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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

AI से नौकरियों की प्रकृति में बदलाव ( AI will transform India’s job scene)

  • 08 Nov 2018
  • 14 min read

 संदर्भ

हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में रहते हैं जिसने हमें उन्नत प्रौद्योगिकी, भंडारण क्षमता और सूचनाओं तक पहुँच प्रदान की है। प्रौद्योगिकी के गुणोत्तर विकास के पहले चक्र में कताई-मशीन, दूसरे में बिजली और तीसरे चक्र के अंतर्गत औद्योगिक क्रांति में कंप्यूटर का विकास हुआ। वर्ष 2016 में विश्व आर्थिक मंच ने AI को ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ या उद्योग 4.0 कहा है। उद्योग 4.0 या चौथी औद्योगिक क्रांति विश्व भर में एक शक्तिशाली बल के रूप में उभर कर सामने आई है। इसके अंतर्गत अधिक डिजिटाइजेशन और उत्पादों, वैल्यू चेन, व्यापार के मॉडल को एक-दूसरे से अधिक-से-अधिक जोड़ने के परिकल्पना की गई है। इसने हमें डेटा स्वामित्त्व और श्रम संरक्षण जैसे नियामक चुनौतियाँ भी दी हैं और विशेष रूप से यह स्वचालन के आधार पर नौकरियों और मज़दूरी के स्तर को प्रभावित करता है।

चौथी औद्योगिक क्रांति या उद्योग 4.0

  • पहली औद्योगिक क्रांति पानी और भाप की शक्ति के कारण हुई, जिसने मानव श्रम को यांत्रिकी निर्माण में परिवर्तित किया।
  • दूसरी औद्योगिक क्रांति विद्युत शक्ति के कारण हुई जिसके कारण बड़े स्तर पर उत्पादन संभव हो सका। तीसरी औद्यगिकी क्रांति ने इलेक्ट्रोनिक और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग द्वारा स्वचालित निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
  • चौथी औद्योगिक क्रांति वर्तमान में जारी है और इसमें ऑटोमेशन तथा निर्माण प्रौद्योगिकी में आँकड़ों का आदान-प्रदान किया जा रहा है।
  • उद्योग 4.0 के अंतर्गत निर्माण में परंपरागत और आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर वास्तविक और आभासी विश्व का गठजोड़ किया जाएगा।

उद्योग 4.0 और श्रम

  • प्रौद्योगिकी और रोज़गार पर ऑक्सफोर्ड मार्टिन प्रोग्राम 2013 के एक अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 2000 से केवल 0.5 प्रतिशत नई नौकरियाँ सृजित हुईं जोकि पहले मौजूद नहीं थीं।
  • यह उन 173 मिलियन नौकरियों के खिलाफ है जो जी-7 देशों में अगले आठ वर्षों में स्वचालित हो जाएंगी, उल्लेखनीय है कि जी-7 देश दुनिया की सात सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं।
  • विश्व बैंक द्वारा विश्व विकास रिपोर्ट (2016) के अनुसार स्वचालन के परिणामस्वरूप श्रम अधिशेष विकासशील देशों जैसे - एशिया से श्रम घाटे वाले देशों यथा- लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में श्रम के पुनर्वितरण की उम्मीद की गई है।
  • ऐसा माना जा रहा है कि ‘मध्यम-कौशल’ वाली नौकरियाँ जिन्हें नियमित संज्ञानात्मक और मैन्युअल अनुप्रयोगों की आवश्यकता होती है, अगले कुछ वर्षों में स्वचालित हो जाएंगी।
  • भारत के वैश्विक आईटी क्षेत्र का 65 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार प्रौद्योगिकी का 40 प्रतिशत हिस्सा वर्ष 2030 तक 69 प्रतिशत औपचारिक रोज़गार से स्वचालित नौकरियों में बदल जाएगा।

