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भारतीय अर्थव्यवस्था

न्यायसंगत विकास

  • 09 Apr 2022
  • 12 min read

यह एडिटोरियल 07/04/2022 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित “To Develop Equitably, Address Five Priorities” लेख पर आधारित है। इसमें न्यायपूर्ण विकास के मार्ग की चुनौतियों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

कोविड-19 महामारी ने उन असमान और असंवहनीय प्रणालियों को उजागर कर दिया है जिनमें दुनिया भर के लोग रहने एवं कार्य करने, उपभोग एवं अस्तित्व के लिये विवश हैं। दूसरी ओर, महामारी ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि यदि निर्णयन की प्रक्रिया पारदर्शी, साक्ष्य-आधारित और समावेशी हो तो लोग उन साहसिक तथा दूरगामी नीतियों का समर्थन करने की प्रवृत्ति रखते हैं जो उनके स्वास्थ्य, परिवारों और आजीविका की सुरक्षा करती हों।

विश्व अभी एक निर्णायक चरण में है। हम अभी जो निर्णय लेंगे, उस पर निर्भर करेगा कि विकास पैटर्न अवरुद्ध हो जाए—जो पारिस्थितिक तंत्र को स्थायी रूप से और लगातार क्षति पहुँचाएगा अथवा एक स्वस्थ, निष्पक्ष और हरित दुनिया को प्रोत्साहन देगा। आवश्यकता यह है कि हम सामूहिक रूप से अपनी आवाज उठाएँ और अपने ग्रह, स्वास्थ्य तथा भविष्य की रक्षा के लिये सक्रिय प्रतिक्रिया दें। 

न्यायसंगत विकास (Equitable Development) से कैसे समझौता किया जा रहा है?

  • खराब वायु गुणवत्ता: वैश्विक स्तर पर 90% लोग अस्वास्थ्यकर हवा में साँस लेने को विवश हैं जिसके परिणामस्वरूप हर साल लगभग 70 लाख लोगों की मौत होती है।
    • वैश्विक स्तर पर बाह्य वायु प्रदूषण से दो-तिहाई जोखिम या एक्सपोज़र उन्हीं जीवाश्म ईंधनों के दहन का परिणाम है जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं और अनुमान है कि ये वर्ष 2030 से 2050 के बीच प्रति वर्ष 250,000 अतिरिक्त मौतों का कारण बन सकते हैं।
  • असंवहनीय खाद्य प्रणालियाँ: असुरक्षित, अस्वस्थकर और असंवहनीय खाद्य प्रणालियाँ प्रति वर्ष लाखों अकाल मृत्यु का कारण बनती हैं (मुख्य रूप से गैर-संचारी रोगों के कारण) और ये जलवायु परिवर्तन एवं रोगाणुरोधी प्रतिरोध में प्रमुख योगदानकर्ता हैं जो मानव प्रजाति के समक्ष विद्यमान सबसे बड़े स्वास्थ्य जोखिमों में से दो प्रमुख जोखिम हैं.
    • अपर्याप्त जल और स्वच्छता सुविधाएँ: वर्ष 2020 में वैश्विक स्तर पर चार में से एक व्यक्ति के पास सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल की कमी थी और अल्प-विकसित देशों में केवल 50% स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं द्वारा बुनियादी जल सेवाएँ प्रदान की जा रही थीं।
      • खराब गुणवत्ता का पेयजल गंभीर जलजनित रोगों को जन्म दे सकता है और आर्सेनिक जैसे जहरीले रसायनों के संपर्क में आने का जोखिम पैदा करता है।
      • जल, साफ-सफाई और स्वच्छता (Water, Sanitation and Hygiene- WASH) तक अपर्याप्त पहुँच स्वास्थ्य देखभाल को कम प्रभावी बनाती है और इसका महिलाओं एवं बालिकाओं पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • पर्यावरण संबंधी चिंताएँ: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि हर साल 13 मिलियन से अधिक मौतें परिहार्य पर्यावरणीय कारणों से होती हैं। यह बेहद चिंताजनक आँकड़ा है और हम इस परिदृश्य के प्रति मूक नहीं बने रह सकते।
      • इसमें जलवायु संकट भी शामिल है जो मानव जाति के समक्ष विद्यमान सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा है।
  • गरीबी और बेरोज़गारी: अर्थव्यवस्था का वर्तमान प्रारूप आय, धन और शक्ति के असमान वितरण की ओर ले जाता है जहाँ बहुत से लोग अभी भी गरीबी, बेरोज़गारी और अस्थिरता की स्थिति में जीने को विवश हैं।
    • ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ (CMIE) के आँकड़ों के अनुसार दिसंबर 2021 में भारत की बेरोज़गारी दर 7.9% के स्तर तक पहुँच गई थी।

हम न्यायपूर्ण और संवहनीय/संधारणीय विकास कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं?

