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भारत-इज़रायल संबंध: सामरिक जुड़ाव से संरचनात्मक साझेदारी तक

  • 28 Feb 2026
  • 186 min read

यह एडिटोरियल 25/02/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “An Israel visit- its strategic, economic, regional impact” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह एडिटोरियल भारत-इज़रायल संबंधों के 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' में परिवर्तन का विश्लेषण करता है तथा रक्षा, कृषि एवं क्षेत्रीय संपर्क जैसे क्षेत्रों में इसके बहुआयामी प्रभाव को दर्शाता है। यह ईरान और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बाधाओं जैसे तनाव बिंदुओं का भी मूल्यांकन करता है तथा दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिये एक रोडमैप प्रस्तावित करता है।

प्रिलिम्स के लिये: IMEC कॉरिडोर, I2U2 समूह, UNRWA, बराक-8 मिसाइल प्रणाली, गुटनिरपेक्ष आंदोलन 

मेन्स के लिये: भारत-इज़रायल संबंधों का विकास, भारत के लिये इस संबंध का महत्त्व, भारत-इज़रायल संबंधों में प्रमुख टकराव, आवश्यक उपाय। 

पश्चिमी एशिया का यह क्षेत्र लगातार अस्थिर होता जा रहा है, जहाँ गठबंधन बदलते रहते हैं और संघर्ष जारी है। ऐसे में भारत-इज़रायल संबंध रणनीतिक स्थिरता के एक मज़बूत स्तंभ के रूप में उभरे हैं। एक सतर्क शुरुआत से आरंभ हुए ये संबंध अब रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विस्तृत एक गहन एवं बहुआयामी साझेदारी में परिणत हो गए हैं। साझा सुरक्षा चुनौतियों और पूरक क्षमताओं ने इन संबंधों को रक्षा उपकरणों के लेन-देन से आगे बढ़कर संयुक्त विकास और सह-उत्पादन की ओर अग्रसर किया है। आज, ये संबंध भारत की व्यावहारिक कूटनीति को दर्शाते हैं, जो क्षेत्रीय संवेदनशीलता को संतुलित करते हुए रणनीतिक स्वायत्तता एवं राष्ट्रीय हितों का भी ध्यान रखती है।

समय के साथ भारत-इज़रायल संबंधों में किस प्रकार परिवर्तन आया है? 

