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स्टबल बर्निंग: समस्याएँ और विकल्प

  • 10 Sep 2021
  • 13 min read

यह एडिटोरियल दिनांक 09/09/2021 को ‘हिंदू बिज़नेसलाइन’ में प्रकाशित ‘‘From Waste To Wealth: An alternative to Punjab’s crop stubble burning’’ लेख पर आधारित है। इसमें फसल अवशेष या पराली जलाने से संबद्ध समस्याओं और इससे निपटने के वैकल्पिक तरीकों के बारे में चर्चा की गई है।

मानसून की अवधि में सिंधु-गंगा मैदान (जिसके अंतर्गत पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के क्षेत्र शामिल हैं) में धान की खेती ज़ोरों पर रहती है। वही किसान जो हमारी थाली में भोजन लाने के लिये कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं, इसके तुरंत बाद ही पराली जलाने (जो भारत में धान अपशिष्ट प्रबंधन का एक आम दृश्य है) के अत्यधिक अस्वास्थ्यकर अभ्यास में संलग्न हो जाते हैं।

पराली जलाना अंतरिम रूप से तो सस्ता और द्रुत विकल्प नज़र आता है, लेकिन यह पर्यावरण के लिये अत्यंत असंवहनीय विकल्प है जो हवा को कालिख से भर देता है, मृदा को पोषक तत्त्वों से विहीन कर देता है और कई अन्य पारिस्थितिक जटिलताओं को जन्म देता है।

इस परिदृश्य में, पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिये वैकल्पिक समाधान ढूँढा जाना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

पराली जलाने से संबद्ध खतरे

  • वायुमंडलीय प्रदूषण में योगदान: पराली जलाने का वायुमंडलीय प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान है, जो औद्योगिक और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन के बाद तीसरे स्थान पर आता है।  
    • चीन जैसे एशियाई देशों में कुल बायोमास उत्सर्जन का लगभग 60% पराली जलाने से उत्पन्न होता है। इसके साथ ही, यह विश्व स्तर पर कुल बायोमास दहन (जंगल की आग सहित) के लगभग एक चौथाई भाग का निर्माण करता है।
    • भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को घेरने वाली भारी धुंध प्रत्यक्ष रूप से पराली जलाने से संबद्ध है, जो अक्तूबर-नवंबर माह में पराली जलाने की अवधि के दौरान उत्पन्न होती है।  
  • मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव: इससे उत्पन्न वायु प्रदूषण से त्वचा और आँखों में जलन से लेकर गंभीर स्नायु, हृदय और श्वसन-संबंधी रोगों जैसे विभिन्न स्वास्थ्य प्रभाव देखे गए हैं।  
    • प्रदूषण के उच्च स्तर से लंबे समय तक संपर्क मृत्यु दर में वृद्धि का कारण बनता है। अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण के उच्च स्तर के संपर्क में आने के कारण दिल्ली निवासियों की जीवन प्रत्याशा में लगभग 6.4 वर्ष की कमी आई है।
  • मृदा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक: यह मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम (NPK) जैसे आवश्यक पोषक तत्वों को नष्ट कर देता है।   
    • यह मृदा के तापमान को लगभग 42 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देता है और इस प्रकार लगभग 2.5 सेमी की गहराई तक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीवों को विस्थापित कर देता है या उन्हें मार देता है।
    • यह कृषि उत्पादकता को हानि पहुँचाता है क्योंकि वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक अम्ल वर्षा का कारण बनते हैं और लंबे समय तक कणीय/पार्टिकुलेट प्रदूषण से संपर्क रोगाणुओं या बीमारियों की वृद्धि को अवसर देता है।
    • पराली जलाने से उत्पन्न ग्राउंड लेवल ओज़ोन पादपों के चयापचय को प्रभावित करता है और उनकी पत्तियों में प्रवेश करता है और उन्हें नष्ट करता है, जो भारत के उत्तरी भागों में फसलों की गंभीर हानि का कारण बनता है।  
  • अर्थव्यवस्था पर भार: रिपोर्टों के अनुसार, वायु प्रदूषण में वृद्धि के कारण दिल्ली में पर्यटकों की आमद में लगभग 25-30% की कमी आई है।  
    • यह अनुमान लगाया गया है कि वायु प्रदूषण की आर्थिक लागत लगभग 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की है, जो विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 3.3% है।
    • विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 14 भारतीय शहर हैं (जिनमें से अधिकांश दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य उत्तरी राज्यों में हैं) और यह समस्या देश के लिये प्रति वर्ष औसतन 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत का कारण बनती है।

