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नागरिक केंद्रित डिजिटलीकरण

  • 04 Nov 2022
  • 14 min read

यह एडिटोरियल 03/11/2022 को ‘लाइवमिंट’ में प्रकाशित “G20 offers India a chance to be the architect of a new digital economy” लेख पर आधारित हूँ। इसमें भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था में नागरिक केंद्रीयता की आवश्यकता के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

डिजिटल अवसंरचना का उभार नागरिकों के लिये बिजली, जल और सड़क जैसी पारंपरिक अवसंरचना आवश्यकताओं के समान या उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण अवसंरचना आवश्यकता के रूप में हुआ है। कोविड-19 महामारी ने न केवल वैश्विक व्यवस्था को बदल दिया है, बल्कि इसने लगातार बढ़ती डिजिटल अवसंरचना को भी गति प्रदान की है।

  • किसी समाज के कार्यकरण और उसके नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता के लिये डिजिटल अवसंरचना अनिवार्य हो गई है। भारत में लगभग आधा बिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और बड़ी संख्या में स्वदेशी डिजिटल सेवाओं के साथ अनुमान है कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का व्यापक रूपांतरण होगा।
  • किसी डिजिटल अर्थव्यवस्था की सफलता के लिये आवश्यक है कि यह महत्त्वपूर्ण सेवाओं के लिये सभी नागरिकों को एकसमान अवसर और पहुँच प्रदान करे। भारत को अपनी शक्ति की पहचान करनी होगी। उसे एक नागरिक केंद्रित डिजिटल अर्थव्यवस्था हेतु एक ढाँचे के निर्माण के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।

भारत की डिजिटल क्रांति में नागरिक केंद्रीयता की वर्तमान स्थिति

  • भारत सरकार का डिजिटल इंडिया कार्यक्रम देश के कोने-कोने तक हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करने का लक्ष्य रखता है। इसके अलावा, यह नागरिकों की सुविधा और शासन में सुधार के लिये विभिन्न प्रकार की डिजिटल सेवाओं की स्थापना का लक्ष्य रखता है।
  • डिजिटल इंडिया के तहत शामिल कुछ प्रमुख परिवर्तनकारी डिजिटल प्लेटफार्म हैं:
    • MyGov: इसने एक साझा डिजिटल प्लेटफार्म प्रदान कर देश में नागरिक संलग्नता एवं भागीदारी शासन की सुदृढ़ नींव रखी है, जहाँ नागरिक सरकारी कार्यक्रमों एवं योजनाओं के संबंध में अपने विचार साझा कर सकते हैं।
    • यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface- UPI): यह मोबाइल फोन के माध्यम से अंतर-बैंक लेनदेन की सुविधा के लिये भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (National Payments Corporation of India- NPCI) द्वारा विकसित एक तत्काल वास्तविक समय भुगतान प्रणाली (instant real-time payment system) है।
      • वर्ष 2021 में UPI के माध्यम से लगभग 39 बिलियन लेनदेन हुए (कुल राशि 940 बिलियन अमेरिकी डॉलर)। यह राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 31% के बराबर है।
    • डिजिटल लॉकर/डिजिलॉकर(DigiLocker): यह उपयोगकर्त्ताओं को उनके दस्तावेज़ सत्यापन एवं भंडारण हेतु डिजिटल स्पेस प्रदान कर पेपरलेस शासन को सक्षम कर रहा है।
    • मेघराज (MeghRaj): क्लाउड कंप्यूटिंग के उपयोग और इसके लाभों का दोहन करने के लिये सरकार ने जीआई क्लाउड (GI Cloud) की एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है जिसे मेघराज नाम दिया गया है।
      • इस पहल का मुख्य ध्येय सरकार के ICT व्यय को इष्टतम करते हुए देश में ई-सेवाओं के वितरण में तेज़ी लाना है।
    • स्वयं और स्वयंप्रभा: स्वयं (SWAYAM) पोर्टल 2,000 से अधिक खुले पाठ्यक्रम प्रदान कर शिक्षा प्रणाली को रूपांतरित करने की ओर अग्रसर है। स्वयंप्रभा (SWAYAMPRABHA) उच्च गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक कार्यक्रमों के प्रसारण के लिये समर्पित 32 DTH टीवी चैनलों का एक समूह है।