  • चरण I- वैचारिक अलगाव और संकोच (1948-1992): इस अवधि के दौरान, भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता (NAM) और अरब जगत के साथ एकजुटता पर आधारित थी।
    • प्रमुख घटनाक्रम:
      • 1947-1950: भारत ने संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के खिलाफ मतदान किया लेकिन वर्ष 1950 में इज़रायल को मान्यता दी।
      • 1953: इज़रायल ने मुंबई में एक वाणिज्य दूतावास खोला, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थगित रहे।
      • गुप्त व्यावहारिक सहयोग: औपचारिक संबंधों के अभाव के बावजूद, इज़रायल ने वर्ष 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के दौरान महत्त्वपूर्ण और गोपनीय सैन्य सहायता प्रदान की।
  • चरण II: विवेकपूर्ण सुलह (1992-2014)
    • शीत युद्ध की समाप्ति और वर्ष 1991 की मैड्रिड शांति प्रक्रिया ने भारत को संबंधों को सामान्य बनाने के लिये 'भू-राजनीतिक आवरण' प्रदान किया।
    • प्रमुख कारक: सोवियत संघ का पतन (भारत का प्राथमिक रक्षा उपकरण आपूर्तिकर्त्ता), आर्थिक उदारीकरण एवं सीमा पार आतंकवाद का उदय।
    • प्रमुख घटनाक्रम:
      • वर्ष 1992: प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
      • कारगिल उत्प्रेरक तत्त्व (1999): जब अन्य देश रक्षा सहयोग को लेकर संकोच कर रहे थे तब इज़रायल ने सटीक-निर्देशित हथियारों तथा मानव रहित विमानों की आपात आपूर्ति की, जिससे संस्थागत विश्वास गहरा हुआ।
      • रक्षा-केंद्रित विकास: इस रिश्ते को प्रायः 'गुप्त संबंध' के रूप में वर्णित किया जाता था, जो रक्षा और खुफिया मामलों में मज़बूत था लेकिन सार्वजनिक कूटनीति में कम चर्चित था।
    • तकनीकी आधारशिला: भारत-इज़रायल कृषि परियोजना (IIAP) की शुरुआत और अंतरिक्ष में सहयोग (जैसे, RISAT-2 प्रक्षेपण)।
  • चरण III: डी-हाइफनेशन और रणनीतिक गहनता का युग (2014-2023)
    • इस चरण में संबंध सार्वजनिक, वैचारिक तथा रणनीतिक स्तर पर सुदृढ़ हुए। 
    • प्रमुख प्रेरक तत्त्व: 'डी-हाइफनेशन' (इज़रायल और फ़िलिस्तीन को स्वतंत्र द्विपक्षीय मुद्दों के रूप में मानना), कट्टरपंथी उग्रवाद पर साझा चिंताएँ और भारत का आत्मनिर्भर भारत मिशन।
    • प्रमुख घटनाक्रम:
      • रणनीतिक उन्नयन: वर्ष 2017 में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया।
      • तकनीकी संलयन: भविष्य की तकनीक के सह-विकास के लिये I4F (औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास एवं नवाचार कोष) की स्थापना।
      • I2U2 समूह (2021): भारत खाद्य सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करने वाले 'पश्चिम एशियाई क्वाड' में इज़रायल, UAE और अमेरिका के साथ शामिल हुआ।
  • चरण IV: विशेष रणनीतिक साझेदारी (वर्ष 2024-वर्तमान तक)
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, यह संबंध एक 'विशेष' श्रेणी में प्रवेश कर चुके हैं, जिसकी विशेषता क्षेत्रीय सुरक्षा एवं उच्च-तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं में इसका एकीकरण है।
    • प्रमुख घटनाक्रम:
      • जून 2025 में, भारत ने गाज़ा में तत्काल, बिना शर्त और स्थायी युद्धविराम वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया, जिसमें संवाद के अभाव और प्रस्ताव के असंतुलित प्रावधानों का हवाला दिया गया था। यह निर्णय भारत के सूक्ष्म दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो गाज़ा को मानवीय सहायता प्रदान करने और इज़रायल के साथ मज़बूत आर्थिक और रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन को महत्त्व देता है।
      • फरवरी 2026 में, इस संबंध को 'शांति, नवाचार और समृद्धि के लिये विशेष रणनीतिक साझेदारी' के रूप में उन्नत किया गया।
        • इसके अतिरिक्त द्विपक्षीय निवेश समझौते का स्वागत किया गया और इससे मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया गया।
        • दोनों देशों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी और साइबर सिस्टम को कवर करने वाली महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर एक नई पहल शुरू की है।
        • भारत और इज़रायल ने संस्थागत संबंधों को सुदृढ़ करने के लिये भारत-इज़रायल अकादमिक सहयोग मंच की स्थापना पर सहमति व्यक्त की। नालंदा विश्वविद्यालय और यरूशलेम के हिब्रू विश्वविद्यालय के बीच एक समझौता ज्ञापन संयुक्त अनुसंधान और अकादमिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा।
        • इसके अलावा, उन्होंने भारत में एक भारत-इज़रायल साइबर उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने का भी निर्णय लिया।

भारत के लिये इज़रायल का क्या महत्त्व है? 

