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SBM-ग्रामीण को और अधिक रचनात्मक बनाना

  • 07 Feb 2024
  • 26 min read

यह एडिटोरियल 06/02/2024 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “A critical view of the ‘sanitation miracle’ in rural India” लेख पर आधारित है। इसमें स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण (SBM-G) के कार्यान्वयन की पड़ताल की गई है और सरकार के लिये इस आवश्यकता पर बल दिया गया है कि वह वर्तमान कार्यक्रम में मौजूद कमियों को चिह्नित करे ताकि ODF से आगे बढ़ते हुए ODF+ की स्थिति वर्ष 2024-25 तक प्राप्त की जा सके।

प्रिलिम्स के लिये:

स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण, खुले में शौच मुक्त स्थिति, गोबर धन, स्वच्छ विद्यालय अभियान, सतत् विकास लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र

मेन्स के लिये:

स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G) के कार्यान्वयन संबंधी मुद्दे।

देश में सार्वजनिक स्वच्छता कार्यक्रमों का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1986 में उच्च सब्सिडीयुक्त केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (Central Rural Sanitation Programme- CRSP) के शुभारंभ के साथ हो गई थी। वर्ष 1999 में शुरू हुए संपूर्ण स्वच्छता अभियान (Total Sanitation Campaign) ने उच्च सब्सिडीयुक्त व्यवस्था से निम्न सब्सिडीयुक्त व्यवस्था और मांग-संचालित दृष्टिकोण की ओर बदलाव को चिह्नित किया।

वर्ष 2014 में स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G) के तहत सार्वजनिक स्वच्छता कार्यक्रम का एक मिशन के रूप में उभार हुआ, जिसका लक्ष्य अक्टूबर 2019 तक भारत को खुले में शौच मुक्त (Open Defecation Free- ODF) बनाना था। 

पिछले दशक में स्वच्छता कवरेज में सुधार भारत में प्रमुख सार्वजनिक नीति चमत्कारों (public policy miracles) में से एक रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिकल्पित 17 सतत् विकास लक्ष्यों में ‘जल एवं स्वच्छता तक पहुँच’ छठा लक्ष्य (Goal 6) है।

स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण (SBM-G):

  • परिचय:
    • इसे जल शक्ति मंत्रालय द्वारा सार्वभौमिक स्वच्छता कवरेज प्राप्त करने के प्रयासों में तेज़ी लाने और स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित करने के लिये लॉन्च किया गया था।
    • इस मिशन को एक राष्ट्रव्यापी अभियान/जनआंदोलन के रूप में लागू किया गया था जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच या ODF को समाप्त करना था।
  • SBM-G चरण-I:
    • 2 अक्टूबर 2014 को SBM-G के आरंभ के समय देश में ग्रामीण स्वच्छता कवरेज 38.7% बताया गया था।
    • मिशन के आरंभ के बाद से 10 करोड़ से अधिक व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 2 अक्टूबर 2019 तक सभी राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों ने स्वयं को ODF घोषित कर दिया।
  • SBM-G चरण-II:
    • यह चरण I के तहत प्राप्त उपलब्धियों की संवहनीयता और ग्रामीण भारत में ठोस/तरल एवं प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (Solid/Liquid & plastic Waste Management- SLWM) के लिये पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करने पर बल देता है।
