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WTO के अपीलीय निकाय में सुधार

  • 06 Feb 2024
  • 25 min read

यह एडिटोरियल 05/02/2024 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Crown Jewel That Was” लेख पर आधारित है। इसमें वर्ष 2019 के उत्तरार्द्ध के बाद से WTO के अपीलीय निकाय (AB) में आई अक्षमता की पड़ताल की गई है, जहाँ इसकी शिथिलता के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा उत्पन्न एकतरफा बाधा को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है, जिससे नए सदस्यों की नियुक्ति बाधित हो गई है।

प्रिलिम्स के लिये:

WTO, व्यापार और टैरिफ पर सामान्य समझौता (GATT), सब्सिडी बॉक्स, सब्सिडी और काउंटरवेलिंग शुल्क पर WTO का समझौता, कृषि पर WTO का समझौता

मेन्स के लिये:

WTO सुधार और विकासशील देशों पर इसका प्रभाव, WTO में सुधारों के संदर्भ में भारत के सुझाव।

विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation- WTO) के सदस्य देश फ़रवरी 2024 में आहूत 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक के लिये अबू धाबी में मिलेंगे तो संगठन के विवाद निपटान तंत्र (Dispute Settlement Mechanism- DSM) में जारी संकट उनके लिये वार्ता का एक प्रमुख एजेंडा होगा। WTO के DSM में एक पैनल और एक अपीलीय निकाय (Appellate Body- AB) के साथ एक बाध्यकारी दो-स्तरीय प्रक्रिया शामिल है। वर्ष 2019 के उत्तरार्द्ध के बाद से यह निष्क्रिय बना हुआ है क्योंकि अमेरिका (जिसे AB के समक्ष प्रस्तुत कई महत्त्वपूर्ण विवादों में हार का सामना करना पड़ा है) ने एकतरफा तरीके से नए सदस्यों की नियुक्ति को बाधित कर रखा है।

WTO का विवाद निपटान तंत्र (DSM):

  • परामर्श:
    • औपचारिक विवाद शुरू करने से पहले, शिकायत करने वाले पक्ष को बचाव पक्ष से परामर्श का अनुरोध करना चाहिये। वार्ता के माध्यम से विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में यह पहला कदम होता है।
    • यह परामर्श विशिष्ट समयसीमा के भीतर आयोजित किया जाना चाहिये और इसमें शामिल पक्षकारों को पारस्परिक रूप से सहमत समाधान खोजने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है।
  • पैनल स्थापना:
    • यदि परामर्श विवाद को हल करने में विफल रहता है तो शिकायत करने वाला पक्ष विवाद निपटान पैनल की स्थापना का अनुरोध कर सकता है। विवाद निपटान निकाय (Dispute Settlement Body- DSB) इस प्रक्रिया की निगरानी करता है।
    • WTO सदस्यों के बीच विवादों के निपटान के लिये DSB के रूप में सामान्य परिषद (General Council) आहूत कि जाती है। DSB के पास निम्नलिखित शक्तियाँ हैं:
      • विवाद निपटान पैनल स्थापित करना,
      • मामलों को मध्यस्थता (arbitration) के लिये संदर्भित करना;
      • पैनल, अपीलीय निकाय और मध्यस्थता रिपोर्ट को अपनाना;
      • ऐसी रिपोर्टों में निहित सिफ़ारिशों और निर्णयों के कार्यान्वयन पर निगरानी बनाए रखना; और
      • उन सिफ़ारिशों और निर्णयों के ग़ैर-अनुपालन की स्थिति में रियायतों के निलंबन को अधिकृत करना।
    • पैनल का निर्माण व्यापार कानून और विवाद की विषय वस्तु में प्रासंगिक विशेषज्ञता रखने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञों से किया जाता है। पैनल मामले की जाँच करता है, दोनों पक्षों के तर्कों की समीक्षा करता है और एक रिपोर्ट जारी करता है।
  • पैनल रिपोर्ट:
    • पैनल की रिपोर्ट में तथ्य के निष्कर्ष, कानूनी व्याख्याएँ और समाधान के लिये सिफ़ारिशें शामिल होती हैं। इसे सभी WTO सदस्यों के बीच प्रसारित किया जाता है, जिससे उन्हें इसकी समीक्षा करने और अपनी टिप्पणियाँ प्रदान करने की अनुमति मिलती है।
  • अंगीकरण या अपील:
    • DSB इस पैनल रिपोर्ट को अंगीकृत करता है यदि ऐसा करने के विरुद्ध आम सहमति न हो। यदि आम सहमति नहीं बनती है तो मामले की अपील अपीलीय निकाय के समक्ष की जा सकती है।
    • WTO का अपीलीय निकाय:
      • अपीलीय निकाय (Appellate Body) की स्थापना वर्ष 1995 में विवाद निपटान को नियंत्रित करने वाले नियमों एवं प्रक्रियाओं पर समझौता (Understanding on Rules and Procedures Governing the Settlement of Disputes- DSU) के अनुच्छेद 17 के तहत की गई थी।
      • यह सात-सदस्यीय स्थायी निकाय है जो WTO सदस्यों द्वारा उठाये गए विवादों पर पैनल द्वारा जारी रिपोर्टों पर की गई अपील की सुनवाई करता है। अपीलीय निकाय के सदस्य चार वर्ष के कार्यकाल के लिये नियुक्त किये जाते हैं।
      • यह पैनल के कानूनी अन्वेषण और निष्कर्षों को बरकरार रख सकता है, संशोधित कर सकता है या उन्हें पलट सकता है। अपीलीय निकाय की रिपोर्ट, यदि DSB द्वारा अंगीकृत कर ली जाती है तो फिर यह विवाद में शामिल पक्षकारों पर बाध्यकारी होती है।
      • अपीलीय निकाय की सीट जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
  • सिफारिशों का कार्यान्वयन:
    • यदि कोई WTO सदस्य अपने दायित्वों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है तो उससे WTO समझौतों के अनुपालन में अपने उपाय लागू करने की उम्मीद की जाती है।
    • यदि सदस्य ऐसा करने में विफल रहता है तो शिकायतकर्ता प्राधिकार से उस पर रियायतों या अन्य उपायों के निलंबन के माध्यम से जवाबी कार्रवाई करने की मांग कर सकता है।

