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विशेष: नागरिकों के अधिकार और पुलिस सुधार

  • 26 May 2018
  • 20 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि 

हाल ही में गुजरात के जामनगर में प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी रविंद्र जडेजा की पत्नी रीवा सोलंकी के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार का मुद्दा चर्चा में रहा। उनकी कार एक पुलिसकर्मी की बाइक से टकरा गई थी, जिसके बाद पुलिसकर्मी ने क्रिकेटर रविंद्र जडेजा की पत्नी के साथ मारपीट की। इस घटना के बाद एक बार फिर पुलिस का बर्ताव, उसकी नागरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी और नागरिक अधिकारों का मुद्दा सतह पर आ गया है।

वैसे तो ऐसी रोड रेज की घटनाएँ शहरों की सड़कों पर रोज़ देखने को मिलती हैं, लेकिन इस मामले ने इसलिये तूल पकड़ लिया कि जिसके साथ मारपीट हुई वह एक सेलेब्रिटी की पत्नी है और जिस पर मारपीट का आरोप है वह एक पुलिसकर्मी है।

क्या है पुलिस व्यवस्था?

दरअसल, पुलिस बल राज्य द्वारा अधिकार प्रदत्त व्यक्तियों का एक निकाय है, जो राज्य द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करने, संपत्ति की रक्षा और नागरिक अव्यवस्था को सीमित रखने का कार्य करता है। पुलिस को प्रदान की गई शक्तियों में बल का वैध उपयोग करना भी शामिल है।

पुलिस की नकारात्मक छवि 

देश में अधिकांशतः राज्यों में पुलिस की छवि तानाशाहीपूर्ण, जनता के साथ मित्रवत न होना और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने की रही है। रोज़ ऐसे अनेक किस्से सुनने-पढने और देखने को मिलते हैं, जिनमें पुलिस द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया जाता है। पुलिस का नाम लेते ही प्रताड़ना, क्रूरता, अमानवीय व्यवहार, रौब, उगाही, रिश्वत आदि जैसे शब्द दिमाग में कौंध जाते हैं। जिस पुलिस को आम आदमी का दोस्त होना चाहिये, वही आम आदमी पुलिस का नाम सुनते ही सिहर जाता है और यथासंभव प्रयास कर इनके चक्कर में पड़ने से बचता है। इसीलिये शायद भारतीय समाज में यह कहावत प्रचलित है कि पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी।

 157 साल पुराना है भारतीय पुलिस अधिनियम 

1861 के इंडियन पुलिस एक्ट के तहत जो पुलिस फोर्स बनाई गई थी, उसका काम था ब्रिटिश शासित भारत में कानून का राज बनाए रखना और उस राज को मज़बूती से बचाए रखना। लेकिन आज 21वीं सदी में भी भारत में 157 साल पुराना ब्रिटिश इंडिया का पुलिस अधिनियम चलता है। तब से लेकर आज तक समय-समय पर हुए संशोधनों के साथ वही कानून अमल में लाया जा रहा है। 

देश में पुलिस तंत्र की स्थापना औपनिवेशिक समय में कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिये की गई थी। भले ही अंग्रेज़ों का मूल मंतव्य भारतीय नागरिकों को दबाए रखने का रहा हो, पर आज भी सामाजिक सुरक्षा और जनजीवन को भयमुक्त तथा सुचारु रूप से चलाना पुलिस तंत्र का ही दायित्व है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

 पुलिस सुधारों के लिये विभिन्न आयोग तथा समितियाँ

देश में पुलिस सुधारों की मांग कोई नई नहीं है, कई समितियाँ और आयोग पुलिस सुधारों को दिशा देने के लिये गठित किये गए, लेकिन उनकी रिपोर्टों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1902-03 में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय पुलिस आयोग ने इस दिशा में पहला प्रयास किया था। उसके बाद इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर छह और राज्य स्तर पर पाँच आयोगों का गठन किया जा चुका है।

धर्मवीर आयोग (राष्ट्रीय पुलिस आयोग)