वैकल्पिक पद्धति को अपनाने की चुनौतियाँ

  • विकल्पों की कमी: पराली जलाने के दुष्प्रभावों से अवगत होने के बावजूद यह फसल कटाई के बाद के अपशिष्ट प्रबंधन के संबंध में किसानों के लिये एक आम अभ्यास बना हुआ है। आम किसानों से बातचीत से पता चलता है कि वस्तुतः विकल्पों के अभाव में यह अभ्यास बना रहा है। 
  • क्षमता की कमी: पंजाब के उदाहरण से समझें तो वहाँ किसान अपने चावल की फसल के लगभग 80% की कटाई कंबाइन हार्वेस्टर के उपयोग के माध्यम से करते हैं, जो लगभग 15 सेंटीमीटर ऊँचे डंठल छोड़ देता है। धान और गेहूँ के मामले में शेष रही पराली मात्रा में अनाज से 1.5 गुना अधिक होती है। 
    • इन्हें शारीरिक श्रम या कृषि उपकरण के उपयोग के माध्यम से खेतों से हटाना या मिट्टी में दबाना कठिन है, क्योंकि ये दोनों ही तरीके एक औसत किसान के लिये आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं हैं।
    • धान अवशेष प्रबंधन के अन्य तरीकों के लिये बाज़ार विखंडित हैं; उदाहरण के लिये, पंजाब में सात बायोमास पावर संयंत्र संयुक्त रूप से प्रति वर्ष मात्र 1 मिलियन मीट्रिक टन धान के भूसे की खपत करते हैं।
  • पराली प्रबंधन अवसंरचना की कमी: अपशिष्ट प्रबंधन के लिये अवसंरचना की कमी के कारण किसान पराली जलाने के पारंपरिक तरीके के अभ्यास के लिये बाध्य होते हैं और खुले मैदानों में लगभग 15.4 मिलियन मीट्रिक टन (कुल 19.7 मीट्रिक टन में से) पराली का दहन करते हैं (पंजाब सरकार के वर्ष 2017 के आँकड़े के अनुसार)।  
    • यह अभ्यास इसलिये किया जाता है क्योंकि यह किसानों के लिये फसल अवशेषों से मुक्त होने का सस्ता और द्रुत तरीका है जो अगले फसल चक्र से पहले समय पर खेत की सफ़ाई में मदद करता है।