  • सामरिक रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा: इज़रायल संकट के दौरान बिना किसी शर्त के प्रौद्योगिकी और महत्त्वपूर्ण प्रणालियाँ प्रदान करके भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के लिये एक आधारशिला के रूप में कार्य करता है, विशेष रूप से जब भारत स्वदेशी विनिर्माण की ओर अग्रसर हो रहा है।
    • प्रतिबंधात्मक क्रेता-विक्रेता संबंधों से आगे बढ़कर संयुक्त सह-उत्पादन की ओर बढ़ने से भारत महत्त्वपूर्ण असममित युद्ध क्षमताओं को सुरक्षित कर लेता है।
      • अत्याधुनिक रक्षात्मक और आक्रामक रक्षा उपकरणों में लक्षित प्रौद्योगिकी अंतरण क्षेत्रीय बहु-मोर्चे के खतरों को सीधे तौर पर प्रभावहीन करता है।
    • उदाहरण के लिये, भारत वर्तमान में इज़रायल के रक्षा उपकरण निर्यात का 34% हिस्सा आयात करता है, तथा वर्ष 2020 से 2024 के दौरान द्विपक्षीय रक्षा व्यापार कुल मिलाकर 20.5 बिलियन डॉलर का है।
    • इसके अलावा, फोर्ब्स इंडिया की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इज़रायल ने वर्ष 2026 में भारत के साथ 8.6 अरब डॉलर के रक्षा उपकरण सौदों पर सहमति जताई है।
  • आर्थिक एकीकरण और व्यापारिक संतुलन: नई दिल्ली और यरुशलम के बीच आर्थिक तालमेल पारंपरिक हीरा-व्यापार से आगे बढ़कर उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण और डिजिटल वाणिज्य तक तीव्रता से विविधीकृत हो रहा है।
    • वित्त वर्ष 2024-2025 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापारिक लेन-देन 3.62 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
    • एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को सुरक्षित करना भारतीय व्यवसायों के लिये भूमध्यसागरीय बाज़ारों में प्रवेश करने का एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक द्वार है।
    • यह गहन भू-आर्थिक एकीकरण अत्यंत लचीली आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण करता है, जो वैश्विक समुद्री तथा व्यापारिक अवरोधों से दोनों देशों को संरक्षण प्रदान करती हैं।
  • कृषि, जल और जलवायु सुरक्षा: शुष्क जलवायु प्रौद्योगिकियों पर इज़रायल की अग्रणी दक्षता भारत की दीर्घकालिक खाद्य और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये मौलिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
    • इज़रायल की परिशुद्ध कृषि पद्धतियों, सूक्ष्म सिंचाई एवं अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण को संस्थागत रूप देकर, भारत ने फसल की उत्पन्नवार तथा संसाधन दक्षता में उल्लेखनीय सुधार किया है। 
      • ज़मीनी स्तर की यह कृषि-कूटनीति लाखों भारतीय किसानों की आजीविका को सुदृढ़ करती है तथा वैश्विक जलवायु परिवर्तन के गंभीर व अनिश्चित प्रभावों से निपटने में सहायक बनती है।
    • भारत-इज़रायल उत्कृष्टता केंद्र (CoE) उच्च तकनीक वाले, गहन कृषि केंद्र हैं जिनकी स्थापना स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल इज़रायली कृषि प्रौद्योगिकियों के अंतरण को सुविधाजनक बनाने के लिये की गई है। 
  • श्रम गतिशीलता और भू-राजनीतिक अभिसरण: यह साझेदारी सहज रूप से एक जनांकिकीय सेतु में विकसित हो गई है, जो भारत के विशाल प्रतिभा समूह को इज़रायल के श्रम-वंचित औद्योगिक क्षेत्रों के साथ जोड़ती है।