पुलिस सुधारों को लेकर 1977 में धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को राष्ट्रीय पुलिस आयोग कहा जाता है। चार वर्षों में इस आयोग ने आठ रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी थीं, लेकिन इसकी सिफारिशों पर कुछ नहीं हुआ। इस आयोग की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं:

  • हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए
  • जाँच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग किया जाए
  • पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए 
  • पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय किया जाए 
  • एक नया पुलिस अधिनियम बनाया जाए

इस आयोग के बाद भी पुलिस सुधारों के लिये कई समितियों का गठन किया गया: 

  • 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने देश के सभी राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को एक पत्र लिखकर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिये कुछ सिफारिशें भेजी थीं।
  • इसके बाद 1998 में महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी जे.एफ. रिबैरो की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया।
  • इसके बाद वर्ष 2000 में गठित पद्मनाभैया समिति ने भी केंद्र सरकार को सुधारों की सिफारिशें सौंपी थी। 
  • देश में आपातकाल के दौरान हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिये गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिये पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी 
  • इसके अलावा राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं। 
  • इन समितियों ने राज्यों में पुलिस बल की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती करने की भी सिफारिश की थी।

लेकिन नतीजा जस-का-तस रहा, अर्थात् किसी भी आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 

मॉडल पुलिस एक्ट, 2006

  • सोली सोराबजी समिति ने वर्ष 2006 में मॉडल पुलिस अधिनियम का प्रारूप तैयार किया था, लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। विदित हो कि गृह मंत्रालय ने 20 सितंबर, 2005 को विधि विशेषज्ञ सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने 30 अक्तूबर 2006 को मॉडल पुलिस एक्ट, 2006 का प्रारूप केंद्र सरकार को सौंपा।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

जब किसी भी आयोग और समिति की रिपोर्ट पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो उत्तर प्रदेश व असम में पुलिस प्रमुख और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर अपील की थी कि सभी राज्यों को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया जाए।

इस याचिका पर एक दशक तक चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई आयोगों की सिफारिशों का अध्ययन कर आखिर में 22 सितंबर, 2006 को पुलिस सुधारों पर फैसला सुनाते  हुए राज्यों और केंद्र के लिये कुछ दिशा-निर्देश जारी  किये।

राज्यों को निर्देश: इनमें पुलिस पर राज्य सरकार का प्रभाव कम करने के लिये राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करने, पुलिस महानिदेशक, आई.जी. और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो साल तय करने, जाँच और कानून व्यवस्था की बहाली का ज़िम्मा अलग-अलग पुलिस इकाइयों को सौंपने, सेवा संबंधी तमाम मामलों पर फैसले के लिये एक पुलिस इस्टैब्लिशमेंट बोर्ड का गठन करने और पुलिस अफसरों के खिलाफ शिकायतों की जाँच के लिये पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन करने जैसे दिशा-निर्देश शामिल थे। 

केंद्र को निर्देश: अदालत ने केंद्र सरकार को केंद्रीय पुलिस बलों में नियुक्तियों और कर्मचारियों के लिये बनने वाली कल्याण योजनाओं की निगरानी के लिये एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के गठन का भी निर्देश दिया था, लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हो सका है। 

वैसे भी किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को महत्त्व नहीं दिया, क्योंकि इन दिशा-निर्देशों पर अमल करने के बाद किसी भी सत्तारूढ़ दल का पुलिस पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। लेकिन अदालत के आदेश का पालन करने के लिये कई राज्य सरकारों ने वैकल्पिक रास्ता अपनाते हुए अपने-अपने पुलिस अधिनियम बना लिये, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उसके निर्देश उसी समय तक लागू रहेंगे जब तक कि राज्य सरकारें अपना अलग कानून नहीं बना लेतीं। लगभग सभी राज्य सरकारों ने इसी प्रावधान का फायदा उठाया और आज 18 राज्यों का अपना अलग पुलिस कानून है। 