अमेरिका द्वारा WTO के लिये कौन-सी एकतरफा चुनौतियाँ पेश की गई हैं?

  • WTO मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC11), 2017:
    • ब्यूनस आयर्स में आयोजित सम्मेलन बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गया क्योंकि 164 सदस्यीय निकाय में आम सहमति नहीं बन पाई।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका ने खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों के लिये सरकारी स्टॉकहोल्डिंग पर स्थायी समाधान को अवरुद्ध कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ई-कॉमर्स और निवेश सुविधा सहित नए मुद्दों पर भारत अपना रुख सख्त करने के लिये बाध्य हुआ।
  • ई-कॉमर्स वार्ता:
    • अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के नेतृत्व में विकसित देशों ने WTO के भीतर ई-कॉमर्स, निवेश सुविधा और MSMEs पर बड़े दबाव समूहों का निर्माण कर (जहाँ प्रत्येक सूत्रीकरण में 70 से अधिक देश शामिल थे) WTO वार्ताओं में जारी गतिरोध से बाहर निकलने का रास्ता खोजने की कोशिश की।
      • यद्यपि WTO आम सहमति से संचालित होता है और यहाँ तक कि किसी बहुपक्षीय समझौते के लिये भी सभी सदस्यों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है, इन समूहों के गठन से WTO को बहुपक्षवाद पर अपने फोकस से दूर करने का प्रयास किया जाता है क्योंकि ये सुधार बड़े पैमाने पर विकासशील देशों (जैसे G-77 आदि) द्वारा समर्थित नहीं हैं।
  • TRIPS के विवादास्पद प्रावधानों का बचाव:
    • अमेरिका द्वारा व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकारों (Trade Related Intellectual Property’ rights- TRIPs)—जिसमें पेटेंट, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क शामिल हैं, का कठोर बचाव किया जाता है और स्वास्थ्य एवं मानव जीवन की परवाह नहीं की जाती है।
    • WTO ने उप-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के देशों में (जहाँ हर दिन HIV/AIDS से हज़ारों लोगों की मौत हो जाती है) जीवनरक्षक दवाएँ प्रदान कर अपने लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा का प्रयास करने वाली सरकारों के विरुद्ध फार्मास्युटिकल कंपनियों के ‘लाभ के अधिकार’ की रक्षा की है।
  • व्यापार वार्ता के दोहा दौर के मुद्दे:
    • अमेरिका ने अत्यधिक मांगें तैयार करने के रूप में, जिनकी पूर्ति के लिये कोई देश तैयार नहीं था, जानबूझकर दोहा दौर की व्यापार वार्ता प्रक्रिया को प्रभावित किया।
    • अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकता यह नहीं थी कि गतिरोध की शिकार WTO वार्ता को पुनर्जीवित किया जाए, बल्कि वह अपने प्रतिस्पर्द्धियों यूरोप और चीन को नियंत्रित करने के लिये अपने नवनिर्मित विकल्प TPP (Trans-Pacific Partnership) पर केंद्रित था।