    • कार्यबल की यह रणनीतिक गतिशीलता एक उच्च-मूल्य वाले प्रेषण गलियारे का निर्माण करती है, साथ ही पश्चिम एशियाई भू-अर्थशास्त्र में भारतीय प्रभाव को गहराई से स्थापित करती है।
    • इज़रायल द्वारा हाल ही में किये गए श्रम संबंधी पुनर्गठन का लाभ उठाते हुए, जिसके तहत वर्ष 2025 में 61,000 नए विदेशी श्रमिक परमिट जारी किये गए, भारतीय प्रतिभाएँ तेज़ी से महत्त्वपूर्ण कार्यबल की कमी को पूरा कर रही हैं।
    • फरवरी 2026 में हुए एक ऐतिहासिक समझौते में, इज़रायल ने आधिकारिक तौर पर निर्माण, विनिर्माण और देखभाल जैसे क्षेत्रों में 5 वर्षों में अतिरिक्त 50,000 भारतीय श्रमिकों को शामिल करने की प्रतिबद्धता जताई।
  • महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियाँ और साइबर रक्षा: साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में इज़रायल का वैश्विक प्रभुत्व भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के लिये एक महत्त्वपूर्ण गुणक के रूप में कार्य करता है। 
    • फरवरी 2026 के द्विपक्षीय ढाँचे ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्द्धचालक, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी और साइबर सिस्टम को कवर करने वाली महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों पर एक नई पहल शुरू की।
      • अत्याधुनिक तकनीकों में सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक विशेष समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किये गए।
  • अंतरिक्ष सहयोग और बाह्य अंतरिक्षीय व्यावसायीकरण: ISRO-इज़रायल अंतरिक्ष एजेंसी (ISA) साझेदारी, भारत की अत्यधिक विश्वसनीय और लागत प्रभावी भारी-लिफ्ट प्रक्षेपण क्षमताओं के साथ इज़रायल की लघु पेलोड नवाचार का पूर्णतया पूरक है।
    • यह सहजीवी अंतरिक्ष-कूटनीति द्वैध-उपयोग पृथ्वी-अवलोकन प्रणालियों को सुदृढ़ करती है, जिससे जलवायु-अनुकूल कृषि निगरानी तथा सामरिक सैन्य सर्वेक्षण दोनों को बल मिलता है।
    • गहन अंतरिक्ष अभियानों और उपग्रह संचार में संसाधनों का साझा उपयोग वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में दोनों देशों की प्रतिस्पर्द्धात्मक स्थिति को सुदृढ़ बनाता है।
    • भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई इज़रायली उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपणित किया है, जिनमें रणनीतिक रडार इमेजिंग RISAT शृंखला और छात्रों द्वारा निर्मित DUKIFAT-3 शामिल हैं।
  • भू-रणनीतिक लघुपक्षीय सहयोग (I2U2 और IMEC): भारत प्रभावशाली लघुपक्षीय गठबंधनों को मज़बूत करने के लिये अपने गहन इज़रायली संबंधों का सक्रिय रूप से लाभ उठाता है, जो पश्चिम एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के लिये एक रणनीतिक प्रतिसंतुलन प्रदान करता है। 
    • इज़रायल को I2U2 ढाँचे और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) में एकीकृत करने से खंडित द्विपक्षीय संबंध एक एकीकृत क्षेत्रीय संरचना में परिवर्तित हो जाते हैं।
      • पहले I2U2 शिखर सम्मेलन में, संयुक्त अरब अमीरात ने भारत में फूड पार्कों के लिये 2 अरब डॉलर देने का वादा किया।
    • वर्ष 2024 और 2025 के दौरान तीव्र क्षेत्रीय शत्रुता के बावजूद, फरवरी 2026 के रणनीतिक संवादों ने IMEC के अंतर-क्षेत्रीय रेल-से-बंदरगाह अधोसंरचना के लिये दोनों देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं की निर्णायक रूप से पुष्टि की।