पराली जलाने के अन्य विकल्प

  • बायो एंजाइम-पूसा: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agriculture Research Institute) ने बायो एंजाइम-पूसा (bio enzyme-PUSA) के रूप में एक परिवर्तनकारी समाधान पेश किया है।   
    • इस एंजाइम का छिड़काव 20-25 दिनों में ठूंठ को विघटित कर खाद में बदल देता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में और सुधार होता है।
    • यह अगले फसल चक्र के लिये उर्वरक खर्च को कम करते हुए जैविक कार्बन और मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि  करता है।
    • एक संवहनीय कृषि पद्धति के रूप में यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कटौती करता है और हवा में विषाक्त पदार्थों एवं कालिख के उत्सर्जन को रोकता है।
    • कुछ समय तक इस पद्धति के अभ्यास से यह मृदा के पोषण स्वास्थ्य और सूक्ष्मजीवीय गतिविधि में पर्याप्त वृद्धि करता है, जो किसानों के लिये कम लागत पर बेहतर उपज सुनिश्चित करते हैं और इसके साथ ही उपभोक्ताओं को जैविक उत्पाद प्राप्त होता है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ ज़मीनी-स्तर की संलग्नता: इसके लिये सक्रिय सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता होती है, जहाँ समाज के लाभ के लिये संसाधनों को ज़मीनी-स्तर पर ले जाया जाता है और समाधान की प्रस्तुति समयबद्ध तरीके से होती है।  
    • किसानों के लिये विकसित योजना में किसानों को भी संलग्न किया जाना चाहिये।
  • प्रौद्योगिकी-समर्थित कुशल क्रांति: पराली जलाना हरित क्रांति के विभिन्न अनापेक्षित परिणामों में से एक है। यह उपयुक्त समय है कि इस दोष को दूर किया जाए और हमारे किसानों को ‘कुशल क्रांति’ (Smart Revolution) के रूप में एक नया और स्थायी प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।   
    • प्रौद्योगिकी यहाँ प्राथमिक प्रवर्तक होगी, जो साझा अर्थव्यवस्था के लाभों को किसानों तक पहुँचाने में मदद करेगी।  
    • डिजिटलीकरण और संवहनीय अभ्यासों एवं परिणामों को सक्षम करने के लिये एक प्रतिबद्धता के साथ हम किसानों के मन में संवहनीय कृषि के लाभों का बीजारोपण कर सकते हैं।  
    • यदि सुव्यवस्थित रूप से इसे पूरा किया जाता है तो मृदा एवं वायु के स्वास्थ्य में सुधार आएगा, जलस्तर पुनः समृद्ध होगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
  • स्व-स्थाने एवं बाह्य-स्थाने प्रबंधन और फसल पैटर्न में परिवर्तन: 
    • स्व-स्थाने प्रबंधन (जैसे ज़ीरो-टिलर मशीनों और जैव-अपघटकों द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन) के लिये सरकार वर्तमान में किसानों को पराली को वापस मिट्टी में मिलाने के लिये उपकरण प्रदान कर रही है (ताकि वे इसे जलाएँ नहीं), लेकिन सभी किसानों को ये मशीनें उपलब्ध नहीं हो रही हैं। 
      • सरकार को उनकी उपलब्धता सभी के लिये सुनिश्चित करनी चाहिये।
    • इसी प्रकार, बाह्य-स्थाने प्रबंधन (जैसे मवेशियों के चारे के रूप में चावल के भूसे का उपयोग) के अंतर्गत कुछ कंपनियाँ अपने उपयोग के लिये पराली एकत्र कर रही हैं, लेकिन हमें इस दिशा में और अधिक कार्रवाई की आवश्यकता है।
    • फसल पैटर्न में बदलाव की भी आवश्यकता है क्योंकि वर्तमान पैटर्न (जैसे जल की कमी वाले उत्तर-पश्चिम भारत में धान की खेती) गिरते जलस्तर को देखते हुए उपयुक्त नहीं है।
  • अन्य वैकल्पिक उपयोग: पराली को जलाने के बजाय इसका पशु चारा, कंपोस्ट खाद, ग्रामीण क्षेत्रों में छत निर्माण, बायोमास ऊर्जा उत्पादन, मशरूम की खेती, पैकिंग सामग्री, ईंधन, कागज निर्माण, जैव-एथेनॉल एवं औद्योगिक उत्पादन आदि विभिन्न उद्देश्यों से इस्तेमाल किया जा सकता है।

अभ्यास प्रश्न: पराली को जलाना उनसे मुक्ति के लिये भले ही एक सस्ता और द्रुत विकल्प नज़र आता है, लेकिन यह पर्यावरण के लिये अत्यंत असंवहनीय है। चर्चा कीजिये।

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