  • अपीलीय निकाय के सदस्यों की नियुक्ति को बाधित करना:
    • कई वर्षों से व्यापार विवादों के निपटारे की बहुपक्षीय प्रणाली गहन संवीक्षा और निरंतर आलोचना के अधीन रही है।
    • अमेरिका ने व्यवस्थित रूप से अपीलीय निकाय के नए सदस्यों और न्यायाधीशों की नियुक्ति को अवरुद्ध कर रखा है और वास्तविक रूप से WTO अपील तंत्र के कार्यकरण को बाधित किया है।
      • वर्ष 2024 तक एक पूर्ण सक्रिय DSM का निर्माण करने के संकल्प के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों को ‘डी-ज्युडिशियलाइज़’ करने की अमेरिका की प्रवृत्ति विवाद निपटान तंत्र को पुनर्जीवित करने (जैसा वह वर्ष 2019 से पहले रहा था) की राह में एक बड़ी चुनौती है। 
  • एकतरफा टैरिफ उपायों का आक्रामक उपयोग:
    • संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा एकतरफा टैरिफ उपायों का आक्रामक उपयोग, चीन का वणिकवाद (mercantilism) और आधुनिक अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण नए क्षेत्रों में विषयों का विस्तार करने के मामले में आम सहमति तक पहुँच सकने की WTO सदस्यों की असमर्थता WTO की आलोचना को और आधार प्रदान करती है।
  • देशों को परिभाषित करने में आम सहमति का अभाव:
    • WTO वार्ताओं में एक समस्या यह भी है कि WTO में विकसित या विकासशील देश कौन हैं, इसकी कोई सहमत परिभाषा मौजूद नहीं है।
    • वर्तमान में सदस्य देश ‘विशेष और विभेदक व्यवहार’ (special and differential treatment) प्राप्त करने के लिये स्वयं को विकासशील देश के रूप में निर्दिष्ट कर सकते हैं, जो एक ऐसा अभ्यास है जो व्यापक विवाद का विषय रहा है।
      • उदाहरण के लिये, चीन और भारत को WTO में ‘विकासशील देश’ का दर्जा प्राप्त हुआ, जो एक विवादास्पद मुद्दा बन गया और अमेरिका एवं यूरोपीय संघ ने इस निर्णय के विरुद्ध चिंता जताई।
  • भारत की पहलों को अमेरिका द्वारा बाधित किया जाना:
    • भारतीय इस्पात उत्पादों पर अमेरिका द्वारा प्रतिकारी शुल्क लगाना, गैर-आप्रवासी वीजा के मामले में अमेरिका द्वारा किये गए उपाय, अमेरिका के नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम और अमेरिका द्वारा इस्पात एवं एल्यूमीनियम उत्पादों पर लगाए गए आयात शुल्क आदि वे विवाद के विषय हैं जहाँ भारत एक वादी या शिकायतकर्ता पक्ष है।
      • पोल्ट्री एवं पोल्ट्री उत्पादों के आयात पर भारत द्वारा प्रतिबंध पर अमेरिका की शिकायत और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की कुछ वस्तुओं पर भारत के आयात शुल्क पर यूरोपीय संघ, जापान एवं ताइवान द्वारा दर्ज की गई शिकायत, ऐसे कुछ मामले हैं जहाँ भारत WTO में एक प्रतिवादी पक्ष है।

विश्व व्यापार संगठन में सुधार के क्या उपाय हैं?