    • इसे वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक मिशन मोड में 1,40,881 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय के साथ लागू किया जाएगा। 
    • ODF+ के SLWM घटक की निगरानी इन 4 प्रमुख क्षेत्रों के आउटपुट-आउटकम संकेतकों के आधार पर की जाएगी:
      • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन,
      • जैव-अपघट्य ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (पशु अपशिष्ट प्रबंधन सहित),
      • ग्रेवाटर (घरेलू अपशिष्ट जल) प्रबंधन
      • मल कीचड़ प्रबंधन
  • SBM के उप-घटक:
    • गोबर-धन (GOBAR-DHAN - Galvanizing Organic Bio-Agro Resources) योजना:
      • इसे वर्ष 2018 में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा लॉन्च किया गया था।
      • योजना का लक्ष्य जैव-अपघट्य अपशिष्ट को संपीडित बायोगैस (CBG) में परिवर्तित कर किसानों की आय बढ़ाना है।
    • व्यक्तिगत घरेलू शौचालय (Individual Household Latrines- IHHL):
      • SBM के तहत लोगों को शौचालय निर्माण के लिये लगभग 15 हज़ार रुपए दिए जाते हैं।
    • स्वच्छ विद्यालय अभियान:
      • शिक्षा मंत्रालय ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत स्वच्छ विद्यालय अभियान लॉन्च किया जिसका लक्ष्य एक वर्ष के भीतर सभी सरकारी विद्यालयों में बालकों एवं बालिकाओं के लिये अलग-अलग शौचालय उपलब्ध कराना था।
    • ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान:
      • स्वच्छता ही सेवा (SHS) अभियान हर वर्ष 15 सितंबर से 2 अक्टूबर तक पेयजल एवं स्वच्छता विभाग (DDWS) और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के संयुक्त तत्वावधान में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जन जागरूकता पैदा करने पर लक्षित श्रमदान गतिविधियाँ चलाने के लिये आयोजित किया जाता है। इसके उद्देश्य हैं:
        • SBM के कार्यान्वयन पर प्रोत्साहन प्रदान करना;
        • संपूर्ण स्वच्छ ग्राम के महत्त्व का प्रसार करना;
        • प्रत्येक व्यक्ति के हित के रूप में स्वच्छता की अवधारणा को सुदृढ़ करना;
        • राष्ट्रव्यापी भागीदारी के साथ स्वच्छ भारत दिवस (2 अक्टूबर) की प्रस्तावना के रूप में।
  • शीर्ष प्रदर्शनकर्ता राज्य:
    • शीर्ष प्रदर्शनकर्ता राज्य/केंद्रशासित प्रदेश, जिन्होंने 100% ODF+ ग्राम हासिल किये हैं, वे हैं: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादर एवं नगर हवेली, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, केरल, लद्दाख, पुदुचेरी, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना और त्रिपुरा।
      • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा नगर हवेली और दमन दीव, जम्मू और कश्मीर तथा सिक्किम में 100% ODF+ मॉडल ग्राम मौजूद हैं।
      • इन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ODF+ का दर्जा हासिल करने में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है और उनके प्रयास इस मील के पत्थर तक पहुँचने में सहायक रहे हैं। 