सुप्रीम कोर्ट के हालिया दिशा-निर्देश 

  • हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिये सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटों के भीतर उसे आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करें। 
  • जहाँ इंटरनेट व्यवस्था संतोषजनक नहीं है, वहाँ एफआईआर को 72 घंटों के भीतर सार्वजनिक किया जाए। 
  • राजद्रोह या विद्रोह, आतंकवाद और महिलाओं व बच्चों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में एफआईआर को इंटरनेट पर अपलोड न करने के निर्देश पुलिस विभागों को दिये गए हैं। 
  • इन दिशा-निर्देशों को जारी करने के पीछे अदालत का उद्देश्य लोगों को राहत पहुँचाना है ताकि वे आसानी से एफआईआर दर्ज कराकर उसकी कॉपी प्राप्त कर सकें।

(टीम दृष्टि इनपुट)

पुलिस सुधारों के एजेंडे में राज्यों की रुचि नहीं

  • यह सच्चाई है कि राज्य सरकारें कई बार पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग भी करती हैं--कभी अपने राजनीतिक विरोधियों से निपटने के लिये तो कभी अपनी किसी नाकामी को छिपाने के लिये। संभवत: यही मुख्य कारण है कि राज्य सरकारें पुलिस सुधार के लिये तैयार नहीं हैं। 
  • राज्य सरकारें पुलिस सुधार के लिये कितनी संजीदा हैं यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले वर्ष जब गृह मंत्रालय ने द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की 153 अति महत्त्वपूर्ण सिफारिशों पर विचार करने के लिये मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया जिनमें पुलिस सुधार पर चिंतन-मनन होना था, तो इस सम्मेलन में अधिकतर मुख्यमंत्री अनुपस्थित रहे।
  • पुलिस सुधार के एजेंडे में जाँच व पूछताछ के तौर-तरीके, जाँच विभाग को विधि-व्यवस्था विभाग से अलग करने, महिलाओं की 33% भागीदारी के अलावा पुलिस की निरंकुशता की जाँच के लिये विभाग बनाने पर भी चर्चा की जानी थी। 
  • आज भी ज्यादातर राज्य सरकारें पुलिस सुधार के मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने को तैयार नहीं हैं। यह आनाकानी पुलिस सुधार को लेकर उनकी बेरुखी को ही दर्शाती है। 

सिटीज़न चार्टर और नारिक  अधिकार

  • दी हुई सूचना पर एफआईआर/ एनसीआर निशुल्क दर्ज की जाती है व इसकी एक प्रति शिकायतकर्ता  निःशुल्क प्रदान कर उस पर तत्काल कार्यवाही की जाती है।
  • थाने पर दी गई किसी सूचना/प्रार्थनापत्र की प्रति अवश्य प्राप्त करें।
  • पुलिस किसी अन्य थाने की घटना/गलत सूचना कहकर आपकी रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती।
  • आपके द्वारा दर्ज कराए गए मामले की विवेचना समाप्त होने  पर परिणाम की लिखित सूचना आपको निशुल्क प्रदान की जाती है।
  • मृतक के परिवार द्वारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रति पुलिस अधीक्षक कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है।
  • पुलिस आपको बिना बताए गिरफ्तार नहीं कर सकती।
  • गिरफ्तारी की स्थिति में आपको अपना वकील रखने का अधिकार है तथा यह पुलिस का दायित्व है कि वह आपकी गिरफ्तारी की सूचना आपके परिजनों को दे।
  • महिलाओं की गिरफ्तारी सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले नहीं की जा सकती (केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई  की जाएगी)।
  • बच्चों और महिलाओं को पूछताछ हेतु थाने में नहीं बुलाया जाएगा।
  • पूछताछ करने वाले जनपदीय कार्यकारी अधिकारी वर्दी में होंगे और उनकी नेम प्लेट स्पष्ट दिखाई देनी चाहिये। 
  • सभी पुलिस अधिकारी पूछताछ के समय अपने पहचान-पत्र अवश्य साथ रखेंगे।
  • पासपोर्ट, शस्त्र लाइसेंस, कार्यक्रमों के आयोजन संबंधी प्रार्थना पत्र आदि के सत्यापन के लिये आवेदक को थाने आने की आवश्यकता नहीं है।
  • थाना स्तर के कर्मचारी द्वारा थाने पर अनावश्यक रूप से किसी को नहीं बुलाया  जाएगा।

