेकर जागरूकता उत्पन्न करने और इसे राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में बढ़ावा देने की आवश्यकता है। चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा में संसाधन दक्षता के बिना कुछ भी संभव नहीं है और इसने हाल के वर्षों में सतत विकास के लिये नीति लक्ष्य के रूप में प्रमुख स्थान बना लिया है।

अभ्यास प्रश्न: भारत के संदर्भ में चक्रीय अर्थव्यवस्था के गुण-दोषों की तर्क सहित विवेचना कीजिये।

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