ODF का दर्जा:

  • ODF: किसी क्षेत्र को ODF के रूप में अधिसूचित या घोषित किया जा सकता है यदि दिन के किसी भी समय किसी भी व्यक्ति को खुले में शौच करते नहीं पाया जाता है।
  • ODF+: यह दर्जा तब दिया जाता है जब दिन के किसी भी समय, कोई भी व्यक्ति खुले में शौच और/या पेशाब करते हुए नहीं पाया जाता है और सभी सामुदायिक एवं सार्वजनिक शौचालय क्रियाशील एवं सुचारू व्यवस्था प्रकट करते हैं।
  • ODF++: यह दर्जा तब दिया जाता है जब कोई क्षेत्र पहले से ही ODF+ की स्थिति रखता है और वहाँ मल कीचड़/सेप्टेज एवं सीवेज को सुरक्षित रूप से प्रबंधित एवं उपचारित किया जाता है तथा जहाँ अनुपचारित मल कीचड़ एवं सीवेज को खुली नालियों, जल निकायों या क्षेत्रों में प्रवाहित या डंप नहीं किया जाता है।

SBM-G के तहत ODF से ODF+ स्थिति में संक्रमण से जुड़े प्रमुख मुद्दे:

  • व्यवहार संबंधी चुनौतियाँ:
    • शौचालयों के निर्माण से उनका स्वतः उपयोग भी शुरू नहीं हो जाता। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के सर्वेक्षण (69वें दौर) से पता चला कि वर्ष 2012 में जबकि 59% ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय तक पहुँच नहीं थी, शौचालय की सुविधा रखने वाले लोगों में से 4% इसका उपयोग नहीं कर रहे थे।
      • इसका उपयोग न करने के प्राथमिक कारणों में शामिल थे: अधिरचना का अभाव (21%); सुविधा में खराबी (22%); सुविधा का अस्वास्थ्यकर/अस्वच्छ होना (20%); और व्यक्तिगत कारण (23%)।
  • क्षेत्र विशिष्ट चुनौतियाँ: 
    • तीन राज्यों के सबसे अच्छे और सबसे खराब कवरेज वाले ज़िलों एवं प्रखंडों को दायरे में लेते हुए कराये गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि बिहार में 59%, गुजरात में 66% और तेलंगाना में 76% घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध थी।
    • शौचालय सुविधा रखने वाले घरों में, बिहार में 38%, गुजरात में 50% और तेलंगाना में 14% घरों में कम से कम एक ऐसा सदस्य मौजूद था जो इसका उपयोग नहीं करता था।
      • गुजरात में शौचालयों का अधिक ग़ैर-उपयोग दाहोद ज़िले में (सर्वेक्षण के लिये चुने गए राज्य के दो ज़िलों में से एक) जल तक पहुँच की कमी के कारण था।
      • दूरदराज के और पिछड़े गाँवों में शौचालय का उपयोग व्यापक रूप से किया जा रहा था यदि घरों में जल तक पहुँच हो। यदि किसी घर में अलग बाथरूम हो तो भी शौचालय के उपयोग की संभावना कम हो जाती है।
  • शुद्धता के पारंपरिक मानदंडों से जुड़े मुद्दे:
    • वर्ष 2020 में एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि गुजरात में सर्वेक्षित गाँवों में 27% और पश्चिम बंगाल में 61% घरों में अपने शौचालय नहीं थे। इसके अलावा, दोनों ही राज्यों में लगभग 3% परिवार अपने स्वयं के शौचालयों का उपयोग नहीं कर रहे थे।
      • एक-चौथाई ग़ैर-उपयोगकर्ता परिवारों ने इसका उपयोग न करने का कोई विशेष कारण नहीं बताया। ऐसा माना गया कि शुद्धता के सामाजिक मानदंडों ने उन्हें शौचालय का उपयोग करने से हतोत्साहित किया होगा।
      • शौच के लिये उपयोग न किये जाने वाले शौचालयों का उपयोग भंडारगृह के रूप में किया जा रहा था। यदि सामाजिक मानदंड गृह परिसर में शौचालय के उपयोग को अवरुद्ध करते हैं तो इस सुविधा का उपयोग स्नान और कपड़े धोने के लिये किया जाता है।
  • गुणवत्ता संबंधी मुद्दे:
    • गुणवत्ता संबंधी मुद्दे भी एक अन्य प्रमुख कारण हैं। गुजरात में, शौचालयों का उपयोग नहीं करने वालों में से 17% ने बताया कि उप-संरचना ढह गई थी और 50% ने बताया कि गड्ढे भर गए थे।
    • पश्चिम बंगाल में ग़ैर-उपयोगकर्ताओं में से एक-तिहाई ने बताया कि अधिरचना ढह गई थी, जबकि अन्य एक-तिहाई ने बताया कि गड्ढा भर गया था।
  • शौचालयों तक पहुँच के संबंध में विभिन्न सर्वेक्षण के निष्कर्षों में भिन्नताएँ:
