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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से संबंधित मुद्दे

  • 25 May 2019
  • 17 min read

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्या है?

क्रेडिट रेटिंग जारीकर्त्ता या साधन की संदर्भित साख-योग्यता (Creditworthiness) के संबंध में किसी मान्यता प्राप्त निकाय का सुविज्ञ मत या अनुमान है। सरल शब्दों में कहें तो यह ‘ऋण साधन पर ब्याज और मूलधन के समयबद्ध भुगतान से जुड़े जोखिम के सापेक्ष स्तर पर’ पर किसी मान्यता प्राप्त एजेंसी द्वारा दी गई राय है। ऐसे मान्यता प्राप्त निकायों को  क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ​​(Credit Rating Agencies-CRAs) के रूप में जाना जाता है।

किस आधार पर मिलती है CRA  रेटिंग?

  • CRA सामान्यतः विभिन्न मापदंडों के आधार पर रेटिंग देती हैं जो ‘कंपनियों’ और ‘देशों’ के अनुरूप अलग-अलग होती है।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर AAA, BBB, CA, CCC, C, D आदि वर्गों में रेटिंग दी जाती है। इस रेटिंग के तहत देशों, बड़ी कंपनियों या बड़े पैमाने पर उधार लेने वालों का मूल्यांकन किया जाता है।
  • इस मूल्यांकन पर निर्भर करता है कि उधार लेने वाले की आर्थिक स्थिति कैसी है और उनकी उधार लौटाने की क्षमता कितनी है। अच्छी रेटिंग का अर्थ है कम ब्याज पर आसानी से कर्ज़ और खराब रेटिंग होने पर ऊँची दरों पर मुश्किल से कर्ज़ मिल पाता है।

CRA से जुड़ी विभिन्न समस्याएँ

  • इस समय रेटिंग की दुनिया में तीन बड़े नाम हैं- स्टैंडर्ड एंड पूअर, मूडीज़ और फिच। लगभग 95 प्रतिशत बाज़ार पर इनका कब्ज़ा है तथा ये एजेंसियाँ विस्तारवादी विपणन का उपयोग करती हैं।

वैचारिक पूर्वाग्रह: CRA नकारात्मक नीति और बाज़ार में होने वाले विचलन या अस्थिरता को सीमित/नियंत्रित करने के लिये कुछ राजनीतिक विचारधाराओं के पक्ष में या उनके समर्थक प्रतीत हो सकते हैं, क्योंकि वे मध्यावधि में रेटिंग को स्थिर रखने के लिये प्रयासरत होते हैं।

  • उदाहरण के लिये, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के 23 सदस्य देशों के संबंध में वर्ष 1995 से 2014 के बीच स्टैंडर्ड एंड पूअर, मूडीज़ और फिच क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा दी गई रेटिंग का जब एक पैनल ने विश्लेषण किया तो स्पष्ट हुआ कि वामपंथी कार्यकारी शासन और गैर-निवर्तमान वामपंथी कार्यकारी शासन की चुनावों में जीत के साथ नकारात्मक रेटिंग बदलावों की संभावनाएँ जुड़ी हुई थी।

हितों का टकराव: क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का वित्तपोषण उन्हीं कंपनियों द्वारा किया जाता है जिनकी वे रेटिंग करती हैं। ऐसे में हितों का टकराव होना अवश्यम्भावी है।

पूर्व-आकलन क्षमता का अभाव: CRA बाज़ार का अनुसरण करती हैं, इसलिये बाज़ार ही एजेंसियों को संकटों का संकेत देते हैं। यही कारण है कि बार-बार सामने आने वाली चूकों (Defaults) और वित्तीय आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ असमर्थता प्रकट करती रही हैं।

लापरवाही और अक्षमता: CRA द्वारा अनुमान लगाने की कार्यविधि पर भी सवाल उठते रहे हैं। उदाहरण के लिये, विभिन्न अनुमान विधियों के उपयोग के बाद भी एजेंसियों द्वारा ऋण देने या न देने के संबंध में कोई स्पष्ट राय नहीं मिलती है। यह भी आरोप लगाया जाता है कि CRA अपनी रेटिंग पर दृढ़ निर्णय ले सकती हैं, लेकिन अक्सर वे ऐसा करने का प्रयास नहीं करती हैं।

राजनीतिक रूप से प्रेरित: यह आरोप भी लगाया गया है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ अपने रेटिंग तंत्र के माध्यम से सरकारों पर दबाव बनाती हैं कि वे उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर आगे बढ़ें।

  • उदाहरण के लिये, स्टैंडर्ड एंड पूअर ने ट्यूनीशिया में उथल-पुथल के दौरान ने पड़ोसी देशों के लिये Downward Ratings Pressures की चेतावनी जारी की थी कि वे ‘लोकलुभावनवादी’ कर कटौती अथवा सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करके देश में सामाजिक असंतोष को शांत करने का प्रयास करें।
  • उल्लेखनीय है कि रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लेने के बाद रेटिंग एजेंसियों ने रूस की रेटिंग घटा दी थी।