भारत-इज़रायल संबंधों में मतभेद के क्षेत्र कौन-कौन से हैं? 

  • ईरान विरोधाभास और रणनीतिक संतुलन: ईरान के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी, विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह के माध्यम से, इज़रायल के लिये विवाद का एक प्रमुख बिंदु बनी हुई है, जो तेहरान को अपने अस्तित्व के लिये खतरा मानता है। 
    • नई दिल्ली ईरान को मध्य एशिया का एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार और एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा भागीदार मानती है, यह रुख इज़रायल के ईरानी शासन के पूर्ण राजनयिक तथा आर्थिक अलगाव के उद्देश्य से सीधे तौर पर टकराता है। 
      • चाबहार बंदरगाह के लिये भारत का 10 साल का पट्टा (जिस पर वर्ष 2024 में हस्ताक्षर किये गए) और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) पर जारी चर्चाएँ ईरान के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का संकेत देती हैं।
    • हालाँकि, भारत ने जून 2025 में ईरान पर इज़रायली सैन्य हमलों की 'कड़ी' निंदा करने वाले SCO के बयान से भी खुद को पृथक कर लिया था, जो इज़रायल व अन्य क्षेत्रीय भागीदारों दोनों के साथ संतुलित राजनयिक रुख बनाए रखने के उसके प्रयासों को रेखांकित करता है।
  • फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे पर मतभेद: अपनी 'डी-हाइफनेशन' नीति के बावजूद, भारत एक संप्रभु, स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के प्रति सैद्धांतिक और ऐतिहासिक प्रतिबद्धता बनाए रखता है, जो प्रायः दक्षिणपंथी इज़रायली सरकारों को असहज करता है।
    • हालाँकि आतंकवाद-रोधी सहयोग के क्षेत्र में भारत के इज़रायल के निकट आने के बावजूद वह संयुक्त राष्ट्र में लगातार दो-राज्य समाधान के पक्ष में मतदान करता रहा है, जो पश्चिमी तट में विस्तारवादी रुख अपनाने वाली वर्तमान इज़रायली सरकार की नीति के विपरीत है।
      • इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने वर्ष 2024–25 के लिये अपनी वार्षिक 50 लाख अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र फिलिस्तीनी शरणार्थी राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) को 25 लाख अमेरिकी डॉलर जारी किये।
    • अक्तूबर 2025 में आयोजित गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) शिखर सम्मेलन में भारत ने पुनः दोहराया कि वार्ताओं पर आधारित दो-राज्य समाधान ही ‘एकमात्र व्यवहार्य मार्ग’ है, जो नेतन्याहू सरकार के समकालीन रुख के विपरीत था।
  • रक्षा निर्भरता बनाम प्रौद्योगिकी संप्रभुता: भारत का 'आत्मनिर्भर भारत' मिशन इज़रायल के पारंपरिक 'खरीदार-विक्रेता' मॉडल के साथ अंतर्विरोध उत्पन्न करता है, क्योंकि नई दिल्ली अब प्रौद्योगिकी अंतरण (ToT) और बौद्धिक संपदा अधिकारों की पूर्ण मांग करती है। 
    • इज़रायल, अपनी विशिष्ट तकनीकी बढ़त को सुरक्षित रखने के कारण, प्रायः मुख्य स्रोत कोड अथवा संवेदनशील उच्च-स्तरीय प्रणालियाँ साझा करने में संकोच करता है, जिससे रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में विलंब होता है। 
