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शासन व्यवस्था

आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता

  • 11 Dec 2019
  • 17 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली और उसमें सुधार की आवश्यकता के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

“मुझे यह देखकर अत्यंत दुख होता है कि देश की न्यायिक व्यवस्था लगभग ध्वस्त होने की कगार पर है। ये शब्द काफी कठोर हैं, परंतु इन शब्दों में काफी पीड़ा निहित है।”

- मुख्य न्यायाधीश पी एन भगवती (26 नवंबर, 1985)

संदर्भ

बीते दिनों बलात्कार के चार आरोपियों की मुठभेड़ में हुई मौत ने देश में ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग’, ‘फेक एनकाउंटर’ और ‘त्वरित न्याय’ जैसे मुद्दों को एक बार पुनः चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। इसी बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी दावा किया है कि बीते 2 वर्षों में राज्य में हुई कुल 5,178 मुठभेड़ों में 103 अपराधियों की मौत हुई है और लगभग 1,859 घायल हो गए। एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली लगभग ध्वस्त होने की कगार पर है और आम आदमी ने इसमें अपना भरोसा खो दिया है। जानकारों का कहना है कि ऐसे समय में आवश्यक है कि सरकार आपराधिक न्याय प्रणाली में यथासंभव सुधार करे ताकि देश की न्यायिक व्यवस्था पर एक बार फिर आम नागरिक का भरोसा कायम हो सके।

आपराधिक न्याय प्रणाली का अर्थ

  • आपराधिक न्याय प्रणाली का तात्पर्य सरकार की उन एजेंसियों से है जो कानून लागू करने, आपराधिक मामलों पर निर्णय देने और आपराधिक आचरण में सुधार करने हेतु कार्यरत हैं।
  • वास्तव में आपराधिक न्याय प्रणाली सामाजिक नियंत्रण का एक साधन होती है, क्योंकि समाज कुछ व्यवहारों को इतना खतरनाक और विनाशकारी मानता है कि वह उन्हें नियंत्रित करने का भरपूर प्रयास करता है।
    • इस प्रकार की घटनाओं को रोकने, उन्हें नियंत्रित करने और ऐसा करने वालों को दंडित करने का कार्य न्यायिक संस्थानों द्वारा किया जाता है।
  • आपराधिक न्याय प्रणाली के मूलतः 3 तत्त्व हैं:
    • कानून प्रवर्तन: कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ अपने निर्धारित क्षेत्राधिकार में अपराधों की रिपोर्ट करती हैं और इस संबंध में जाँच करती हैं। साथ ही उनका कार्य सभी आपराधिक साक्ष्यों को एकत्रित करना एवं उनकी रक्षा करना भी होता है। उल्लेखनीय है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है।
    • अधिनिर्णयन: अधिनिर्णयन संस्थाएँ आपराधिक न्याय प्रणाली का एक अभिन्न अंग हैं और इन्हें मुख्यतः 3 भागों में विभाजित किया गया है:
      • न्यायालय: न्यायालय की कार्रवाई न्यायाधीशों द्वारा नियंत्रित की जाती है। इनका मुख्य कार्य यह निर्धारित करना होता है कि किसी आरोपी ने अपराध किया है या नहीं और यदि किया है तो क्या सज़ा दी जानी चाहिये।
      • अभियोजन: अभियोजनकर्त्ता वे वकील होते हैं जो न्यायालय की संपूर्ण कार्रवाई में राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। अभियोजनकर्त्ता कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा एकत्रित साक्ष्यों की समीक्षा करता है और यह निर्णय लेता है कि क्या केस छोड़ देना चाहिये या मुकदमा दायर किया जाना चाहिये।
      • बचाव पक्ष का वकील: ये सरकार द्वारा दायर मुकदमे के विरुद्ध न्यायालय में आरोपी का प्रतिनिधित्व करते हैं। अदालत के मुकदमे हेतु बचाव पक्ष इन वकीलों को कुछ पारिश्रमिक पर नियुक्त करता है, परंतु यदि आरोपी इस कार्य हेतु समर्थ नहीं है तो न्यायलय द्वारा भी इसकी नियुक्ति की जाती है।
    • सुधारगृह या कारावास: इस संस्था का प्रमुख कार्य न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए गए अपराधियों की निगरानी करना एवं उन्हें बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करना है।

आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य

  • आपराधिक घटनाओं को रोकना।
  • अपराधियों को दंड देना।
  • अपराधियों के पुनर्वास की व्यवस्था करना।
  • पीड़ितों को यथासंभव मुआवज़ा देना।
  • समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना।