नीति मध्यस्थता: वर्ष 2003 में अनैतिक तथा गलत तरीके से दिये जाने वाले ऋणों (Predatory Lending) पर रोक लगाने के लिये अमेरिका में जॉर्जिया राज्य ने एक अधिनियम पारित किया। अमेरिका के अन्य राज्य भी इसका अनुसरण करने वाले थे कि तभी स्टैंडर्ड एंड पूअर की चेतावनी सामने आ गई। परिणामतः वर्ष 2008-09 का वित्तीय संकट उभरा और यह सर्वविदित है कि यही प्रेडटरी ऋण इसके लिये ज़िम्मेदार था।

आपको बता दें कि प्रेडटरी ऋण में वे सभी अनैतिक कृत्य शामिल हैं जो ऋणदाता द्वारा किसी उधारकर्त्ता को ऐसे ऋण लेने के लिये लुभाने, प्रवृत्त करने और सहारा देने के लिये आज़माए जाते हैं जिनमें उच्च शुल्क और उच्च-ब्याज दर जुड़ी होती है और उधारकर्त्ता को इक्विटी से वंचित रखा जाता है।

भारत में राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग

  • रेटिंग कंपनियों के बीच कोई एकरूपता नहीं: भारत में एक सामान्य निवेशक देश में प्रचलित विभिन्न क्रेडिट रेटिंग्स को समझने में सक्षम नहीं है क्योंकि मौजूदा क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के बीच कोई एकरूपता नहीं है।
  • देश में रेटिंग में किसी मानकीकरण का पालन नहीं होता है और रेटिंग एजेंसियों के लिये कोई मानकीकृत शुल्क संरचना भी निर्धारित नहीं है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्यों आवश्यक है?

  • चूँकि 1980 के दशक के बाद से देश में वित्तीय प्रणाली अधिक नियंत्रण-मुक्त हो गई तथा भारतीय कंपनियाँ वैश्विक ऋण बाज़ारों से अधिकाधिक ऋण लेने लगी। यही वज़ह थी कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की राय या अनुमान अधिकाधिक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण होते गए।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका

  • सूचना विषमता को कम करना: चूँकि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ कंपनी के प्रबंधन और इसके कार्यकरण की गोपनीय सूचना तक पहुँच रखती हैं, इसलिये वे इसके दायित्वों की पूर्ति के लिये किसी साधन की योग्यता के बारे में सुविज्ञ राय दे सकती हैं। 
  • जारीकर्त्ताओं के लिये उपयोगिता सेवा: जारीकर्त्ता अपने निर्गम (Issue) की गुणवत्ता को CRA की रेटिंग के माध्यम से संक्षिप्त रूप से संप्रेषित करता है जो इसे साख-योग्यता स्थापित करने में सहायता करती है।
  • वित्तीय बाजारों के लिये प्रहरी:
  • CRA विनियमन लागत में कमी लाकर वित्तीय बाज़ार नियामकों को मूर्त लाभ प्रदान करती हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक जैसे नियामक अपने विनियमित निकायों की जागरूकता और निर्णयन में सुधार करने के लिये CRA का उपयोग करते हैं।
  • उदाहरण के लिये, बैंकों की पूंजी पर्याप्तता के निर्धारण, जोखिम वाली परिसंपत्तियों के समाधान आदि के लिये क्रेडिट रेटिंग का उपयोग किया जाता है।

नियामक लाइसेंस के पैरोकार

  • कुछ वित्तीय नियामक यह निर्देश देते हैं कि वित्तीय साधनों को जारी करने से पूर्व अनिवार्य रूप से उनकी रेटिंग की जानी चाहिये।
  • वित्तीय प्रणाली में CRA का व्यापक एकीकरण पैरोकार के रूप में उनकी भूमिका को रूपांतरित कर देता है।

नैतिक प्रत्यायन: यह विकासशील देशों पर अधिक विवेकपूर्ण और उपयुक्त मौद्रिक व राजकोषीय नीतियों के अनुपालन का दबाव रखता है।

विश्वभर में रेटिंग एजेंसियों की विफलता के दृष्टांत

  • एनरॉन घोटाला- 2001
  • वैश्विक आर्थिक संकट- 2007-08

वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान अरबों डॉलर मूल्य के AAA रेटेड बंधक रखी गई प्रतिभूतियों को मूल रेटिंग जारी होने (वर्ष 2007-08) के दो वर्षों के अंदर ही Junk (न्यूनतम संभव रेटिंग) में डाल दिया गया।

भारत के दृष्टांत

  • 2009 का सत्यम घोटाला
  • हालिया PNB संकट
  • IL&FS (AAA रेटिंग के बावजूद) की हालिया दुर्दशा

क्यों आवश्यक है CRA का विनियमन?

