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कृषि

बाजरा: सुपरफूड

  • 24 Oct 2020
  • 13 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में एक सुपरफूड के रूप में बाजरे (Millets) के उपभोग, उत्पादन एवं पोषक तत्त्वों की महत्ता से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

बाजरे (Millets) को अक्सर एक सुपरफूड (पोषण तत्त्वों से भरपूर अनाज) के रूप में देखा जाता है तथा इसका उत्पादन टिकाऊ कृषि एवं विश्व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। बाजरे से जुड़े बहुआयामी लाभ तथा मुद्दे, पोषण सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा प्रणाली एवं किसानों के कल्याण से संबंधित मुद्दों को संदर्भित करते हैं।

इसके अलावा बाजरे से जुड़ी कई अनूठी विशेषताएँ हैं जो भारत की विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हैं और इसे एक प्रमुख फसल के रूप में संदर्भित करती हैं। इन सब  कारकों के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2018 को पहले ही बाजरे के राष्ट्रीय वर्ष (National Year of Millets) के रूप में घोषित किया जा चुका है तथा साथ ही भारत द्वारा वर्ष 2023 कोबाजरे का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष(International Year of Millets) के रूप में घोषित करने का आह्वान किया गया है।

हालाँकि एक सुपरफूड के रूप में इसके महत्त्व को स्वीकार करने के बावज़ूद इसके प्रति एक आम धारणा बनी हुई  है कि बाजरे को ‘गरीब व्यक्ति के भोजन’ (Poor Person’s Food) के रूप में देखा जाता है। इसलिये मोटे अनाज एवं बाजरे जैसे पोषक तत्त्वों से भरपूर अनाजों को पुनः बढ़ावा देने के साथ उनके उत्पादन एवं खपत पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

भारत में बाजरे का उत्पादन:

  • वर्तमान में भारत में उगाई जाने वाली तीन प्रमुख बाजरा फसलों (Millet Crops ) में  ज्वार (Sorghum), बाजरा (Pearl Millet) और रागी (Finger Millet) शामिल हैं।
    • इसके साथ ही भारत में जैव-आनुवंशिक तौर पर विविध और देशज किस्मों के रूप में छोटे बाजरे की विभिन्न किस्मों जैसे- कोदो (Kodo), कुटकी (Kutki), चेन्ना (Chenna) और सानवा (Sanwa) को  प्रचुर मात्रा में उगाया जाता है।
  •  भारत में बाजरा उत्पादक प्रमुख राज्यों में राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा शामिल हैं।

बाजरे की उपज को बढ़ावा देने की आवश्यकता:

  • क्लाइमेट रेज़िलिएंट क्रॉप:  बाजरे की फसल प्रतिकूल जलवायु, कीटों एवं बीमारियों के लिये अधिक प्रतिरोधी है, अतः यह बदलते वैश्विक जलवायु परिवर्तनों में भुखमरी से निपटने हेतु एक स्थायी खाद्य स्रोत साबित हो सकती है।
    • इसके अलावा इस फसल की सिंचाई के लिये अधिक जल की आवश्यकता नहीं  होती है जिस कारण यह जलवायु परिवर्तन एवं लचीली कृषि-खाद्य प्रणालियों के निर्माण के लिये एक स्थायी रणनीति बनाने में सहायक है।
  • पोषण सुरक्षा: बाजरे में आहार युक्त फाइबर (Dietary Fibre) भरपूर मात्रा में विद्यमान होता है, इस पोषक अनाज (बाजरे) में  लोहा, फोलेट (Folate), कैल्शियम, ज़स्ता, मैग्नीशियम, फास्फोरस, तांबा, विटामिन एवं एंटीऑक्सिडेंट सहित अन्य कई पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में होते हैं।
    • ये पोषक तत्त्व न केवल बच्चों के स्वस्थ विकास के लिये महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि वयस्कों में हृदय रोग और मधुमेह के जोखिम को कम करने में भी सहायक होते हैं।
    • ग्लूटेन फ्री (Gluten Free) एवं ग्लाइसेमिक इंडेक्स (Glycemic Index) की कमी से युक्त बाजरा डायबिटिक/मधुमेह के पीड़ित व्यक्तियों के लिये एक उचित खाद्य पदार्थ है, साथ ही यह  हृदय संबंधी बीमारियों और पोषण संबंधी दिमागी बीमारियों से निपटने में मदद कर सकता है।
  • आर्थिक सुरक्षा: बाजरे को सूखे, कम उपजाऊ, पहाड़ी, आदिवासी और वर्षा आश्रित क्षेत्रों में उगाया जा सकता है।
    • इसके अलावा बाजरा मिट्टी की पोषकता के लिये भी अच्छा होता है तथा इसकी फसल तैयार होने में लगने वाली समयावधि एवं फसल लागत दोनों ही कम हैं।
    • इन विशेषताओं के साथ  बाजरे के उत्पादन के लिये कम निवेश की आवश्यकता होती है और इस प्रकार यह किसानों के लिये एक स्थायी आय स्रोत साबित हो सकता है।

बाजरे का नियंत्रित उत्पादन:

  • हरित क्रांति: हरित क्रांति के समय खाद्य सुरक्षा के लिये गेहूँ और चावल जैसी अधिक उपज वाली किस्मों पर ध्यान केंद्रित किया गया। 
    • इस नीति का एक अनपेक्षित परिणाम यह सामने आया कि बाजरे के उत्पादन में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी।
    • इसके अलावा गेहूँ और चावल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से प्रदान की जाने वाली लागत प्रोत्साहन राशि ने भी बाजरे के उत्पादन को हतोत्साहित किया।
  • प्रसंस्कृत खाद्य की मांग में वृद्धि: इन सब के साथ-साथ भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और रेडी-टू-ईट उत्पादों के लिये उपभोक्ता मांग में उछाल देखा गया जिनमें सोडियम, चीनी, ट्रांस-वसा और यहाँ तक कि कुछ कार्सिनोजन (Carcinogens- कैंसर उत्पन्न करने वाले तत्त्व) की उच्च मात्रा विद्यमान होती हैं।
    • प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के गहन विपणन के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसंस्कृत  खाद्य पदार्थों जैसे- प्रसंस्कृत चावल व गेहूँ  की मांग में भी वृद्धि होती जा रही है।
  • दोहरा दवाब: माताओं एवं बच्चों में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के साथ-साथ मधुमेह एवं मोटापे जैसी बीमारियाँ उत्पन्न होने के कारण एक प्रकार का दोहरा दवाब उत्पन्न हो गया है।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम: 

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price-MSP) में वृद्धि: भारत सरकार द्वारा  बाजरे के MSP में बढ़ोतरी की गई है, जिससे किसान बाजरा उत्पादन के लिये प्रोत्साहित होंगे।
    • इसके अलावा बाजरे की उपज के लिये एक स्थिर बाज़ार प्रदान करने के लिये भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बाजरे को भी शामिल किया गया है।
  • इनपुट सहायता (Input Support): बाजरे के उत्पादन के लिये भारत सरकार द्वारा किसानों को बीज किट (Seed Kits) और इनपुट सहायता के रूप में किसान उत्पादक संगठनों (Farmer Producer Organisations) के माध्यम से मूल्य शृंखला का निर्माण और बाजरे के लिये बाज़ार क्षमता को विकसित करने में मदद की जा रही है।
  • एकीकृत दृष्टिकोण: केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कृषि और पोषण के एकीकृत दृष्टिकोण पर कार्य किया जा रहा है जिसके तहत पोषक तत्त्व-उद्यानों (Nutri-gardens) की स्थापना करके फसल विविधता और आहार विविधता के बीच अंतर संबद्धता पर शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा पोषक तत्त्वों से युक्त अनाज के प्रति उपभोक्ता मांग में वृद्धि के लिये लोगों के दृष्टिकोण/व्यवहार को परिवर्तित करने से संबंधित एक अभियान का संचालन किया जा रहा है।

आगे की राह:

  • पूर्व धारणा में बदलाव: बाजरे से संबंधित खपत एवं इसके व्यापार को लेकर जुड़ी सामान्य अवधारणा को परिवर्तित करने के साथ-साथ पोषक तत्त्वों से भरपूर अनाज के रूप में बाजरे  को पुनः एक ब्रांड के तौर पर प्रस्तुत किये जाने की आवश्यकता है। 
    • इसके अलावा नागरिक समाज (Civil Society) पोषक युक्त खाद्य पदार्थों को चुनने की दिशा में छोटे-छोटे अभियानों के माध्यम से जन-कल्याण की शुरुआत कर सकते हैं, जो पर्यावरण के लिये हितकर होने के साथ ही राष्ट्र के किसानों की आर्थिक समृद्धि में भी सहायक हो सकते हैं।
  • गेहूँ और चावल की तर्ज पर बाजरे के लिये MSP: बाजरे के उत्पादन एवं उपभोग को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार गेहूँ और चावल की तर्ज पर बाजरे की फसल के लिये भी पायलट आधार पर  MSP प्रदान करने का प्रयास कर सकती है।
  • मिशन मोड पहल: भारत सरकार किसानों को भारत के 127 कृषि जलवायु क्षेत्रों (Agro-Climatic Zones) के लिये उनके स्थानीय फसल पैटर्न को संरेखित करने हेतु  प्रोत्साहित कर सकती है और स्थानीय स्थलाकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों को ध्यान में रखते हुए बाजरे की खेती को बढ़ावा दे सकती है।
  • अंतर-मंत्रालयी दृष्टिकोण: बाजरे को पुनः एक ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिये एक बहु-मंत्रालयी नीति ढाँचे (Multi-ministerial Policy Framework) के निर्माण की आवश्यकता है जिसका उद्देश्य एक आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना हो, साथ ही आत्मनिर्भर भारत और सतत् विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये इसका वैश्विक स्तर पर आह्वान किया जाए।

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निष्कर्ष:

  • जैसा कि भारत सरकार कुपोषण मुक्त भारत और किसानों की आय दोगुना करने के लिये अपने एजेंडे को प्राप्त करने के लिये प्रयासरत है, वहीँ पोषक तत्त्वों से युक्त अनाजों (बाजरे) के उत्पादन एवं खपत को बढ़ावा देना सही दिशा में एक नीतिगत बदलाव होगा।

अभ्यास प्रश्न: बाजरे से जुड़े बहुआयामी लाभों को देखते हुए पोषक तत्त्वों से युक्त अनाज के रूप में बाजरे को पुनः ब्रांड के तौर पर स्थापित करना और उसके उत्पादन एवं खपत को बढ़ावा देना आवश्यक है। टिप्पणी कीजिये। 

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