      • हालाँकि इज़रायल भारत को रक्षा उपकरणों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता है, फिर भी मौजूदा संयुक्त उद्यमों को 'स्वदेशी सामग्री' प्रतिशत के संबंध में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • आर्थिक संरक्षणवाद और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बाधाएँ: दशकों की वार्ताओं के बावजूद, कृषि उत्पादों और रासायनिक पेटेंट के लिये बाज़ार अभिगम्यता पर लगातार असहमति के कारण भारत-इज़रायल मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हो सका है।
    • भारत का अपने घरेलू कृषि क्षेत्रों के प्रति सुरक्षात्मक रुख, इज़रायल की उच्च-तकनीकी कृषि समाधानों को भारी शुल्क के बिना निर्यात करने की इच्छा से असंगत है।
      • इसके विपरीत, भारत अपने IT पेशेवरों के लिये अधिक गतिशीलता चाहता है, जिसका इज़रायली श्रमिक संघों द्वारा समय-समय पर विरोध किया जाता है। 
    • इसके अलावा, सत्र 2024-25 के दौरान, भारत का इज़रायल को निर्यात 52% गिरकर 2.14 बिलियन डॉलर हो गया, जो सत्र 2023-24 में 4.52 बिलियन डॉलर था।
  • साइबर सुरक्षा नैतिकता और पेगासस का विवाद: इज़रायल में विकसित जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस से जुड़े विवाद भारत में घरेलू राजनीतिक तनाव को जन्म देते रहे हैं और द्विपक्षीय उन्नत प्रौद्योगिकी सहयोग को जटिल बनाते हैं।
    • यद्यपि भारत सरकार इज़रायली साइबर खुफिया क्षमताओं को उपयोगी मानती है, परंतु निगरानी से जुड़े आरोपों के कारण उत्पन्न प्रतिष्ठात्मक जोखिम इस सहयोग को एक ‘निम्न-पारदर्शिता’ क्षेत्र में स्थानांतरित कर देता है।
      • भारत में NSO ग्रुप के उपकरणों के उपयोग की जाँच के चलते सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व में कई जाँचें शुरू की गई हैं।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता और IMEC की व्यवहार्यता: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की व्यवहार्यता क्षेत्रीय स्थिरता पर बहुत अधिक निर्भर करती है, जो प्रायः इज़रायल-फिलिस्तीन और इज़रायल-हिज़बुल्लाह संघर्षों से बाधित होती है। 
    • इस कॉरिडोर में भारत का भारी निवेश इज़रायल के सुरक्षा संबंधी फैसलों के कारण 'अटका हुआ' है, जिससे निर्माण या व्यापार प्रवाह अनिश्चित काल के लिये रुक सकता है।
    • लॉजिस्टिक्स लागत को 30% तक कम करने और परिवहन समय को 40% तक घटाने के उद्देश्य से शुरू की गई IMEC परियोजना को हाल ही में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के दौरान लगभग पूरी तरह से लॉजिस्टिक्स संबंधी कार्यों में रुकावट का सामना करना पड़ा।
  • चीन के साथ 'दोहरे व्यापार' की दुविधा: भारत, चीन के साथ इज़रायल के महत्त्वपूर्ण आर्थिक संबंधों को लेकर काफी सतर्क है, विशेष रूप से बीजिंग द्वारा हाइफ़ा खाड़ी बंदरगाह का प्रबंधन और इज़रायली तकनीकी स्टार्टअप में निवेश को लेकर। 
    • नई दिल्ली चीन को अपना प्राथमिक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानती है और उसे इस बात की चिंता है कि भारत के साथ साझा किये गए इज़रायली नवाचार वाणिज्यिक चैनलों के माध्यम से चीनी संस्थाओं के लिये भी सुलभ हो सकते हैं। 
    • इससे 'सुरक्षा जाँच' को लेकर एक तरह का मतभेद उत्पन्न होता है, जहाँ भारत कभी-कभी चीनी 'बैकडोर' जोखिमों से बचने के लिये इज़रायली तकनीक के बजाय पश्चिमी या घरेलू विकल्पों को प्राथमिकता देता है। 