पुलिस की हैं अपनी अलग तरह की समस्याएँ

देश में विभिन्न राज्यों के पुलिस विभागों में संख्या बल की भारी कमी है और औसतन 732 व्यक्तियों पर एक पुलिस वाला है, जबकि संयुक्त राष्ट्र ने हर 450 व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी होने की सिफारिश की है। आज पुलिस के सामने अनेक समस्याएँ कार्य निर्वहन के दौरान आती हैं, लेकिन इनमें से कुछ ऐसी हैं जो सभी राज्यों में कमोबेश एक जैसी हैं:

  • पुलिस बल के काम करने की परिस्थितियाँ
  • पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति 
  • पुलिसकर्मियों पर काम का अतिरिक्त दबाव 
  • पुलिस की नौकरी से जुड़े अन्य मानवीय पक्ष 
  • पुलिस पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव 

पुलिस की भूमिका विभिन्न वर्गों, समूहों और सामाजिक स्तर के साथ बदल जाती है। विद्यार्थी, श्रमिक, पत्रकार, वकील, जन-प्रतिनिधि, प्रतिष्ठित व्यक्ति आदि सभी पुलिस से अपनी सोच के अनुरूप अपेक्षाएँ रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप पुलिस को अपनी भूमिका-निर्वाह में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एक तरफ अपराध की विविधता और जटिलता बढ़ रही है तो दूसरी तरफ लोगों की अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं। इस वज़ह से पुलिस के सामने चुनौतियाँ भी अलग-अलग अंदाज़ में और बदलाव के साथ आ रही हैं। वैश्विक आतंकवाद के अलावा इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिये भी पुलिस के सामने चुनौतियाँ पेश आ रही हैं। 

(टीम दृष्टि इनपुट)

पुलिस को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने की ज़रूरत

पुलिस व्यवस्था को आज नई दिशा, नई सोच और नए आयाम की आवश्यकता है। समय की मांग है कि पुलिस नागरिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों के प्रति जागरूक हो और समाज के सताए हुए तथा वंचित वर्ग के लोगों के प्रति संवेदनशील बने। देखने में यह आता है कि पुलिस प्रभावशाली व पैसे वाले लोगों के प्रति नरम तथा आम जनता के प्रति सख्त रवैया अपनाती है, जिससे जनता का सहयोग प्राप्त करना उसके लिये मुश्किल हो जाता है।

आज देश का सामाजिक परिवेश पूरी तरह बदल चुका है। हमें यह समझना होगा कि पुलिस सामाजिक रूप से नागरिकों की मित्र है और बिना उनके सहयोग से कानून व्यवस्था का पालन नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या समाज की भूमिका केवल मूक दर्शक बने रहकर प्रशासन पर टीका टिपण्णी करने या कैंडल लाइट मार्च निकालकर या सोशल साइट्स पर अपना विचार व्यक्त करने तक ही सीमित है?

निष्कर्ष: हमारे सामने प्रायः  पुलिस की नकारात्मक छवि ही आती है, जिससे उसके प्रति आमजन का अविश्वास  और बढ़ जाता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में पुलिस बल की शक्ति का आधार जनता का उसमें विश्वास है...और यदि यह नहीं  है तो समाज के लिये घातक है। पुलिस में संस्थागत सुधार ही वह कुंजी है, जिससे कानून व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। सभी तरह के गैर-कानूनी कार्यों पर नकेल कसी जा सकती है। लेकिन सत्ता में आने वाली हर सरकार पुलिस के पुराने ढाँचे को बनाए रखना चाहती है ताकि वह इस सुरक्षा बल का अपने मनचाहे तरीके से इस्तेमाल कर सके। एक मज़बूत समाज अपनी पुलिस की इज्ज़त करता है और उसे सहयोग देता है, वहीं एक कमज़ोर समाज पुलिस को अविश्वास के दृष्टि से देखता है और प्राय: उसे अपने विरोध में खड़ा पाता है। अतः पुलिस सुधारों को सामाजिक कल्याण से जोड़कर ही इनके वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।

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