आपराधिक न्याय प्रणाली का विकास

  • भारत में आपराधिक न्याय का एक लंबा इतिहास है। इस संदर्भ में प्राचीन काल में विभिन्न प्रणालियों का विकास हुआ और विभिन्न शासकों द्वारा उन्हें लागू करने का यथासंभव प्रयास किया गया।
  • विदित है कि भारत में आपराधिक कानूनों का संहिताकरण ब्रिटिश शासन के दौरान किया गया था, जो कमोबेश 21वीं सदी में भी समान ही है।
  • सर्वप्रथम लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग (1774-85) ने तत्कालीन प्रचलित मुस्लिम आपराधिक न्याय प्रणाली के दोषों और असमानताओं की पहचान की।
  • हालाँकि इस संदर्भ में सबसे बड़ा परिवर्तन भारतीय दंड संहिता के निर्माण के साथ आया। भारतीय दंड संहिता (IPC) वर्ष 1860 में लॉर्ड थॉमस मैकाले की अध्यक्षता में गठित भारत के पहले विधि आयोग की सिफारिशों के आधार पर निर्मित की गई थी।
  • इसके अलावा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) को वर्ष 1973 में अधिनियमित किया गया और 1974 में इसे लागू किया गया।

आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता

कानून प्रवर्तन

  • देश में अधिकांशतः राज्यों में पुलिस की छवि जनता के साथ मित्रवत न होकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने वाली संस्था के रूप में रही है।
  • भ्रष्टाचार आज हमारे देश में संक्रामक रोग की तरह फैल चुका है । जब भ्रष्टाचार हमारे जीवन का एक अंग बन गया हो तो फिर पुलिस व्यवस्था कैसे इससे अछूती रह सकती है। हमारी पुलिस व्यवस्था में सुधार कर उसे बदलते वक्त के अनुरूप बनाना आवश्यक है।
  • आँकड़ों के अनुसार एक पुलिस अधिकारी औसतन एक दिन में लगभग 14 घंटे कार्य करता है, जबकि मॉडल पुलिस अधिनियम (Model Police Act) सिर्फ 8 घंटों की ड्यूटी की सिफारिश करता है। इसी वर्ष सितंबर में जारी एक रिपोर्ट में प्रत्येक दूसरे पुलिसकर्मी ने सप्ताह में एक भी अवकाश न मिलने की बात कही थी।
  • अत्यधिक कार्यभार के अलावा पुलिस विभाग को आवश्यक संसाधनों के अभाव का भी सामना करना पड़ता है। कुछ पुलिस स्टेशनों में पीने का पानी, स्वच्छ शौचालय, परिवहन, पर्याप्त कर्मचारी और नियमित खरीद के लिये धन जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।
  • उल्लेखनीय है कि वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (World Justice Project) द्वारा जारी रूल ऑफ लॉ इंडेक्स (Rule of Law Index) में भारत की रैंकिंग 126 देशों में 68वीं है।

अधिनिर्णयन

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार, न्यायिक प्रणाली में लगभग 3.5 करोड़ मामले लंबित हैं। इन कुल लंबित मामलों में से 80 प्रतिशत से अधिक मामले ज़िला और अधीनस्थ न्यायालयों में हैं।
    • लंबित मामलों का मुख्य कारण भारत में न्यायालयों की कमी, न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों का कम होना तथा पदों की रिक्त्तता है।
    • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार, ज़िला अदालतों और उच्च न्यायालयों में 20 लाख से अधिक आपराधिक मामले 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं।
  • यदि सिर्फ बलात्कार संबंधी मामलों की बात करें तो NCRB के वर्ष 2017 के आँकड़े बताते हैं कि देश में बलात्कार के कुल 1.27 लाख मामले अदालतों में विभिन्न चरणों में लंबित हैं।
  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 18 न्यायाधीश हैं। विधि आयोग की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि प्रति 10 लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या तकरीबन 50 होनी चाहिये।
    • गौरतलब है कि इस स्थिति तक पहुँचने के लिये पदों की संख्या बढ़ाकर तीन गुना करनी होगी।
  • इसी वर्ष नवंबर में जारी ‘इंडियन जस्टिस रिपोर्ट‘ के मुताबिक, देश भर में न्यायाधीशों के कुल स्वीकृत पदों में से लगभग 23 प्रतिशत पद खाली हैं। उल्लेखनीय है कि भारत अपने कुल बजट का मात्र 0.08 प्रतिशत हिस्सा ही न्यायतंत्र पर खर्च करता है।
  • इंडियन जस्टिस रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि वर्ष 2017-18 में देश में कानूनी सहायता पर प्रति व्यक्ति खर्च मात्र 0.75 रुपए प्रतिवर्ष था।

सुधारगृह या कारावास

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau-NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में भारतीय जेलों में क्षमता से 14 गुना अधिक कैदी बंद थे। वर्ष 2015 के बाद भी इन आँकड़ों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है, परंतु चिंतनीय स्थिति यह है कि इस अवधि में जेलों की संख्या में कुछ खास वृद्धि नहीं हुई है।

