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अमेरिका की हठधर्मिता

  • 03 Jul 2019
  • 13 min read

इस Editorial में The Hindu, Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है, जो भारत-अमेरिका के मध्य उपजे व्यापार तनाव से संबंधित है, साथ ही इसमें अमेरिकी व्यापारिक नीति के औचित्य का भी अध्ययन किया गया है तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में जापान के ओसाका में 14वाँ G-20 सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भारत-अमेरिका ने अपने मध्य उपजे व्यापार तनावों के संबंध में चर्चा की गयी। लेकिन यह चर्चा किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुँच सकी। यह उम्मीद जताई गई की निकट भविष्य में बातचीत के माध्यम से व्यापार से जुड़े मुद्दों को सुलझाया जाएगा।

भारत-अमेरिका के मध्य आर्थिक संबंध पिछले कुछ समय से तनावपूर्ण बने हुए हैं। संबंधों में तनाव वर्ष 2018 की शुरुआत में तब आया जब अमेरिका ने भारत के निर्यात के विरोध में एकतरफा कार्यवाही आरंभ कर दी तथा भारत ने भी इन प्रतिबंधों और कार्यवाहियों का जवाब देते हुए अमेरिका के 28 उत्पादों पर सीमा शुल्क में वृद्धि कर दी। उपर्युक्त घटनाक्रम के पश्चात् ऐसा माना जा रहा है कि भारत अमेरिका के निशाने पर आ गया है

अमेरिका, भारत के बाज़ार में अपनी पहुँच को और अधिक बढ़ाना चाहता है। इसी संदर्भ में मांग कर रहा है कि भारत व्यापारिक बाधाओं को हटाए जिससे अमेरिका को भी आर्थिक लाभ की प्राप्ति हो। वर्तमान ट्रंप प्रशासन से पूर्व भी अमेरिका इस तरह की मांग करता रहा है किंतु अमेरिका का वर्तमान रुख इस संदर्भ में अधिक कठोर होता दिखाई दे रहा है।

इन मुद्दों की पृष्ठभूमि

अतीत में कुछ ऐसे उदाहरण रहे हैं जिसमें अमेरिका ने भारत की व्यापार नीति तथा अमेरिका से संबंधित आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं। अमेरिका की दो एजेंसियों- USTR (United States Trade Representative) तथा USITC (United States International Trade Commission) ने अतीत में भारत की व्यापार नीतियों की जाँच की। जाँच के निष्कर्ष के आधार पर अमेरिकी प्रशासन भारत से ऐसी नीतियों की मांग कर रहा है जो अमेरिकी उद्योगों के लिये लाभकारी हों। नवीनतम उपर्युक्त मुद्दों का आधार USITC द्वारा भारत की व्यापार, निवेश और औद्योगिक नीतियों पर की गई दो जाँचें (2013 और 2015 में) हैं। इस जाँच का उद्देश्य भारत की औद्योगिक नीतियों को परखना था। अमेरिका का मानना है कि भारत की नीतियाँ अपने घरेलू उद्योगों को लाभ पहुँचाने के लिये अमेरिकी निवेश तथा आयात से भेदभाव करती हैं तथा इन नीतियों का नकारात्मक प्रभाव अमेरिका की अर्थव्यवस्था तथा नौकरियों पर पड़ता है।

विश्व व्यापार संगठन (WTO)

  • विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization-WTO) एक ऐसी संस्था है जो विश्व व्यापार के लिये दिशा-निर्देश जारी करती है तथा नए व्यापार समझौतों में बदलाव और उन्हें लागू कराने के लिये उत्तरदायी है।
  • भारत भी इसका एक सदस्य देश है। कुल 164 देश इसके सदस्य हैं और चीन इसमें वर्ष 2001 में शामिल हुआ था।
  • डब्ल्यूटीओ की सबसे बड़ी संस्था मंत्रिस्तरीय परिषद (Ministerial Conference) है, जो प्रत्येक दो वर्ष में अन्य कार्यों के साथ संस्था के महासचिव और मुख्य प्रबंधकर्त्ता का चुनाव करती है।
  • साथ ही यह सामान्य परिषद (General Council) का काम भी देखती है, जो कि विभिन्न देशों के राजनयिकों से मिलकर बनती है और संस्था के प्रतिदिन के कामों को देखती है। इसमें होने वाले फैसलों को लागू कराने के लिये सभी सदस्य देशों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं।
  • विदित हो कि विश्व के सभी देशों को व्यापार के लिये एक मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1948 में बनाए गए गैट (General Agreement on Tarrifs & Trade-GATT) के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को डब्ल्यूटीओ की स्थापना हुई थी।
  • डब्ल्यूटीओ को बनने में काफी समय लगा और वर्ष 1986 से वर्ष 1994 तक चले उरुग्वे वार्ताओं के लंबे दौर के बाद ही इसकी स्थापना संभव हो पाई। डब्लयूटीओ का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।

भारत के संदर्भ में अमेरिकी नीति का औचित्य तथा WTO

अमेरिका ने स्वामित्व तथा संपदा अधिकार से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाया है। ये मुद्दे USITC की उस रिपोर्ट पर आधारित हैं जो अमेरिका के कानून तथा अमेरिका के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। USITC वर्ष 2014 से भारत की नीतियों में बदलाव के लिये अपनी रिपोर्ट के माध्यम से दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में अमेरिका भारतीय व्यापार और निर्यात पर कार्यवाही कर रहा है। भारत द्वारा अमेरिकी नीति पर उचित प्रतिक्रिया देने के लिये इन मुद्दों को समझना भी आवश्यक है क्योंकि इनमें से कुछ मुद्दे सीधे विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर कवर होते हैं। अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियाँ अपने हितों को पूरा करने लिये एकतरफा प्रयासों पर बल देती हैं। जबकि भारत को इस प्रकार के मुद्दे बहुपक्षीय मंचों पर सुलझाने चाहिये ताकि नियम आधारित व्यापारिक व्यवस्था के अंतर्गत समाधान हो सके। WTO ऐसा ही एक संगठन है जिसका गठन GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) के स्थान पर वर्ष 1995 में हुआ। WTO विभिन्न राष्ट्रों के मध्य व्यापार से जुड़े मुद्दों को बहुपक्षीय मंच पर सुलझाने पर बल देता है। WTO एक बहुपक्षीय मंच है तथा विभिन्न राष्ट्रों के द्वारा स्वीकार किये गए नियमों पर आधारित है। वैश्विक समुदाय WTO को विवाद सुलझाने के लिये एक उचित मंच समझता है (किंतु अमेरिका के विचार इस संबंध में नकारात्मक हैं)। वैश्विक समुदाय का मानना है कि इस तरीके से विभिन्न राष्ट्र व्यापार युद्ध को रोक सकते हैं तथा विश्व अर्थव्यवस्था को वर्ष 1930 जैसी आर्थिक मंदी में जाने से रोक सकते हैं। लेकिन अमेरिका की ये नीतियाँ अपने व्यापारिक सहयोगियों को व्यापार युद्ध में धकेलती हुई दिखाई देती हैं।

व्यापार युद्ध (Trade War)

जब एक देश दूसरे देश के प्रति संरक्षणवादी रवैया अपनाता है यानी वहाँ से आयात होने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क बढ़ाता है तो दूसरा देश भी जवाबी कार्रवाई करता है। ऐसी संरक्षणवादी नीतियों के प्रभाव को व्यापार युद्ध (Trade War) कहते हैं। इसकी शुरुआत तब होती है, जब किसी देश को दूसरे देश की व्यापारिक नीतियाँ अपने हितों के विपरीत प्रतीत होती हैं या वह देश रोज़गार सृजन हेतु घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये आयातित वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाता है। जब दो देशों के बीच व्यापार युद्ध छिड़ता है तो उसका असर अन्य देशों पर भी पड़ता है।