  • नए सदस्यों की नियुक्ति के प्रस्ताव का समर्थन करना:
    • आमतौर पर अपीलीय निकाय में नई नियुक्तियाँ WTO सदस्यों की आम सहमति से की जाती हैं, लेकिन जहाँ आम सहमति संभव नहीं है वहाँ मतदान का भी प्रावधान है।
    • भारत सहित 17 अल्पविकसित और विकासशील देशों का समूह, जो अपीलीय निकाय में गतिरोध को समाप्त करने के लिये मिलकर कार्य करने के लिये प्रतिबद्ध है, इस आशय का एक प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकता है और मतदान बहुमत से अपीलीय निकाय में नए सदस्यों को शामिल करने का प्रयास कर सकता है। 
      • लेकिन इसके दुष्परिणाम भी उत्पन्न हो सकते हैं, क्योंकि सभी देश प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के वीटो का विरोध करने पर उसकी ओर से एकतरफा कार्रवाइयों का भय रखते हैं।
  • विधि उल्लंघन पर उपयुक्त दंड:
    • यदि किसी देश ने कुछ गलत किया है तो उसे शीघ्रता से अपनी गलतियों को सुधारना चाहिये। यदि वह किसी समझौते का उल्लंघन जारी रखता है तो उसे मुआवजे की पेशकश करनी चाहिये या उचित प्रतिक्रिया का सामना करना चाहिये जिसमें कुछ उपचार (remedy) शामिल हो –हालाँकि यह वास्तव में कोई दंड नहीं है, बल्कि एक ‘उपचार’ है और किसी भी देश के लिये नियमों का पालन करना ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिये।
      • दोषी पाए जाने पर ऐसे देशों को ‘हरित जलवायु कोष’ में अनिवार्य रूप से एक विशेष राशि जमा करने के लिये बाध्य किया जा सकता है।
  • सुधारात्मक दृष्टिकोण:
    • सुधारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित स्थायी दीर्घकालिक समाधानों में निवर्तमान सदस्यों के लिये एक संक्रमणकालीन नियम शामिल हो सकता है, जो उन्हें अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद भी लंबित अपीलों को पूरी तरह से निपटाने की अनुमति देता हो और नीतिगत क्षेत्र का अतिक्रमण किये बिना सहमत राष्ट्रीय कानूनों के अर्थ की अपीलीय निकाय द्वारा व्याख्या को सीमित करता हो, ताकि राष्ट्रों की संप्रभुता को सुरक्षित रखा जा सके।
  • सदस्यों की नियमित बैठक:
    • अन्य दीर्घकालिक समाधानों में प्रभावी संचार और तत्काल निवारण तंत्र सुनिश्चित करने के लिये अपीलीय निकाय के साथ WTO सदस्यों की नियमित बैठकें आयोजित करना शामिल हैं।
      • इस प्रकार, सभी देशों को संकट से निपटने के लिये एक साथ आना चाहिये ताकि सबसे खराब परिदृश्य का सामना न करना पड़े।
  • DSM पुनर्बहाली के लिये विकासशील देशों का आह्वान:
    • भारत सहित अन्य विकासशील देश, WTO के विवाद निपटान तंत्र (DSM) को उसकी पिछली कार्यात्मक स्थिति में बहाल करने की वकालत कर रहे हैं, जहाँ वे अपीलीय निकाय द्वारा प्रदत्त नियंत्रण एवं संतुलन के महत्त्व पर बल देते हैं।
  • विकासशील देशों के लिये विकल्प:
    • विकासशील देशों को WTO में दो-स्तरीय DSM बनाए रखने के लिये तीन विकल्पों का सामना करना पड़ता है: (a) यूरोपीय संघ के नेतृत्व वाली अंतरिम अपील मध्यस्थता व्यवस्था (Interim Appeal Arbitration Arrangement- MPIA) में शामिल होना, (b) एक कमज़ोर अपीलीय निकाय को स्वीकार करना, या (c) ऑप्ट-आउट प्रावधान वाले मूल अपीलीय निकाय को पुनर्जीवित करना।
      • अंतरिम समाधान के रूप में MPIA: विकासशील देशों के लिये पहला विकल्प यूरोपीय संघ के नेतृत्व वाले MPIA में शामिल होना है, जो एक बहुदलीय अंतरिम अपील मध्यस्थता व्यवस्था है जो मध्यस्थता तंत्र को औपचारिक बनाती है, लेकिन इसमें स्वैच्छिक प्रकृति और सार्वभौमिक अंगीकरण की कमी जैसी खामियाँ भी हैं।
      • कमज़ोर अपीलीय निकाय: दूसरे विकल्प में एक कमज़ोर (diluted) अपीलीय निकाय पर विचार करना शामिल है, जहाँ AB की शक्तियाँ सीमित होंगी, जो संभावित रूप से WTO कानून की अपेक्षाओं के विपरीत, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को सुरक्षा एवं पूर्वानुमान प्रदान करने की क्षमता में बाधा डालेगी।
      • अंतरिम समाधान के रूप में AB के लिये ऑप्ट-आउट प्रावधान: तीसरा अंतरिम विकल्प एक ऑप्ट-आउट प्रावधान के रूप में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव के साथ AB को पुनर्जीवित करने का सुझाव देता है। हालाँकि यह दो-स्तरीय बाध्यकारी DSM की प्रकृति को बदल सकता है, यह AB के वर्तमान स्वरूप को सुरक्षित रखने और स्वैच्छिक आधार पर अमेरिका को शामिल करने के संबंध में एक समझौते की स्थिति को इंगित कर सकता है।

