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आभाषी न्यायालय: आवश्यकता और महत्त्व

  • 04 Jul 2020
  • 12 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में आभाषी न्यायालय की आवश्यकता और महत्त्व तथा उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

वैश्विक महामारी COVID-19 ने जहाँ एक ओर न्यायालयों के द्वारा संपादित किये जाने वाले कार्यों के समक्ष चुनौती उत्पन्न की है तो वहीं दूसरी ओर आवश्यक न्यायिक सुधारों का अवसर भी प्रदान किया है। ऐसा पहली बार हुआ है जब भारतीय न्यायिक व्यवस्था को इस प्रकार के संकट का सामना करना पड़ रहा है। एक सदी पूर्व स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu) महामारी के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यायालयों के पास ऐसे हालात में न्यायिक कार्य करने का पर्याप्त अनुभव रहा है।
इस विपदा के कारण लागू किये गए लॉकडाउन के बाद न्यायालयों ने न्यायिक कार्यों को पुनः प्रारंभ करने के लिये आभाषी न्यायालय (Virtual COURT) और ई-सुनवाई (E-hearings) जैसे तकनीकी दक्ष प्रोटोकॉल अपनाने की दिशा में तेज़ी से कार्य किया है। हालाँकि वर्ष 2017 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने यह घोषणा की थी कि अब सर्वोच्च न्यायालय व्यावहारिक रूप से कागज़ का प्रयोग किये बिना न्यायिक कार्य प्रारंभ करेगा, परंतु साइबर तकनीक को अपनाने के मामले में आकांक्षा के अनुरूप प्रगति नहीं हुई।

पृष्ठभूमि

  • सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने लोक जनहित याचिका (Public Interest litigation-PIL) दाखिल कर यह अनुरोध किया था कि राष्ट्रीय महत्त्व और संवैधानिक महत्त्व के मामलों की पहचान कर उन मामलों की रिकॉर्डिंग की जानी चाहिये और उनका सीधा प्रसारण भी किया जाना चाहिये।
  • वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिये संवैधानिक महत्त्व वाले मामलों में की जाने वाली न्यायिक कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग को अनुमति दे दी है।
  • सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जारी दिशा-निर्देश
  • आभाषी न्यायालय की अवधारणा के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को ‘व्यापक और समग्र दिशानिर्देश’ तैयार करने का निर्देश देने के साथ ही न्यायालयों में इस प्रक्रिया को पायलट परियोजना के आधार पर शुरू करने का आह्वान भी किया है।
  • यह परियोजना कई चरणों लागू की जाएगी।
  • चूँकि ‘न्यायालय की खुली सुनवाई’ के संबंध में संविधान में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure- CrPC), 1973 की धारा 327 और सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure- CPC), 1908 की धारा 153 (ख) के प्रावधानों का अनुसरण किया जा सकता है।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 327

  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 327 के अनुसार वह स्थान जहाँ कोई दंड न्यायालय किसी अपराध की जाँच या विचारण के प्रयोजन से बैठता है उसे खुला न्यायालय समझा जाएगा जिसमें जनता साधारणतः वहाँ तक प्रवेश कर सकेगी जहाँ तक कि वह सुविधापूर्वक उसमें एकत्र हो सके।
  • लेकिन, यदि पीठासीन न्यायाधीश ठीक समझे तो वह किसी विशिष्ट मामले की जाँच या विचारण के किसी भी प्रक्रम पर यह आदेश दे सकता है कि न्यायालय द्वारा उक्त प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल किये गए कमरे या भवन तक जनता अथवा किसी विशिष्ट व्यक्ति को न पहुँचने दिया जाए।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 153 (ख)

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 153ख के अनुसार, वह स्थान जहाँ किसी वाद के विचरण के प्रयोजन के लिये कोई सिविल न्यायालय लगता है तो उसे खुला न्यायालय समझा जाएगा और उसमें जनता की साधारणतः वहाँ तक पहुँच होगी जहाँ तक वह इसमें सुविधापूर्वक एकत्र हो सके।
  • लेकिन, यदि पीठासीन न्यायाधीश ठीक समझे तो वह किसी विशिष्ट मामले की जाँच या विचरण के किसी भी प्रक्रम पर यह आदेश दे सकता है कि न्यायालय द्वारा प्रयुक्त कमरे या भवन तक जनता या किसी विशिष्ट व्यक्ति की पहुँच नहीं होगी या वह उसमें नहीं आएगा या वह वहाँ नहीं रहेगा।