उपरोक्त आँकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि जेलों में कैदियों की स्थिति कितनी खराब है। जेल सांख्यिकी 2015 के अनुसार, जेल की खराब स्थिति के कारण वर्ष 2015 में कुल 1,584 लोगों की मृत्यु हो गई थी।

जानकारों के अनुसार, जेलों की खराब स्थिति और उसमें आवश्यकता से अधिक कैदी होने का मुख्य कारण न्यायालयों में लंबित मामलों की एक बड़ी संख्या है। वर्ष 2017 में सरकार ने सूचित किया था कि भारतीय न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख से अधिक हो गई है।

जेल सुधार के संदर्भ में कई सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने यह प्रश्न उठाया है कि भारतीय राजनेता इस ओर मात्र इसलिये ध्यान नहीं देते क्योंकि जेलों में बंद कैदी उनकी वोट बैंक सीमा में नहीं आते।

आपराधिक न्याय प्रणाली पर गठित प्रमुख समितियाँ

मलीमथ समिति

  • भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (CJS) में सुधार के लिये वर्ष 2000 में सरकार ने मलीमथ समिति का गठन किया था, ग़ौरतलब है कि इस समिति ने वर्ष 2003 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में 158 बदलावों का सुझाव दिया, परंतु इस समिति की सिफारिशें लागू नहीं की गईं।
  • समिति ने कहा था कि मौजूदा भारतीय न्याय प्रणाली ‘पीड़ितों को न्याय दिलाने की अपेक्षा अभियुक्तों को सज़ा देने पर ज़्यादा केंद्रित है।’
  • समिति की प्रमुख सिफारिशें
    • समिति ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये एक राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन करने तथा अनुच्छेद 124 को संशोधित कर न्यायाधीशों के महाभियोग की प्रक्रिया को आसान बनाने का सुझाव दिया था।
    • उच्च न्यायालयों में एक अलग आपराधिक डिविज़न होना चाहिये जिसमें केवल आपराधिक कानून में विशेषज्ञता प्राप्त न्यायाधीश की नियुक्ति की जाए।
    • समिति की सिफारिश थी कि न्यायालय को आवश्यकता महसूस होने पर किसी भी व्यक्ति को बुलाने का अधिकार होना चाहिये फिर चाहे वह गवाह के रूप में सूचीबद्ध हो या नहीं।
    • समिति ने न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि करने की भी अनुसंशा की थी।
    • समिति के अनुसार, गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक अलग गवाह संरक्षण कानून का निर्माण किया जाना चाहिये।
    • इसके अलावा अंतर्राज्यीय व अंतर्राष्ट्रीय अपराधों से निपटने के लिये संघीय कानून लाने, बलात्कारियों के लिये मृत्युदंड की बजाय आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान करने जैसी सिफारिशें भी शामिल थीं।

माधव मेनन समिति

  • आपराधिक न्याय सुधार पर माधव मेनन समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 2007 में प्रस्तुत की थी। गौरतलब है कि इस चार सदस्यीय समिति का गठन आपराधिक न्याय प्रणाली पर एक राष्ट्रीय नीति पत्र का मसौदा तैयार करने हेतु किया गया था।
  • प्रमुख सिफारिशें
    • इस समिति ने संपूर्ण आपराधिक न्याय प्रक्रिया में सुधार की बात की थी।
    • इसने देश की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले अपराधों से निपटने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अलग प्राधिकरण स्थापित करने का सुझाव दिया।

आगे की राह

  • भारतीय न्याय प्रणाली का वर्तमान स्वरूप कमोबेश ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए न्यायशास्त्र पर आधारित है, जिसे मुख्यतः किसी देश पर शासन करने के उद्देश्य से बनाया गया था। इसीलिये 19वीं सदी में निर्मित इस तंत्र की प्रासंगिकता 21वीं सदी में बहस के योग्य है।
  • हमें ‘त्वरित न्याय’ और ‘त्वरित अन्याय’ के बीच की विभाजन रेखा को पहचानना होगा और यह याद रखना होगा कि हमारा समाज कानून एवं संविधान द्वारा शासित होता है, जिसमें सभी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उन पर लगाए गए आरोपों को एक निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सिद्ध न कर दिया जाए।
  • भारतीय न्याय तंत्र को प्रक्रियागत परिवर्तनों की आवश्यकता है, ताकि इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
    • प्रक्रियागत परिवर्तन का अभिप्राय बहुत अधिक सत्तावादी बन चुके तंत्र को सरल बनाने से है।
  • सभी हितधारकों को समस्याओं की पहचान करनी चाहिये और समस्या को हल करने के सभी यथासंभव प्रयास करने चाहिये।

प्रश्न: भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में निहित समस्याओं की पहचान करते हुए इसमें सुधार हेतु उपायों पर चर्चा कीजिये।

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