भारत की WTO संगत नीति

ज्ञात हो कि अमेरिकी एजेंसियाँ व्यापार से संबंधित उन मुद्दों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करती हैं जो WTO समझौते के अंतर्गत कवर होते हैं। WTO के निर्माण के समय से ही भारत की अधिकांश नीतियाँ WTO के समझौतों के अनुसार रहीं है और जहाँ कहीं भी असंगतता का प्रश्न होता है उस स्थिति में अमेरिका समेत अन्य WTO सदस्य विवाद निवारण तंत्र के माध्यम से भारत के विरुद्ध अपील करते रहे हैं। इसके परिणामस्वरुप भारत अपने प्रावधानों में बदलाव करने को भी बाध्य हुआ है।

लेकिन तथ्य यह है कि अमेरिका भारत की व्यापार एवं निवेश नीति को चुनौती देने के लिये WTO की उपेक्षा करता है। चूँकि भारत की नीतियाँ WTO के अनुरूप होती है इसलिये यह मंच अमेरिका के लिये लाभकारी नहीं होता। उदाहरण के लिये भारत के उच्च सीमा शुल्क (जिन पर ट्रंप प्रशासन को कड़ी आपत्ति है) पर भी उरुग्वे राउंड की वार्ता (Uruguay Round Negotiations) में सहमति व्यक्त की जा चुकी है। साथ ही भारत ने इस अवधि में विभिन्न कृषिगत तथा औद्योगिक उत्पादों पर अपने सीमा शुल्कों में कटौती की है।

अमेरिकी नीति में विरोधाभास

भारत की उपर्युक्त स्थिति से अलग अमेरिका कृषि क्षेत्र में अपनी अत्यधिक उच्च कृषि सब्सिडी का बचाव करता रहा है। इस सब्सिडी के माध्यम से अमेरिका के घरेलू कृषि उत्पादों का मूल्य कम हो जाता है जिससे विश्व के अन्य देश अमेरिकी बाज़ार के संबंध में निष्प्रभावी हो जाते हैं। अत्यधिक उच्च सब्सिडी तथा घरेलू उत्पादों की कम कीमतों के कारण कृषि उत्पादों को संरक्षण देने के लिये अमेरिका को शुल्कों में वृद्धि करने की आवश्यकता नहीं होती है। साथ ही WTO के अनुसार, अमेरिका तंबाकू (350%), मूंगफली (164%) तथा कुछ डेरी उत्पादों (118%) पर भी अत्यधिक उच्च शुल्क लगाता है।

निष्कर्ष

भारत-अमेरिका के मध्य यह व्यापारिक तनाव अमेरिकी उद्योगों की उपज है। यह उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को मज़बूत कर और अधिक लाभ कमाना चाहता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अमेरिका वैधानिक माध्यमों की उपेक्षा कर रहा है। साथ ही भारत की नीतियों को प्रभावित करने के लिये कानून के शासन की अवहेलना भी कर रहा है।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है, अतः भारत सक्रिय वार्ता के माध्यम से अपने विवादों को सुलझाने का प्रयास कर सकता है। भारत कुछ मामलों में WTO के विवाद निवारण तंत्र की भी सहायता ले सकता है। साथ ही भारत वैश्विक समुदाय के साथ जुड़कर अमेरिका को नियम आधारित व्यापारिक प्रणाली के अंतर्गत लाने का प्रयास भी कर सकता है।

प्रश्न: निकट अतीत में भारत-अमेरिका के मध्य व्यापारिक तनाव में वृद्धि हुई है। आपके विचार में इसके लिये कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं, साथ ही यह भी बताइये कि इस व्यापारिक तनाव को कम करने में WTO की क्या भूमिका हो सकती है?

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