भारत-इज़रायल संबंधों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • सह-विकास रक्षा प्रतिमान को संस्थागत रूप देना: दोनों देशों को आत्मनिर्भर भारत के तहत विशिष्ट सैन्य प्रणालियों के सह-उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये एक समर्पित संयुक्त रक्षा प्रौद्योगिकी कोष को क्रियान्वित करके 'खरीदार-विक्रेता' मॉडल से आगे बढ़ना चाहिये। 
    • इसके लिये इज़रायल की 'बैटल प्रोवेन (युद्ध में सिद्ध)' एल्गोरिदम संस्कृति को भारत के औद्योगिक पैमाने के विनिर्माण के साथ समन्वयित करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से निर्देशित ऊर्जा रक्षा उपकरणों (DEW), ऑटोनोमस ड्रोन स्वार्म्स और AI-संचालित पूर्वानुमानित आधारित रख-रखाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। 
    • विश्व स्तर पर उपयोग किये जाने वाले इज़रायली उपकरणों के लिये भारत में क्षेत्रीय MRO (रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल) केंद्र स्थापित करके, यह साझेदारी एक स्थायी औद्योगिक आधार तैयार कर सकती है जो दोनों पक्षों के लिये रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करती है।
  • 'डिजिटल इंटेलिजेंस' और सेमीकंडक्टर कॉरिडोर को क्रियान्वित करना: दोनों अर्थव्यवस्थाओं की डिजिटल रीढ़ को सुरक्षित करने के लिये, भारत और इज़रायल को एक हाई-स्पीड साइबर-सेमीकंडक्टर पाथवे शुरू करना चाहिये जो तेल अवीव के 'सिलिकॉन वाडी' को भारत के 'सेमीकॉन सिटी' (धोलेरा/बंगलुरु) से जोड़ता है। 
    • इसमें चिपसेट के लिये 'सिक्योरिटी-बाय-डिज़ाइन' में संयुक्त अनुसंधान एवं विकास तथा महत्त्वपूर्ण वित्तीय और ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा के लिये सॉवरेन क्वांटम क्रिप्टोग्राफी प्रोटोकॉल का सह-विकास शामिल है।
    • भारत-इज़रायल के बीच एक स्थायी AI एथिक्स एँड इनोवेशन लैब की स्थापना से दोनों देशों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार सैन्य तथा नागरिक उपयोग के लिये वैश्विक मानक स्थापित करने की अनुमति मिलेगी, जिससे पश्चिमी या चीनी तकनीकी प्रणालियों पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी।
  • संरचित 'G-to-G' श्रम और प्रतिभा गतिशीलता को संस्थागत बनाना: वर्ष 2026 के गतिशीलता समझौतों के बाद दोनों देशों को अनियंत्रित प्रवासन के स्थान पर एक ‘संरचित प्रतिभा गतिशीलता ढाँचे’ लागू करना चाहिये, जो भारत की विशाल STEM कार्यशक्ति को इज़रायल की उच्च-प्रौद्योगिकी और औद्योगिक श्रम आवश्यकताओं से जोड़े।
    • इसमें 'योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता' और भारत के भीतर व्यावसायिक प्रशिक्षण में पूर्व-प्रस्थान उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना शामिल है, जो विशेष रूप से इज़रायली औद्योगिक मानकों के अनुरूप तैयार किये गए हैं।
  • 'IMEC-I2U2' कनेक्टिविटी नेक्सस को सुदृढ़ करना: क्षेत्रीय अस्थिरता से द्विपक्षीय व्यापार को सुरक्षित रखने के लिये, नई दिल्ली और यरूशलेम को भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के भौतिक एवं डिजिटल रूप से पूर्ण होने को प्राथमिकता देनी चाहिये। 
    • इसके लिये प्रमुख बंदरगाहों पर 'स्मार्ट पोर्ट' प्रौद्योगिकी में संयुक्त निवेश की आवश्यकता है, जिसमें भूमध्य सागर-अरब सागर मार्ग पर माल की निर्बाध, रियल टाइम ट्रैकिंग सुनिश्चित करने के लिये ब्लॉकचेन-आधारित लॉजिस्टिक्स को एकीकृत किया जाए। 
    • I2U2 समूह को एक वाणिज्यिक समाशोधन केंद्र के रूप में मानकर, दोनों देश अपने आर्थिक हितों को जोखिममुक्त कर सकते हैं, जिससे यह गलियारा बेल्ट एँड रोड पहल के लिये एक स्थायी, मल्टी-मॉडल विकल्प बन जाएगा।
  • जल और कृषि में 'सटीक कूटनीति' का विस्तार: प्रदर्शन-आधारित केंद्रों से आगे बढ़ते हुए, जल-संकटग्रस्त भारतीय क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी-समेकित ज़िला-स्तरीय सिंचाई परियोजनाएँ लागू की जानी चाहिये।
    • इसमें भारतीय कृषि के तहत खेतों में उपग्रह-आधारित परिशुद्ध खेती तथा AI-संचालित 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स' (IoT) सेंसरों की बड़े पैमाने पर तैनाती शामिल है, जिसे एक संयुक्त कृषि-फाइनटेक फंड द्वारा समर्थित किया गया है, जो इन उच्च-तकनीकी उपकरणों को अपनाने वाले किसानों को सूक्ष्म बीमा प्रदान करता है। 
    • इस तरह के बदलाव से 'कृषि कूटनीति' एक 'राष्ट्रीय सुरक्षा' संपत्ति में बदल जाएगी, जिससे भारत की विशाल कृषि आबादी के लिये खाद्य कीमतों में स्थिरता एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति समुत्थानशीलता सुनिश्चित होगा।
  • अंतरिक्ष और उपग्रह वाणिज्यीकरण में ‘लघु-बहुपक्षीय’ सहयोग: भारत के ISRO और इज़रायल अंतरिक्ष एजेंसी (ISA) को वैश्विक वाणिज्यिक निर्यात के लिये लघु आकार के, निम्न-पृथ्वी कक्षा (LEO) उपग्रहों के सह-निर्माण हेतु एक द्विपक्षीय अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित करना चाहिये।
    • भारत की लागत-प्रभावी PSLV/SSLV प्रक्षेपण क्षमता और इज़रायल की सूक्ष्म उपग्रह एवं रडार विशेषज्ञता को मिलाकर ग्लोबल साउथ के लिये नई अंतरिक्ष सेवाओं का सशक्त विकल्प तैयार किया जा सकता है।
    • यह सहयोग जलवायु निगरानी, समुद्री क्षेत्र जागरूकता तथा सीमा निगरानी के लिये स्वतंत्र आँकड़ा क्षमता प्रदान करेगा।
  • 'पीपल-टू-पीपल' ट्रैक-II कूटनीति को मज़बूत करना: रणनीतिक संबंधों में एक मज़बूत 'सभ्यतागत' स्तर का अभाव है, जिसे अधिक 'लक्षित युवा फेलोशिप' और एक एकीकृत विश्वविद्यालय अनुसंधान विनिमय कार्यक्रम शुरू करके दूर किया जा सकता है। 
    • संयुक्त फिल्म निर्माण और नवोन्मेष उद्यम सेतु जैसी पहलों से दोनों देशों में ऐसा सामाजिक आधार विकसित होगा, जो बदलती राजनीतिक परिस्थितियों से परे द्विपक्षीय संबंधों को स्थायित्व प्रदान करेगा।