भारत में नागरिक-केंद्रित डिजिटलीकरण के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ

  • डिजिटलीकरण प्रेरित केंद्रीकरण: चूँकि डिजिटल प्रौद्योगिकी शासन को एकीकृत करती है और केंद्र सरकार अधिकांश डेटा धारण करती है, केंद्रीकरण (centralisation) केंद्र और राज्यों के बीच कलह का कारण बन सकता है।
    • यह तब और अधिक प्रासंगिक बन जाता है जब वित्तीय सहायता के लिये एक पूर्व शर्त के रूप में डेटा साझाकरण के लिये केंद्र सरकार द्वारा विशिष्ट मानक निर्धारित किये जाते हैं।
  • ‘डिजिटल डिवाइड’: डिजिटल निरक्षरता का उच्च स्तर प्रौद्योगिकियों के अनुकूलन के मामले में डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती और बाधा है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 में इंटरनेट साक्षरता के मामले में भारत को 120 देशों के बीच 73वें स्थान पर रखा गया था।
    • इसके अलावा, डिजिटल सेवाएँ स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं हैं, जो डिजिटल साक्षरता के लिये एक प्रमुख बाधा है।
  • भ्रामक सेवा रणनीतियाँ: डिजिटल जगत में सेवाओं का ‘फ्री’ होना एक मिथक मात्र है। निजीकरण (Personalization) डेटा पर आधारित होता है। उपयोगकर्ताओं के लिये इसके लाभों के बावजूद, फर्मों द्वारा एकत्रित निजी डेटा का उपयोग लक्षित विज्ञापन एवं अन्य उत्पादों/सेवाओं की क्रॉस-सेलिंग के माध्यम से पैसा कमाने के लिये किया जाता है।
    • जब तक इन सेवाओं को विनियमित नहीं किया जाता, तब तक निष्पक्ष डिजिटलीकरण संभव नहीं होगा।
  • डिजिटलीकरण की विषमता: शहरी और ग्रामीण भारत के बीच एक व्यापक डिजिटल अवसंरचनागत अंतराल मौजूद है। वित्तपोषण की समस्या अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचना निर्माण की लागत को पूरा करने में सक्षम नहीं है।
    • निजी दूरसंचार उद्योग के तेज़ विकास के साथ सक्षम निजी क्षेत्र संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में टावरों के निर्माण से बचते हैं क्योंकि वे इसे व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं पाते हैं।
      • वर्तमान में 25,000 से अधिक गाँव मोबाइल कनेक्टिविटी से वंचित हैं क्योंकि इन स्थानों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करना व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं माना गया।
  • ‘बिग टेक’ का प्रभुत्व: बिग टेक कंपनियाँ उपभोक्ता निष्ठा अर्जित करने के बजाय उसकी खरीद के लिये प्रतिस्पर्द्धियों का अधिग्रहण कर लेती हैं। वे एक व्यवसाय में अपने बाजार प्रभुत्व का लाभ उठाते हुए दूसरे व्यवसायों में आधिपत्य प्राप्त कर लेते हैं जहाँ उपभोक्ताओं को अपने उत्पादों एवं सेवाओं के पारितंत्र तक सीमित कर देते हैं।