निष्कर्ष

WTO की 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक अक्षम विवाद निपटान तंत्र (DSM) के महत्त्वपूर्ण मुद्दे का सामना करेगी, जो वर्ष 2019 से अमेरिका द्वारा अपीलीय निकाय में नए सदस्यों की नियुक्ति को रोकने का परिणाम है। पूरी तरह कार्यात्मक DSM की पुनर्बहाली के प्रयास को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि अमेरिका न्यायपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों के प्रति अनिच्छा रखता है। जबकि आदर्श समाधान यह होगा कि अपीलीय निकाय को वर्ष 2019 तक की पूर्वस्थिति में पुनर्बहाल किया जाए, इच्छुक देशों के लिये AB की स्थिति से समझौता करना WTO में उनकी आवश्यक भूमिका की रक्षा के लिये एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।

अभ्यास प्रश्न: चुनौतियों को संबोधित करने के लिये, विशेष रूप से विवाद निपटान तंत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए, विश्व व्यापार संगठन (WTO) में आवश्यक सुधारों और वैश्विक व्यापार प्रशासन पर इसके प्रभाव के बारे में चर्चा कीजिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न: भारत ने वस्तुओं के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 को किसके दायित्त्वों का पालन करने के लिये अधिनियमित किया? (2018)

(a) अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
(b) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(c) व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन
(d) विश्व व्यापार संगठन

उत्तर: (d)


प्रश्न. 'एग्रीमेंट ओन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ओन द एप्लीकेशन ऑफ सेनेटरी एंड फाइटोसेनेटरी मेज़र्स और 'पीस क्लाज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं; (2015)

(a) खाद्य और कृषि संगठन
(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रुपरेखा सम्मेलन
(c) विश्व व्यापार संगठन
(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में कभी-कभी समाचारों में 'एम्बर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016)

(a) WTO मामला
(b) SAARC मामला
(c) UNFCCC मामला
(d) FTA पर भारत-EU वार्ता

उत्तर: (a)


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. भारत ने विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुविधा समझौते (TFA) की पुष्टि की है।
  2.  TFA 2013 के WTO के बाली मंत्रिस्तरीय पैकेज का एक हिस्सा है।
  3.  TFA जनवरी 2016 में लागू हुआ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1 और 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (A)


प्रश्न. व्यापार-संबंधित निवेश उपाय (TRIMS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2020)

  1. विदेशी निवेशकों द्वारा आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध निषिद्ध हैं।
  2.  वे वस्तुओं और सेवाओं दोनों में व्यापार से संबंधित निवेश उपायों पर लागू होते हैं।
  3.  उन्हें विदेशी निवेश के नियमन से कोई सरोकार नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


मेन्स:

प्रश्न. विश्व व्यापार संगठन एक महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जहाँ लिये गए निर्णय देशों को गहराई से प्रभावित करते हैं। विश्व व्यापार संगठन का जनादेश क्या है और उसके निर्णय कितने बाध्यकारी हैं? खाद्य सुरक्षा पर वार्ता के नवीनतम दौर पर भारत के रुख का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (2014)

प्रश्न. “विश्व व्यापार संगठन के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन एवं प्रोन्नति करना है। लेकिन वार्ताओं की दोहा परिधि मृत्योन्मुखी प्रतीत होती है, जिसका कारण विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)

प्रश्न. यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन को जिंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)

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