निष्कर्ष: 

भारत-इज़रायल साझेदारी ने अपने पारंपरिक रक्षा-केंद्रित स्वरूप से आगे बढ़ते हुए एक परिष्कृत, बहुआयामी गठबंधन का रूप ले लिया है, जो भारत की तकनीकी एवं खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक है। ईरान और फिलिस्तीन पर भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, 'विभाजन-मुक्त' रणनीति यह सुनिश्चित करती है कि द्विपक्षीय व्यावहारिक हित क्षेत्रीय अस्थिरता से अप्रभावित रहें। आगे चलकर, IMEC कॉरिडोर और उच्च-तकनीकी सह-उत्पादन का सफल एकीकरण इस 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' की वास्तविक कसौटी सिद्ध होंगे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

“रक्षा भारत-इज़रायल संबंधों की आधारशिला बनी हुई है, लेकिन साझेदारी का भविष्य खाद्य, जल और डिजिटल सुरक्षा के परस्पर संबंधों में निहित है।” हाल के द्विपक्षीय घटनाक्रमों के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिये।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत की नीति में 'डी-हाइफ़नेशन' से क्या तात्पर्य है? 
यह इज़रायल और फिलिस्तीन के साथ संबंधों को स्वतंत्र, द्विपक्षीय मार्गों के रूप में मानने की राजनयिक प्रथा है, जिसमें एक को दूसरे को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जाती है।

2. I2U2 ग्रुपिंग क्या है? 
 यह भारत, इज़रायल, UAE और अमेरिका को मिलाकर बना एक लघुपक्षीय मंच है, जो जल, ऊर्जा, परिवहन एवं अंतरिक्ष में संयुक्त निवेश पर ध्यान केंद्रित करता है।

3. भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' में इज़रायल का क्या योगदान है? 
रक्षा और सेमीकंडक्टर क्षेत्रों में क्रेता-विक्रेता मॉडल से संयुक्त उद्यम सह-उत्पादन एवं गहन प्रौद्योगिकी अंतरण की ओर संक्रमण के माध्यम से।

4. भारत के लिये हाइफा बंदरगाह का क्या महत्त्व है? 
यह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के लिये एक रणनीतिक समुद्री केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो भारतीय वस्तुओं को यूरोपीय बाज़ारों से जोड़ता है।

5. भारत-इज़रायल औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास एवं नवाचार कोष (I4F) क्या है? 
भारतीय और इज़रायली कंपनियों के बीच सहयोगात्मक औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देने तथा व्यापर को सुगम बनाने के लिये बनाया गया 40 मिलियन डॉलर का संयुक्त कोष।



UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद ‘टू-स्टेट सोल्यूशन’ किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है ? (2018)

(a) चीन

(b) इज़रायल 

(c) इराक 

(d) यमन

उत्तर: (b)


मेन्स 

प्रश्न 1. "भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल में एक ऐसी गहराई एवं विविधता प्राप्त कर ली है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।" विवेचना कीजिये। (2018)

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