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महिला आरक्षण विधेयक

  • 17 Jul 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

स्थायी समिति, राज्यसभा, लोकसभा

मेन्स के लिये:

संसद और विधानसभाओं में महिला अरक्षण की अवश्यकता एवं मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में एक राजनीतिक दल ने दीर्घ अवधि से लंबित महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill to Parliament) को  मानसून सत्र से पहले संसद में लाने की मांग की है। 

  • इस विधेयक को मई 2008 में राज्यसभा में पेश किया गया था और एक स्थायी समिति (Standing Committee) के पास भेजा गया था। इसे वर्ष 2010 में सदन में पारित किया गया तथा अंत में लोकसभा को प्रेषित किया गया। हालाँकि यह बिल 15वीं लोकसभा के साथ लैप्स हो गया।

प्रमुख बिंदु 

पृष्ठभूमि:

  • इस बिल का मूल विचार एक संवैधानिक संशोधन से उत्पन्न हुआ था जिसे वर्ष 1993 में पारित किया गया था।
  • इस संविधान संशोधन द्वारा प्रावधान किया गया कि ग्राम पंचायत के सरपंचों की एक- तिहाई संख्या महिलाओं के लिये आरक्षित होनी चाहिये।
  • इस प्रकार के महिला आरक्षण को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं तक विस्तारित करने के लिये महिला आरक्षण विधेयक को दीर्घकालिक योजना के रूप में देखा गया था।

महिला आरक्षण विधेयक के विषय में:

  • यह विधयक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% सीटें आरक्षित करता है।
  • आरक्षित सीटों को राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रीय आधार पर आवंटित किया जा सकता है।
  • इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 वर्ष बाद महिलाओं के लिये सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।

आवश्यकता:

  • ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार, राजनीतिक सशक्तीकरण सूचकांक में भारत के प्रदर्शन में गिरावट आई है और साथ ही महिला मंत्रियों की संख्या वर्ष 2019 के 23.1% से घटकर वर्ष 2021 में 9.1% तक पहुँच गई है।
  • सरकार के आर्थिक सर्वेक्षणों में भी यह माना जाता है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बहुत कम है।
  • विभिन्न सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि पंचायती राज संस्थानों में महिला प्रतिनिधियों ने गाँवों में समाज के विकास और समग्र कल्याण में सराहनीय कार्य किया है तथा उनमें से कई निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर काम करना चाहेंगी, हालाँकि उन्हें भारत में प्रचलित राजनीतिक संरचना में विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 
    • इन चुनौतियों में उचित राजनीतिक शिक्षा की कमी, समाज में महिलाओं की कम वित्तीय शक्ति, यौन हिंसा, असुरक्षित पितृसत्ता की अभिव्यक्ति, पुरुषों और महिलाओं के बीच घरेलू कार्य का असमान वितरण आदि शामिल हैं।
    • कई ग्रामीण इलाकों में ‘पंचायत पति’ की अवधारणा यानी पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को प्रॉक्सी के रूप में प्रयोग करना भी काफी प्रचलित है।

महत्त्व

  • महिला राजनीतिक सशक्तीकरण तीन मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है:
    • महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता।
    • महिलाओं को उनकी क्षमता के पूर्ण विकास का अधिकार।
    • महिलाओं के आत्म प्रतिनिधित्व और आत्मनिर्णय का अधिकार।
  • राजनीतिक निर्णयन प्रकिया में लैंगिककता संबंधी एक महत्त्वपूर्ण अंतर विद्यमान है, ऐसे में किशोर लड़कियों को राष्ट्र निर्माण में योगदान करने के लिये प्रेरित करने हेतु महिला नेताओं को आगे आने की आवश्यकता है।

    मुद्दे:

    • तर्क दिया गया है कि यह महिलाओं की असमान स्थिति को कायम रखेगा क्योंकि उन्हें योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्द्धी नहीं माना जाएगा।
    • यह भी तर्क दिया जाता है कि यह नीति चुनावी सुधार के बड़े मुद्दों जैसे- राजनीति के अपराधीकरण और आंतरिक पार्टी लोकतंत्र से ध्यान भटकाती है।
    • यह महिला उम्मीदवारों के लिये मतदाताओं की पसंद को प्रतिबंधित करता है।
    • प्रत्येक चुनाव में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन से एक सांसद का अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिये काम करने हेतु प्रोत्साहन कम हो सकता है क्योंकि वह उस निर्वाचन क्षेत्र से फिर से चुनाव लड़ने के लिये अपात्र हो सकता है।
      • कुछ विशेषज्ञों ने वैकल्पिक तरीकों को अपनाने/बढ़ावा देने का सुझाव दिया है, जैसे- राजनीतिक दलों और दोहरे सदस्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षण।

    आगे की राह:

    • पंचायती राज संस्थाओं ने महिला प्रतिनिधियों को ज़मीनी स्तर पर व्यवस्था में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई राज्यों ने चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिये 50% आरक्षण दिया है।
    • पार्टी स्तर पर मौलिक सुधार महिला आरक्षण विधेयक के लिये एक आवश्यक और रणनीतिक पूरक के रूप में काम करेंगे। भले ही महिला आरक्षण विधेयक भी पटरी से उतर गया हो, लेकिन राजनीति में महिलाओं के प्रवेश हेतु राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढाँचे को और अधिक अनुकूल बनाने से नहीं रोकना चाहिये।
    • यहाँ ‘कोटा’ शब्द के भारतीय दृष्टिकोण को पश्चिम के दृष्टिकोण से रेखांकित करना और अलग करना महत्त्वपूर्ण है। पश्चिम के विपरीत जहाँ कोटा लगभग एक बुरा शब्द है, भारतीय प्रतिमान में ऐसे कोटा को सामाजिक लाभ के लिये अमूल्य उपकरण के रूप में देखा गया है।
      • यह सदियों से जारी उत्पीड़न को रोकने के लिये एक उपकरण है।
    • यहाँ तक ​​कि जब महिलाएँ राजनीति में पुरुषों के समान पदों पर होती हैं, तो उन्हें उल्लिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। भारत की जनता के बीच संस्थागत, सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। लैंगिक समानता सतत् विकास लक्ष्यों का भी एक हिस्सा है।

    स्रोत- द हिंदू

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