  • रेटिंग शॉपिंग (Rating Shopping): प्रायः देखा गया है कि जारीकर्त्ता और निवेशक दोनों रेटिंग शॉपिंग (रेटिंग की खरीदारी) में लिप्त रहते हैं।
  • बाज़ार में अधिक हिस्सेदारी और लाभ अंतर प्राप्त करने हेतु विशेष रूप से संरचित उत्पाद बाज़ार के लिये CRA रेटिंग को बढ़ा देते है। जारीकर्त्ता अपने उत्पादों के लिये उच्च रेटिंग की इच्छा रखते हैं, क्योंकि इससे वे अधिक सुरक्षित नज़र आते हैं और उन्हें उच्च मूल्य पर बेचा जा सकता है। उच्च रेटिंग वाली प्रतिभूतियाँ कम सुरक्षा की मांग रखती हैं जिससे निवेशक को अधिक जोखिम लेने का अवसर प्राप्त होता है।
  • विनियामक आवश्यकताओं और निवेश आदेशों के कारण भी निवेशक उच्च रेटिंग की इच्छा रखते हैं।
  • आधिपत्यकारी नियंत्रण (Hegemonic Control): चूँकि तीनों बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ उत्तरी अमेरिका में अवस्थित हैं और अमेरिका उनके कार्यकलापों पर व्यापक नियंत्रण रखता है।
  • जब CRA ने USA को रेटिंग में डाउनग्रेड किया तो इन एजेंसियों पर ज़ुर्माने लगाए गए।
  • इन एजेंसियों ने UK को USA से कम रेटिंग दी थी, जबकि तब UK का राजकोषीय घाटा USA की तुलना में कम था। इस प्रकार, देशों की रेटिंग निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई थी।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का विश्व अर्थव्यवस्था पर काफी नियंत्रण है क्योंकि उनकी रेटिंग किसी भी देश से पूंजी के त्वरित पलायन का कारण बन सकती है।
  • CRA किसी भी देश के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं और इसके अतिरिक्त उनकी कार्यप्रणाली भी पारदर्शी नहीं है।

आगे की राह

  • वर्ष 2008-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट की प्रतिक्रिया में अमेरिकी कांग्रेस ने जुलाई 2010 में डॉडफ्रैंक वॉल स्ट्रीट सुधार (DoddFrank Wall Street Reform) और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के वैधानिक उत्तरदायित्त्व में वृद्धि की आवश्यकता है।
  • उन विनियमनों में क्रेडिट रेटिंग के उपयोग को समाप्त अथवा स्थानांतरित किया जाना चाहिये, जो पूंजीगत आवश्यकताओं को निर्धारित करते हैं और वित्तीय संस्थानों के लिये परिसंपत्तिधारिता को प्रतिबंधित करते हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर

  • SEBI तथा RBI जैसे भारतीय नियामकों को अपने विनियमनों की समीक्षा करनी चाहिये और पूरे क्रेडिट रेटिंग ढाँचे में अधिक निष्पक्षता, पारदर्शिता व विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये उन्हें संशोधित करना चाहिये।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा किये जा रहे हितों के टकराव के समाधान के लिये निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण निर्धारक भी इसमें शामिल किये जाने चाहिये:
  • प्रवर्तक (प्रमोटर) समर्थन की सीमा
  • सहायक कंपनियों के साथ संलग्नता
  • निकट-आवधिक भुगतान दायित्वों की पूर्ति के लिये तरलता की स्थिति 
  • भारत में नियामक 'निवेशक भुगतान मॉडल' (Investor Pays Model) या 'नियामक भुगतान मॉडल’ (Regulator Pays Model) जैसे अन्य विकल्पों पर भी इनके गुण-दोषों की तुलना करने के बाद विचार कर सकते हैं।
  • वैकल्पिक रूप से मौजूदा ढाँचे के तहत जारीकर्त्ता द्वारा देय उपयुक्त रेटिंग शुल्क संरचना का निर्धारण SEBI द्वारा RBI और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के परामर्श से किया जा सकता है।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का रोटेशन: वर्तमान ढाँचे के अंतर्गत क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के रोटेशन का कोई प्रावधान नहीं है।
  • रेटिंग एजेंसियों के ‘Mandatory Audit Rotation’ पर विचार किया जाना चाहिये। यह जारीकर्त्ता और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के बीच दीर्घकालिक संबंधों के नकारात्मक परिणामों से बचने में मदद करेगा। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की हाल की विफलताओं को देखते हुए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि उनके हाल के उदाहरणों से उनकी ग्राहक-इकाइयों में संकट की पहचान की जाए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ दशकों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है, लेकिन अभी भी बुनियादी आर्थिक मुद्दों में व्यापक सुधार की गुंजाइश है। उदाहरण के लिये, भारत में उच्च राजकोषीय घाटा एक गंभीर आर्थिक समस्या है, ऐसे में भारत को रेटिंग एजेंसियों के पीछे भागने की बजाय इस मूल समस्या पर ध्यान केंद्रित करना होगा। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि रेटिंग एजेंसियों की कार्यप्रणाली में त्रुटियाँ खोजने के बजाय भारत को क्षमता निर्माण पर ज़ोर देना चाहिये। यदि भारत इन मूलभूत बातों पर ध्यान देता है तो इसकी क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो या न हो भारतीय अर्थव्यवस्था प्रगति के मार्ग पर अग्रसर रहेगी।

अभ्यास प्रश्न: भारत के संदर्भ में तमाम विवादों के चलते क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की उपयोगिता पर चर्चा कीजिये।

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