  • स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना: दीर्घावधिक निवेश, कल्याण बजट, सामाजिक सुरक्षा, कानूनी एवं वित्तीय रणनीतियों आदि के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के लिये न्यायपूर्ण स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर हम ‘कल्याणकारी समाज’ का निर्माण कर सकते हैं जो मानव उत्कर्ष को सुगम बनाएगा तथा पारिस्थितिक सीमाओं का अतिक्रमण बिना प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य और विकास के अधिकार की पुष्टि करेगा।
    • हमारा लक्ष्य एक ऐसे भूभाग और विश्व का निर्माण होना चाहिये जहाँ सभी के लिये स्वच्छ हवा, जल और भोजन उपलब्ध हो, जहाँ अर्थव्यवस्थाएँ शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देती हों, जहाँ शहर रहने योग्य हों तथा जहाँ लोगों का अपने स्वास्थ्य पर और ग्रह पर नियंत्रण हो।
  • प्रकृति की रक्षा और संरक्षण: ऐसी नीतियाँ, जो वनों की कटाई पर अंकुश रखें, वनीकरण को बढ़ावा दें और गहन एवं प्रदूषणकारी कृषि अभ्यासों को समाप्त करें, वायु गुणवत्ता में सुधार लाने, खाद्य प्रणालियों को सुदृढ़ करने और संवहनीय खेती एवं वन प्रबंधन को बढ़ावा देने में योगदान कर सकती हैं।
    • वे उभरते संक्रामक रोगों के जोखिम को कम कर सकती हैं जिनमें से 60% से अधिक पशुजनित होते हैं।
  • आवश्यक सेवाओं में निवेश: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर पहुँच बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित रखने के साथ देशों को बहु-क्षेत्रीय जल सुरक्षा योजनाओं (WASH सहित) को प्रासंगिक स्वास्थ्य नीतियों, रणनीतियों और कार्यक्रमों में लागू कर पेयजल आपूर्ति की रक्षा करना जारी रखना चाहिये।
    • देशों को जलवायु-प्रत्यास्थी स्वास्थ्य सुविधाओं का निर्माण भी जारी रखना चाहिये जो न केवल पर्यावरणीय स्वास्थ्य खतरों का सामना कर सकें और उसपर उपयुक्त प्रतिक्रिया दे सकें, बल्कि पर्यावरणीय रूप से संवहनीय अभ्यासों को भी बढ़ावा दें।
  • शिक्षा में निवेश: कुशल श्रमिकों और उच्च-तकनीक नौकरियों की एक स्वस्थ मांग भारत के विकास के लिये वृहत अवसर प्रदान करेगी, लेकिन भारत इस अवसर का लाभ तभी उठा सकता है जब भारतीयों के पास आवश्यक ज्ञान और कौशल हो।
    • देश ने बुनियादी शिक्षा में नामांकन के मामले में अभूतपूर्व प्रगति की है लेकिन शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार लाने और छात्रों में आवश्यक कौशल के प्रसार की सुनिश्चितता के लिये अभी कार्य किया जाना शेष है।
  • ऊर्जा संक्रमण: जबकि विश्व नवीकरणीय उर्जा स्रोतों के विस्तार की दिशा में सराहनीय प्रयास कर रहा है, इस दिशा में और प्रयासों की आवश्यकता है। इसके साथ ही वायु गुणवत्ता मानकों के कठोर प्रवर्तन के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन अवसंरचना में निवेश की वृद्धि की जानी चाहिये।
  • स्वस्थ और संवहनीय खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देना: भोजन तक पहुँच की कमी या अस्वास्थ्यकर, उच्च कैलोरी आहार के उपभोग के कारण होने वाली बीमारियाँ गैर-संचारी रोगों में प्रमुख योगदानकर्ता हैं।
    • WHO एवं संबंधित अंतर सरकारी निकाय और विभिन्न देश मिलकर उच्च प्रभाव और लागत प्रभावी ‘सर्वश्रेष्ठ खरीद’ की पहचान और कार्यान्वयन कर सकते हैं जो फूड रिफ़ॉर्मूलेशन व लेबलिंग से लेकर अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों पर कराधान की वृद्धि और विशेष रूप से बच्चों के लिये इसके विपणन पर प्रतिबंध तक खाय वातावरण को रूपांतरित करेगा।
  • स्वस्थ, रहने योग्य शहरों का निर्माण: इस संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘स्वास्थ्य और कल्याण के लिये शहरी शासन पहल’ (WHO Urban Governance for Health and Well-Being initiative), जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने के लिये देश की क्षमताओं को मज़बूत करना है, महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
    • नीति निर्माता ग्रीनहाउस उत्सर्जन एवं सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिये साइकिल मार्गों का विस्तार कर सकते हैं और हरित एवं स्वस्थ स्थानों के प्रावधान को बढ़ावा दे सकते हैं। यह शारीरिक गतिविधियों और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में योगदान कर सकता है।
  • लैंगिक समानता के रूप में सामाजिक परिवर्तन लाना: आज भारतीय महिलाएँ पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ और बेहतर शिक्षित हैं, लेकिन लैंगिक मानदंडों के कारण उनकी श्रम शक्ति भागीदारी दर दुनिया में सबसे कम (लगभग 25%) में से एक है और वस्तुतः इसमें गिरावट ही आ रही है।
    • लैंगिक असमानता शिक्षित, ऊर्जावान महिलाओं को भारतीय अर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान से अवरुद्ध कर रही है। उन्हें रोज़गार अवसर और बेहतर एवं सुरक्षित परिवहन सुविधाएँ प्रदान कर इस प्रवृत्तियों में उत्क्रमण न केवल महिलाओं को सशक्त बनाएगा बल्कि देश के लिये भी वृहत अवसर के द्वार खोलेगा।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘विश्व अभी एक निर्णायक क्षण में है; हम ऐसे निर्णय ले सकते हैं जो या तो हमारी पारिस्थितिकी को स्थायी क्षति पहुँचाएँगे या एक स्वस्थ, बेहतर और हरित विश्व को बढ़ावा देंगे। यह हम ही हैं जिन्हें अपने ग्रह, स्वास्थ्य और भविष्य की रक्षा के लिये सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देनी होगी।’’ टिप्पणी कीजिये।

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