आगे की राह

  • उभरती प्रौद्योगिकियों की खोज: ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकियों के साथ शासन को एकीकृत करने की आवश्यकता है जो भारत में डिजिटल क्रांति को सुदृढ़ करेगा और पारदर्शिता एवं सूचना विकेंद्रीकरण को बढ़ाएगा।
    • इसके साथ ही, क्वांटम टेक्नोलॉजी और इंटरनेट ऑफ थिंग्स का एक विनियमित तरीके से विस्तार भारत के लिये वास्तविक समय आधारित अर्थव्यवस्था (real-time based economy) के लिये नए अवसर के द्वार खोलेगा।
  • एकीकृत डिजिटल वातावरण: हमारे नियामक तंत्र को डेटा प्राइवेसी के उभरते जोखिमों को समझने में सक्षम होना चाहिये और फर्मों का उचित सुरक्षा उपाय करने के संबंध में मार्गदर्शन करना चाहिये।
    • विनियमों को डिजिटल बाज़ार के लिये एक प्रतिस्पर्द्धी माहौल का निर्माण करना चाहिये और एक कुशल सहन क्षमता प्रदान की जानी चाहिये ताकि अवलंबी को असफल होने का भय न रखें (क्योंकि इस उद्योग में विफल होने वाले स्टार्टअप्स की संख्या सफल होने वाले स्टार्टअप्स से कहीं अधिक है)।
  • ‘बॉटम-अप डिजिटलाइजेशन’: नागरिकों को ई-सेवाएँ प्रदान करने के लिये पंचायत स्तर पर कॉमन सर्विस सेंटर ( CSCs) को डिजिटल एक्सेस प्वाइंट के रूप में पुनर्जीवित किया जा सकता है, जो सरकार और गामीण नागरिकों के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हुए सेवाओं के वितरण में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता का सुधार करेंगे।
  • सहकारी और प्रतिस्पर्द्धी डिजिटल संघवाद: चूँकि भारतीय राज्य ई-रेडीनेस के मामले में अलग-अलग स्तर रखते हैं, देश भर में ई-गवर्नेंस सुधारों को लागू करते समय इस पहलू पर विचार किया जाना चाहिये।
    • इसके साथ ही, वर्तमान में देश में कई सफल परियोजनाएँ चल रही हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही राष्ट्रीय स्तर पर कार्यान्वित हैं। सफल मॉडलों को पूरे देश में दोहराने तथा उन्हें और बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
  • नवाचार और सुरक्षा का सह-अस्तित्व: एक ऐसी डिजिटल दुनिया का सह-निर्माण एवं सह-स्वामित्व जिसमें नवाचार और सुरक्षा का सह-अस्तित्व हो, अनिवार्य है। इसे प्राप्त करने के लिये, प्रौद्योगिकी उद्योग एवं नियामकों/सरकारी निकायों को सार्थक रूप से सहयोग करने की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही एक वृहत परिप्रेक्ष्य को साकार करने के लिये उन्हें अपने नियामक दृष्टिकोणों में सामंजस्य स्थापित करना होगा।
    • अभी जब भारत G20 की अध्यक्षता करने जा रहा है, वह इस पुन:अभिकल्पित डिजिटल अर्थव्यवस्था का वास्तुकार बन सकता है ताकि विश्व जब भी डिजिटल के बारे में सोचे तो उसे भारत की याद आए।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘डिजिटलीकरण भारत में केंद्रीकरण को प्रेरित कर रहा है।’’ टिप्पणी कीजिये।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

 प्रारंभिक परीक्षा

Q. निम्नलिखित में से कौन भारत सरकार की "डिजिटल इंडिया" योजना का लक्ष्य/उद्देश्य है/हैं? (वर्ष 2018)

  1. चीन जैसी भारत की अपनी इंटरनेट कंपनियों का गठन किया।
  2. हमारी राष्ट्रीय भौगोलिक सीमाओं के भीतर अपने बड़े डेटा केंद्र बनाने के लिए बिग डेटा एकत्र करने वाले विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों को प्रोत्साहित करने के लिए एक नीतिगत ढाँचा स्थापित करें।
  3. हमारे कई गाँवों को इंटरनेट से जोड़ें और हमारे कई स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों और प्रमुख पर्यटन केंद्रों में वाई-फाई लाएँ।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

 (A) केवल 1 और 2
 (B) केवल 3
 (C) केवल 2 और 3
 (D) 1, 2 और 3

 उत्तर: (B)


 मुख्य परीक्षा

Q. "चौथी औद्योगिक क्रांति (डिजिटल क्रांति) के उद्भव ने सरकार के अभिन्न अंग के रूप में ई-गवर्नेंस की शुरुआत की है"।  विचार-विमर्श कीजिये। (वर्ष 2020)

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