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एमएसपी फसलों के संभावित विकल्प

  • 17 Dec 2020
  • 11 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में हरित क्रांति बेल्ट के राज्यों में गेहूँ और चावल के उत्पादन में हुई व्यापक वृद्धि के कारकों, इसकी चुनौतियों व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) ने प्रौद्योगिकी और नीतियों का महत्त्वपूर्ण पैकेज प्रदान किया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन (मुख्यतः गेहूँ और चावल) बढ़ाने की दिशा में त्वरित परिणाम देखने को मिले। इसने भारत को प्रधान खाद्यान्नों की भारी कमी का सामना करने वाले देश से आत्मनिर्भर बनने में सक्षम बनाया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश देश में हरित क्रांति की तकनीकी को सबसे पहले अपनाने वाले राज्य थे। साथ ही ये क्षेत्र देश में आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी के प्रसार हेतु अपनाई गई विभिन्न नीतियों के प्रमुख लाभार्थी भी थे। इन दोनों फसलों की प्रगति और विशेषज्ञता ने खाद्य सुरक्षा की स्थिति हासिल करने के देश के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि वर्ष 1980 के दशक के मध्य में सामान्य रूप से चावल-गेहूँ की फसल प्रणाली और धान की खेती से संबंधित कुछ प्रतिकूल रुझानों के साथ हरित क्रांति की कुछ गंभीर समस्याएँ देखने को मिलीं।

अतः कृषि संकट से निपटने के लिये इन कोर हरित क्रांति राज्यों को उच्च मूल्य वाली फसलों की तरफ बढ़ने के साथ गैर-कृषि गतिविधियों को भी बढ़ावा देना चाहिये। 

गेहूँ और चावल उत्पादन को बढ़ावा देने वाले कारक: 

  • उत्पादन हेतु राज्य की गारंटी:  ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) पर धान (चावल) और गेहूँ के विपणन अधिशेष की खरीद ने किसानों को कीमत या बाज़ार जोखिम के खिलाफ पूरी तरह से सुरक्षित रखा है।
  • इसी दौरान MSP ने इन दो फसलों से आय का एक यथोचित स्थिर प्रवाह भी सुनिश्चित किया।  

तकनीकी उन्नति:  समय के साथ अन्य प्रतिस्पर्द्धी फसलों की तुलना में चावल और गेहूँ के तकनीकी लाभ में वृद्धि हुई, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा कृषि अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में इन दो फसलों पर अपने सर्वोत्तम संसाधनों और वैज्ञानिक जनशक्ति लगा दी गई।

इनपुट सब्सिडी की भूमिका: जल और भूमि में सार्वजनिक तथा निजी निवेश के साथ इनपुट सब्सिडी इन फसलों के उत्पादन में हुई व्यापक वृद्धि के अन्य अनुकूल कारक थे।

  • इस प्रकार खरीफ में धान और रबी में गेहूँ अन्य प्रमुख फसलों (अनाज, दलहन, तिलहन) की तुलना में उत्पादकता, आय, मूल्य तथा उपज के जोखिम के मामले में सबसे बेहतर फसल के रूप में सामने आए।

पहली हरित क्रांति का प्रभाव और अन्य संबंधित मुद्दे:

    • बड़ी संख्या में रिपोर्ट और नीति दस्तावेज़ों ने प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकी, पर्यावरण और राजकोषीय संसाधनों पर हरित क्रांति की फसलों (विशेष रूप से धान की खेती) के प्रतिकूल प्रभाव को रेखांकित किया है।
      • पर्यावरणीय प्रभाव:  धान की खेती और सिंचाई के लिये भूजल के अनियंत्रित दोहन हेतु मुफ्त बिजली देने की नीति का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भू-जल की तीव्र गिरावट  के रूप में देखने को मिला है।
      • पिछले एक दशक में  पंजाब में और हरियाणा के जल स्तर में क्रमशः 84% तथा 75% की गिरावट देखी गई है।
      • विशेषज्ञों द्वारा ऐसी आशंका व्यक्त की गई है कि यदि भू-जल दोहन के वर्तमान स्तर कम नहीं किया जाता है तो अगले कुछ ही वर्षों में पंजाब और हरियाणा में भू-जल के समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
      • इसके अतिरिक्त पिछले कुछ वर्षों में धान के डंठल तथा पुआल को जलाए जाने से  पूरे क्षेत्र में एक और गंभीर पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य खतरा उत्पन्न हो गया है। 
    • आय और उत्पादकता में स्थिरता: चावल-गेहूँ की खेती में एक समय के पश्चात् उत्पादकता और आय में बिना किसी विशेष वृद्धि के इसके स्थिर बने रहने के संदर्भ में भी गंभीर चिंताएँ बनी हुई हैं।
      • चावल और गेहूँ की उत्पादकता के ऐसे ही एक स्थिरता तक पहुँचने के कारण आय में वृद्धि के लिये MSP को बढ़ाए जाने का दबाव तेज़ हुआ है। हालाँकि मांग और आपूर्ति की वर्तमान स्थिति MSP में वृद्धि का समर्थन नहीं करती।   
    • राजकोषीय चुनौती:  हाल के वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति चावल और गेहूँ की खपत में गिरावट के साथ उपभोक्ताओं द्वारा अन्य खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने के मामलों में वृद्धि देखी गई है। हालाँकि वर्ष 2006-07 के बाद से देश में चावल और गेहूँ की खरीद दोगुने से अधिक हो गई है। 
      •  इस मांग-आपूर्ति बेमेल के कारण देश को ऐसे बड़े खाद्यान्न भंडार की खपत का कोई आसान तरीका नहीं मिल रहा है जिसके कारण इसका रखरखाव और नई फसलों की खरीद सरकार के राजकोषीय संसाधनों पर तनाव पैदा कर रही है।
    • किसानों का उद्यमिता कौशल: पिछले लगभग 50 वर्षों से अधिक समय से बाज़ार में आने वाले चावल और गेहूँ की लगभग पूरी उपज की MSP पर खरीद ने एक प्रतिस्पर्द्धी बाज़ार (जहाँ कीमतों का निर्धारण मांग और आपूर्ति तथा प्रतिस्पर्द्धा जैसे कारकों के आधार पर किया जाता है) में अपने उत्पादों को बेचने के किसानों के उद्यमशीलता कौशल को प्रभावित किया है। 