स्वचालन का प्रभाव

  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक, भारत में औपचारिक रोज़गार का 60 प्रतिशत लिपिकीय, बिक्री, सेवा, कुशल कृषि और व्यापार से संबंधित काम सहित, ‘मध्यम कौशल’ वाली नौकरियों पर निर्भर करता है, इनमें से सभी ऑटोमेशन के दायरे में हैं।
  • इस प्रकार स्वचालन से अर्थव्यवस्था के सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने वाले श्रम पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ेगा।
  • सूक्ष्म स्तर पर तीन मुख्य परिवर्तन होंगे जो स्वचालन लाएंगे इसमें कौशल मांग में परिवर्तन, कार्यबल के पुनर्वितरण में लिंग असमानता और फर्म पुनर्गठन शामिल हैं।
  • सबसे पहले, ‘कौशल की परिभाषा तीव्र गति से बढ़ते स्वचालन के साथ या उसके आसपास काम करने के लिये श्रमिकों की अनुकूलता को दर्शाती है। उदाहरण के लिये ‘सिस्टम कौशल’ की मांग जटिल समस्या सुलझाने की क्षमता और मानवीय धारणा से जुड़े सामाजिक कौशल की शारीरिक या सामग्री कौशल के विपरीत अधिक मांग होगी।
  • इसके परिणामस्वरूप विभिन्न नौकरियों हेतु समय और प्रयास पर सापेक्ष रिटर्न महत्त्वपूर्ण रूप से भिन्न होंगे। इसका मतलब यह है कि कुछ प्रकार की नौकरियों के लिये तो बेहतर होगा लेकिन अन्य प्रकार के कार्यों को पूरी तरह मिटा देगा।
  • उदाहरण के लिये महिला कर्मचारियों का मुख्य रूप से कॉल सेंटर, रिटेल और प्रशासन की नौकरियों  में योगदान कम होगा और डिजिटल बुनियादी ढाँचे के सृजन के कारण पुरुष श्रमिकों की मांग में वृद्धि होगी, जोकि लैंगिक पहलू में भी परिवर्तन लाएगा।
  • अंततः श्रमिकों के स्वचालन और पुनर्वितरण से ‘ह्यूमन क्लाउड प्लेटफॉर्म’ पर फर्मों को पुनर्संगठित करना होगा, जहाँ किसी भी स्थान से श्रमिकों को कार्य करने के लिये किराये पर लिया जा सकता है।
  • यह अल्पावधि में फर्म और कार्यबल रणनीतियों के बीच एक भिन्नता का कारण बन जाएगा।
  • वहीं सूक्ष्म स्तर पर स्वचालन, कार्य के अर्थ को बदल देगा। दरअसल, नौकरियों को तेज़ी से ‘कार्यों’ के एक सेट के रूप में वर्णित किया जाएगा। स्वतंत्र मज़दूर विशिष्ट मज़दूरी दरों के लिये कार्यों के एक पोर्टफोलियो का निर्माण करेंगे।
  • कार्यस्थल पर पर्यवेक्षण के पदानुक्रम को वितरित और दूरस्थ टीमों के सहयोग के नेटवर्क द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा। इससे कार्यबल की प्रेरणा और संचार में काफी बदलाव आएगा।
  • उपर्युक्त परिवर्तन नए रोज़गार अनुबंध के प्रकार, न्यूनतम वेतन, सामाजिक लाभ और सामूहिक सौदेबाज़ी पर आकस्मिक नियोक्ता के दायित्वों के साथ काफी कम प्रभाव डालते है।