    • शौचालयों तक पहुँच रखने वाले परिवारों और उनके उपयोग के प्रतिशत के बारे में विभिन्न सर्वेक्षण निष्कर्षों में भिन्नताएँ विभिन्न ज़िलों के चयन के कारण हैं। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित अधिक व्यापक राष्ट्रीय वार्षिक ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण (National Annual Rural Sanitation Survey- NARSS) के तीसरे दौर (2019-20) से पता चलता है कि भारत में 95% ग्रामीण आबादी की शौचालय तक पहुँच थी।
    • स्वामित्वपूर्ण, साझा और सार्वजनिक शौचालयों तक पहुँच क्रमशः 79%, 14% और 1% घरों तक उपलब्ध थी। यह भी पाया गया कि 96% शौचालय क्रियाशील थे और लगभग सभी में जल की सुविधा उपलब्ध थी।
      • हालाँकि, इसी रिपोर्ट से पता चलता है कि केवल 85% ग्रामीण आबादी सुरक्षित, क्रियाशील और स्वच्छ शौचालयों का उपयोग करती है। यह मानते हुए कि जितने प्रतिशत घरों की शौचालय तक पहुँच है, उतने ही प्रतिशत लोगों की भी पहुँच है, शौचालय तक पहुँच और उनके उपयोग के बीच अंतराल 10% तक बढ़ जाता है।
  • परिवार के आकार से जुड़ी बाधाएँ:
    • विभिन्न अर्थमितीय मॉडल दर्शाते हैं कि शौचालय का उपयोग आर्थिक स्थिति और शिक्षा के साथ-साथ परिवार के आकार पर भी निर्भर करता है। परिवार का आकार जितना बड़ा होगा, शौचालय का उपयोग न करने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।
      • अत्यधिक भीड़भाड़ और सामाजिक मानदंड घर के सभी सदस्यों को एक ही शौचालय का उपयोग करने से बाधित करते हैं। वर्ष 2020 के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि केवल 3% से 4% घरों में ही एक से अधिक शौचालय मौजूद हैं।
  • SBM-G के चरण-II से संबद्ध चिंताएँ:
    • कार्यक्रम के इस दूसरे चरण में एक निश्चित आकार से बड़े घरों के लिये एकाधिक शौचालयों को अनिवार्य करने वाला कोई मानदंड मौजूद नहीं है। इसमें ‘अटैच बाथरूम’ बनाने का भी कोई प्रावधान नहीं है।
  • जल जीवन मिशन की असंलग्न भूमिका:
    • जल जीवन मिशन (JJM) कार्यक्रम वर्ष 2024 तक प्रत्येक घर में नल का जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। लेकिन JJM पर किये गए प्रति व्यक्ति केंद्रीय व्यय और राज्यों में ODF+ घोषित गाँवों के प्रतिशत के बीच कोई संबंध नहीं देखा गया है।
      • न ही किसी राज्य में ODF+ गाँवों के प्रतिशत और नल कनेक्शन रखने वाले घरों के बीच कोई संबंध पाया गया है।
  • सामाजिक-आर्थिक वर्गों में भिन्नताएँ:
    • स्वच्छता व्यवहार के संबंध में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों में भिन्नता देखी गई है। NARSS-3 से पता चलता है कि शौचालयों तक पहुँच उच्च जातियों के लिये सबसे अधिक (97%) और अनुसूचित जातियों के लिये सबसे कम (95%) थी। बहु-राज्य अध्ययन से पता चलता है कि ग़ैर-उपयोगकर्ताओं का प्रतिशत पिछड़ी जातियों की तुलना में उच्च जातियों में अधिक है। 
  • तालमेल का अभाव:
    • SBM-G के आरंभिक चरण के दौरान वर्ष 2014 से 2019 के बीच लगभग 10 करोड़ शौचालयों का निर्माण किया गया। कवरेज में इस उछाल ने सुरक्षित स्वच्छता अभ्यासों के बारे में जागरूकता भी पैदा की है।
    • हालाँकि, देश में सामूहिक व्यवहार परिवर्तन होना अभी भी बाकी है। अध्ययन से पता चलता है कि स्वच्छता के सबंध में व्यवहार परिवर्तन स्वतंत्र रूप से घटित नहीं हो सकता।
      • यह सामाजिक नेटवर्क और जीवन स्तर में समग्र सुधार पर निर्भर है, जिसमें बेहतर आवास और बुनियादी सेवाओं तक पहुँच शामिल है।
    • इनमें से प्रत्येक बुनियादी आवश्यकता के लिये अलग-अलग कार्यक्रम मौजूद हैं, लेकिन वे अच्छी तरह से समन्वित नहीं हैं। भारत में समग्र योजना की कमी के कारण कार्यक्रमों में तालमेल की कमी है, जबकि बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में उच्च स्तर का व्यय किया जा रहा है।