    आगे की राह: 

    • विविधता और वैकल्पिक चुनाव:  इतने बड़े पैमाने पर कुछ ही फसलों की खेती और MSP वृद्धि से जुड़ी चुनौतियों का परिणाम यह होगा कि किसानों के लिये चावल-गेहूँ की खेती से अपनी आय में वृद्धि करना कठिन हो जाएगा और ऐसे में उन्हें अपनी आय को बनाए रखने हेतु क्षेत्र विशेष की जलवायु के अनुरूप फसलों के चुनाव हेतु व्यापक विकल्प प्रदान करने होंगे।
      • हरित क्रांति बेल्ट के किसानों को उच्च-भुगतान वाली बागवानी फसलों की ओर बढ़ने हेतु सक्षम बनाने के लिये अनुबंध खेती जैसे मूल्य आश्वासन से जुड़े संस्थागत व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है।
      • परंपरागत हरित क्रांति वाले राज्यों में कृषि के समक्ष पारिस्थितिक, पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियों का समाधान MSP को वैध बनाना नहीं है, बल्कि  MSP फसलों से उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ना और गैर-कृषि गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
    • कृषि से जुड़े व्यवसायों और उद्योगों को बढ़ावा: हरित क्रांति बेल्ट राज्यों द्वारा अपनी स्थानीय विशिष्टताओं और ज़रूरतों के अनुरूप कृषि आधारित आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना बहुत ही आवश्यक है। इसके लिये संभावित विकल्पों में से कुछ निम्नलिखित हैं:
      • औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देना। 
      • कटाई के बाद मूल्य संवर्द्धन और आधुनिक मूल्य शृंखलाओं पर विशेष ज़ोर देना। 
      • उच्च तकनीक युक्त कृषि को बढ़ावा देना,  कृषि और कृषि-इनपुट उद्योगों के एक व्यापक नेटवर्क की स्थापना।
      • बिचौलियों के हस्तक्षेप के बगैर ‘खपत और उपभोक्ताओं’ तथा ‘उत्पादन एवं उत्पादकों’ के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने की व्यवस्था करना।

    निष्कर्ष:  हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान संकट से बाहर निकलने और खाद्य सुरक्षा के मामले में एक आत्मनिर्भर देश बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि खाद्य असुरक्षा से निपटने के इन प्रयासों के दौरान देश के एक बड़े हिस्से में कुछ सीमित फसलों जैसे- गेहूँ और चावल पर किसानों की निर्भरता बढ़ी है। साथ ही इनके उत्पादन में वृद्धि हेतु अपनाए जाने वाले गैर-प्राकृतिक हस्तक्षेपों की अधिकता के कारण कई अन्य चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। परंपरागत हरित क्रांति बेल्ट के राज्यों को खेती और ग्रामीण युवाओं के भविष्य को सुरक्षित तथा बेहतर बनाने के लिये कुछ ही फसलों तक सीमित रहने की बजाय प्रकृति और बाज़ार से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं गैर-कृषि क्षेत्र में एक अभिनव विकास रणनीति को अपनाना बहुत आवश्यक होगा।

    अभ्यास प्रश्न: हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है,  परंतु इसने देश की कृषि में विविधता की कमी के साथ कई अन्य समस्याओं को जन्म दिया है। चर्चा कीजिये।  

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