नीतिगत चुनौतियाँ

  • भारत ‘ऑन-डिमांड’ अर्थव्यवस्था के साथ लचीली नौकरियों, क्षणिक मज़दूरी और वितरित जोखिमों को कैसे नियंत्रित करेगा, यह एक प्रमुख चुनौती है।
  • इसके लिये आने वाले वर्षों में श्रम नीति में तीन प्रमुख क्षेत्रों में ध्यान देने की आवश्यकता है, जिसमें श्रमिकों को पुनः कौशल प्रदान करना और अल्पावधि में सामाजिक नीति पर पुनर्विचार करना, साथ ही लंबे समय तक अर्थव्यवस्था के नए क्षेत्रों की रोज़गार क्षमता की पुन: जाँच करना शामिल है।
  • सबसे पहले, स्वचालन के आधार पर कार्य कर रहे मौजूदा श्रमिकों को फिर से तैयार करना, दूससे श्रमिकों को नए कार्यों में पुन: नियोजित करना और विश्वविद्यालय में छात्रों के संभावित श्रम को फिर से स्थापित करना शामिल है।
  • इसके अलावा, ‘स्मार्ट’ काम और विशिष्ट कौशल की मांग की अवधारणा,  विश्वविद्यालयों को उच्च शिक्षा और प्रशिक्षण तथा राज्य को नौकरी के बाज़ार में संक्रमण की सुविधा के लिये फिर से डिज़ाइन हेतु प्रोत्साहित करेगी।
  • दूसरा, कार्यशील आबादी, सेवानिवृत्ति और व्यक्तिगत जीवन हेतु योजनाओं पर पुनर्विचार करने की तत्काल आवश्यकता है।
  • उल्लेखनीय है कि सामाजिक नीति में आजीविका बीमा और सार्वभौमिक मूल आय जैसे भविष्य में उत्पन्न होने वाली अतिरिक्त आय कर और उसे वितरित करने की क्षमता का अनुमान राज्य लगाते हैं।
  • ILO की विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट 2017-19 से पता चलता है कि भारत में कम-से-कम एक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम द्वारा कवर श्रमिकों का हिस्सा चीन में 63 प्रतिशत के मुकाबले केवल 19 प्रतिशत है।
  • इसके अलावा, ILO द्वारा निर्धारित ‘काम पर अधिकार’ और ‘सभ्य कार्य’ सहित श्रम के अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों को संशोधित और नई अर्थव्यवस्था में विस्तारित किया जाना चाहिये जहाँ श्रमिक ‘ह्यूमन क्लाउड प्लेटफॉर्म’ के माध्यम से कार्य करते हैं।
  •  गौरतलब है कि एक सभ्य कार्य को स्वतंत्रता की शर्तों (मौजूदा सुरक्षित अधिकार), इक्विटी (पर्याप्त पारिश्रमिक) और गरिमा (सामाजिक नीति कवरेज) के तहत उत्पादक कार्य के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • तीसरा, विनिर्माण और उद्योगों के बाहर उन नए क्षेत्रों को तलाशने की तत्काल आवश्यकता है, जिनके पास स्वचालन के आधार पर वर्तमान युग में भुगतान कार्य उत्पन्न करने की क्षमता है।
  • ध्यातव्य है कि वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने वर्ष 2018 में नई राष्ट्रीय औद्योगिक नीति को प्रस्तुत करते हुए इसकी ओर इशारा भी किया था।
  • इसके अतिरिक्त वर्ष 2018 की ILO की रिपोर्ट 'केयर वर्क एंड केयर जॉब्स फॉर द फ्यूचर ऑफ डेस वर्क' के मुताबिक देखभाल कार्य को  अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है जिसमें भारी रोज़गार सृजन की क्षमता है।
  • प्रत्येक दिन, अवैतनिक देखभाल कार्य दो घंटे का काम करने वाले दो अरब लोगों के बराबर श्रमिकों को नियोजित करता है और ILO की रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उद्यमों में बढ़े निवेश के साथ वर्ष  2030 तक इससे 269 मिलियन नौकरियाँ  सृजित होंगी।
  • यह विशेष रूप से महिलाओं को लाभान्वित करेगा, जो वैश्विक स्तर पर वर्तमान में अवैतनिक देखभाल के दो-तिहाई से अधिक कार्य में योगदान देती हैं।

निष्कर्ष

  • AI हमें एक नई रोशनी में प्रौद्योगिकी के साथ-साथ सामाजिक संबंधों के बारे में सोचने के लिये प्रेरित करता है। इन सबके अलावा यह भविष्य की समस्या के प्रति समझ विकसित करने और उसे साझा करने के साथ ही चुनौती के संदर्भ में विशिष्ट प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करता है।
  • किंतु भारतीय नीति निर्माताओं के समक्ष AI से संबंधित महाद्वीपीय, तकनीकी और नैतिक चुनौतियाँ हैं। दरअसल, AI  हमें पारंपरिक, रैखिक और गैर-विघटनकारी सोच से दूर करता है, जिसके हम अभ्यस्त हैं।
  • AI का परिणाम स्मार्ट फैक्टरी के रूप में सामने आएगा जिसमें कई कौशलों का प्रयोग, संसाधनों का बेहतर प्रयोग, दक्षता योग्य डिज़ाइन और व्यापारिक भागीदारों के बीच सीधा संपर्क संभव हो सकेगा। हालाँकि, भारत अपने विकास के लिये बड़े स्तर पर सेवा क्षेत्र पर निर्भर है, लेकिन निर्माण क्षेत्र को भी भारत के तीव्र विकास के लिये भूमिका निभानी होगी।
  • वर्तमान समय में निर्माण कार्यों में अत्याधुनिक तकनीकी का प्रयोग किया जाता है और इसके लिये उच्च स्तर के कौशल की आवश्यकता होती है। अतः AI से भले ही अर्थव्यवस्था का चहुँमुखी विकास होगा किंतु इस विकास से पूर्व इसके परिणामों को भाँपते हुए कुछ सुरक्षात्मक उपाय करने होंगे ताकि विकास का लाभ उसी रूप में प्राप्त हो सके, जैसा कि उम्मीद की जाए। 
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