SBM-G को और अधिक प्रभावी बनाने के उपाय:

  • छूटे हुए परिवारों को मुख्यधारा में लाना:
    • ये सर्वेक्षण दो प्रमुख मुद्दे सामने लाते हैं— छूटे हुए घर और शौच के लिये अप्रयुक्त शौचालय। छूटे हुए घर पर्याप्त संख्या में दिखाई देते हैं और उन्हें चरण II में दायरे में लेने की आवश्यकता है।
    • दूसरी ओर, सरकार को पिछले चरण की कमियों को चिह्नित करना चाहिये और वर्तमान चरण में उन कमियों को दूर करना चाहिये।
  • व्यवहार परिवर्तन अभियान चलाना:
    • स्वच्छता व्यवहार परिवर्तन संबंधी अभियानों को दो चरणों पर विचार करना चाहिये: निर्माण और उपयोग। इसके अलावा, अभियान अभिकल्पना में गाँवों के बीच नेटवर्क में भिन्नता पर विचार किया जाना चाहिये क्योंकि कुछ गाँवों में परिवारों का व्यवहारिक परिवर्तन स्वतंत्र रूप से और अन्य में सामूहिक रूप से घटित हो सकता है।
      • ऐसा प्रतीत होता है कि SBMG के दूसरे चरण में प्रतिगामी मानदंडों और जाति पदानुक्रम से ग्रस्त समाज में सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से सोशल इंजीनियरिंग पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है।
      • देश के लोकप्रिय सिने अभिनेताओं द्वारा अभिनीत ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ जैसी फ़िल्मों को ग्रामीण भारत में प्रदर्शित एवं प्रचारित किया जाना चाहिये।
        • इससे आम जनता के बीच शौचालय के उपयोग की आवश्यकता और स्वच्छ एवं सुरक्षित घरेलू स्वच्छता अभ्यासों को अपनाने के बारे में जागरूकता बढ़ सकती है।
  • समावेशी दृष्टिकोण अपनाना:
    • समाज के वंचित वर्गों से संबंधित कुछ व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों जैसे कि महिला मुखिया वाले परिवार, भूमिहीन लोग, प्रवासी मज़दूर और दिव्यांगजनों के पास अभी भी उनके घरों में शौचालय नहीं हैं या मौजूदा शौचालय अभिगम्य नहीं हैं।
      • मानवाधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोणों से इस वंचित आबादी का समर्थन करना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हाशिये पर स्थित ये वर्ग पहले से ही बुनियादी सेवाओं तक पहुँच से वंचित हैं और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव करते हैं।
  • संस्थानों की भूमिका में वृद्धि:
    • शैक्षणिक संस्थानों, बाल देखभाल केंद्रों, अस्पतालों और अन्य सरकारी सुविधाओं को स्वच्छता अभ्यासों में और प्रगति की आवश्यकता है। सार्वजनिक सुविधाओं और समाज के वंचित वर्गों के बीच स्वच्छता कवरेज के उप-श्रेणियों में विभेदित डेटा (disaggregated data) को नवाचार की आवश्यकता है ताकि छूटी हुई आबादी को कवर किया जा सके।
  • समग्र और विस्तारित दृष्टिकोण का पालन:
    • विविधता, संस्कृति और आबादी के मामले में भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ कुल आबादी का 60% ग्रामीण क्षेत्रों में वास करती है, केवल शौचालयों तक पहुँच ही स्वच्छ एवं सुरक्षित स्वच्छता अभ्यासों को सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त नहीं है।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 1986 में शुरू किये गए भारत के पहले स्वच्छता कार्यक्रम ‘केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम’ से सबक प्राप्त हुआ कि केवल शौचालय निर्माण से शौचालय का उपयोग नहीं होने लगता।
      • भारत को वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्य 6 (SDG 6), यानी ‘सभी के लिये जल और स्वच्छता तक पहुँच सुनिश्चित करना’ हासिल करने के लिये सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आयामों से हटकर अन्य कई कारकों पर विचार करने की आवश्यकता है।
  • प्रौद्योगिकियों को अंगीकरण और एकीकरण:
    • राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित मोबाइल ऐप, MIS, डैशबोर्ड APIs सहित विभिन्न ई-गवर्नेंस समाधानों को शामिल करने की आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य विभिन्न राज्यों में ODF+ की प्रगति को ट्रैक करना है।
      • SBM-G का ई-गवर्नेंस समाधान एक सुदृढ़, इंटर-ऑपरेबल, स्केलेबल, सुरक्षित और भूमिका-आधारित प्रणाली हो जो उपयोगकर्ता को मोबाइल ऐप का उपयोग कर भौगोलिक निर्देशांक के साथ ठोस एवं तरल अपशिष्ट की सभी संपत्तियों को दर्ज करने में सक्षम बनाती हो।

निष्कर्ष:

भारत ने स्वच्छ भारत मिशन जैसी पहलों के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करते हुए स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2019 तक 100% स्वच्छता कवरेज हासिल करना सराहनीय है और सरकार वर्ष 2024-25 तक ODF+ की स्थिति प्राप्त करने का लक्ष्य रखती है। ¬लगभग 85% गाँव पहले ही ODF+ की स्थिति प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन चुनौतियाँ अभी बनी हुई हैं, जो व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता को उजागर करती है। संवहनीय सफलता के लिये सामाजिक-आर्थिक कारकों और सामाजिक मानदंडों के अनुरूप दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।

अभ्यास प्रश्न: स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण (SBM-G) ने ग्रामीण स्वच्छता प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित किया है और भारत में संवहनीय स्वच्छता कवरेज प्राप्त करने के लिये अब भी कौन-सी चुनौतियाँ बनी हुई हैं?

  सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

मेन्स:

प्रश्न. "जल, सफाई और स्वच्छता आवश्यकता को लक्षित करने वाली नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये लाभार्थी वर्गों की पहचान को प्रत्याशित परिणामों के साथ जोड़ना होगा।" ‘वाश’ योजना के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिये। (2017)

प्रश्न. निरंतर उत्पन्न किये जा रहे और फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्रा का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे जहरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2021)

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