सरकार का पक्ष

  • राष्ट्रीय महत्त्व के मामलों में न्यायिक कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के लिये सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को गाइडलाइन्स तैयार कर न्यायालय में दाखिल करने के निर्देश जारी किये थे। अटार्नी जनरल द्वारा विस्तृत गाइडलाइन्स दाखिल करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
  • अटॉर्नी जनरल द्वारा दाखिल गाइडलाइन्स के अनुसार, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लाइव स्ट्रीमिंग की प्रक्रिया मुख्य न्यायाधीश के न्यायलय से शुरू होनी चाहिये और सफल होने पर इसे दूसरे न्यायालयों में लागू किया जा सकता है।
  • इसमें संवैधानिक मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिये। साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये कि वैवाहिक विवाद, नाबालिगों से जुडे मामले, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द से जुडे मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग न हो।
  • अटॉर्नी जनरल ने यह सुझाव भी दिया कि न्यायालय की भीड़-भाड़ को कम करने के लिये वादियों, पत्रकार, इंटर्न और वकीलों के लिये एक डिजिटल मीडिया रूम बनाया जा सकता है।
  • अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने यह सिफारिश भी की थी कि यदि सर्वोच्च न्यायालय चाहे तो सरकार, लोकसभा या राज्यसभा की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय एक अलग चैनल की व्यवस्था कर सकती है।

आभाषी न्यायालय के मार्ग में चुनौतियाँ

  • न्यायालयों के पास सामान्य बुनियादी ढाँचे (भवन, विद्युत, फर्नीचर) का अभाव है। ऐसे में आभाषी न्यायालय स्थापित करना दूर की कौड़ी सिद्ध होता दिख रहा है।
  • भारत में इंटरनेट की गति बहुत कम है जिससे न्यायिक कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग करना एक दुष्कर कार्य है।
  • लाइव स्ट्रीमिंग के संदर्भ में वादी-प्रतिवादी तथा न्यायिक कर्मचारियों व अधिकारियों में तकनीकी जागरूकता का अभाव है।
  • भारत में विभिन्न आयु समूहों के बीच संसाधनों की उपलब्धता के बीच अंतर को उजागर करते हुए, भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा है जिसमें उनसे लॉकडाउन के बाद ई-फाइलिंग और ई-सुनवाई की प्रणाली को जारी न रखने का आग्रह किया गया है।
    • परिषद ने बताया कि अधिकांश अधिवक्ता कमज़ोर पृष्ठभूमि से हैं, जिनके पास न तो संसाधन हैं और न ही ऐसी उन्नत तकनीक के अनुकूल शिक्षा है। इस प्रकार, न्यायालय के कार्य का डिजिटलाइजेशन ऐसे लोगों को उनकी आजीविका से वंचित कर देगा।
    • परिषद के अनुसार, न्याय वितरण प्रणाली में जब तकनीक की जरूरत होती है, तब वह सहायता कर सकती है, लेकिन तीनों संबंधित (न्यायाधीश और वादी-प्रतिवादी) पक्षों के साथ तीन अलग-अलग स्थानों पर बैठकर न्यायिक कार्यवाही को सुनने और निर्णय करने का प्रस्ताव समाज के आदर्श और व्यवहार से परे होगा।
    • वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग में पारदर्शिता को सुनिश्चित करना कठिन कार्य है, जबकि न्यायालय की खुली सुनवाई में न्याय को खुले न्यायालय में वितरित किया जाता है, न केवल संबंधित पक्षों और उनके वकीलों की उपस्थिति में चर्चा/तर्क दिये जाते हैं, बल्कि अन्य अधिवक्ताओं, मीडिया, और विधिक पक्षकारों की मौजूदगी में यह कार्य संपन्न होता है। न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिये, बल्कि न्याय होता हुआ भी दिखाई देना चाहिये।
  • ऐसा भी देखने को मिला है कि वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा होने वाली सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं द्वारा तय मानकों का पालन भी नहीं किया जा रहा है।

महत्त्व

  • सर्वोच्च न्यायालय ने विचार व्यक्त किया है कि खुले न्यायालय की अवधारणा ऐसे समय में विकसित हुई थी जब तकनीक उतनी उन्नत नहीं थी। हालाँकि वर्तमान में तकनीक ने हमारे जीवन के लगभग हर पहलू को प्रभावित किया है, वैश्विक महामारी के बाद उपजी परिस्थितियों में आभाषी न्यायालय की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है।
  • वैश्विक महामारी के बाद खुले न्यायालयों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना दुष्कर है, ऐसे में आभाषी न्यायालय सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का बेहतर क्रियान्वयन कर सकते हैं।
  • आभाषी न्यायालय की अवधारणा में प्रत्येक सुनवाई का समय निर्धारित किया जा सकता है, जिससे पक्षकारों और अधिवक्ताओं का अनावश्यक समय बर्बाद नहीं होगा, और न्यायिक मामलों में अनावश्यक विलंब भी नहीं होगा।
  • आभाषी न्यायालय की अवधारणा से अधिवक्ताओं द्वारा की जाने वाली अनावश्यक हड़तालों से मुक्ति मिलेगी।
  • आभाषी न्यायालय व ई-सुनवाई से मामलों को तेज़ी से निपटाया जा सकता है, जिससे भारतीय न्यायिक व्यवस्था मुकदमों के बोझ से मुक्त होगी।

प्रश्न- आभाषी न्यायालय से आप क्या समझते हैं? आभाषी न्यायालय के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।

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