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भारतीय अर्थव्यवस्था

सेबी के नए मानदंड और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश

  • 10 Sep 2018
  • 8 min read

संदर्भ

हाल ही में एसेट मैनेजर्स राउंडटेबल ऑफ इंडिया (विदेशी धन से संबंधित एक संघ) ने चेतावनी जारी की थी कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा जारी एक परिपत्र के कारण भारतीय इक्विटी बाज़ारों से संभवतः 75 बिलियन डॉलर का प्रवाह देश से बाहर की ओर हो सकता है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश किसी देश में धनराशि की प्रविष्टि का वह तरीका है जिसमें किसी भी देश का नागरिक किसी अन्य देश के बैंक में धन जमा करता है या दूसरे देशों  के स्टॉक और बॉण्ड बाज़ारों में खरीदारी करता है।

सेबी द्वारा जारी परिपत्र

  • सेबी ने 10 अप्रैल, 2018 को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिये KYC(Know Your Client) मानदंडों में वृद्धि से संबंधित एक परिपत्र जारी किया था और द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी FPIs से उनके लाभार्थी मालिकों (Benificial Owners- BO) की एक सूची प्रदान करने करने को कहा था।
  • इस परिपत्र के अनुसार, निवासी भारतीय, अनिवासी भारतीय, भारतीय मूल के व्यक्ति और भारत के विदेशी नागरिक भारत में निवेश किये जाने वाले फंड के लिये लाभार्थी मालिक नहीं हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि नामिती (nominee) को भी FPI का लाभार्थी मालिक नहीं माना गया है।
  • लाभार्थी मालिक (BO) वह है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वामित्व का लाभ प्राप्त करता है।
  • कंपनी या ट्रस्ट की संरचना वाले FPIs के BOs को स्वामित्व हित (जिसे स्वामित्व या अधिकार के रूप में भी जाना जाता है) और नियंत्रण के आधार पर पहचाना जाना चाहिये। साझेदारी फर्म और व्यक्तियों के असंगठित संगठनों के मामले में BOs को स्वामित्व या अधिकार के आधार पर पहचाना जाना चाहिये।
  • स्वामित्व हित और नियंत्रण के मामले में FPI के BO की पहचान के लिये भौतिकता की सीमा कंपनी के मामले में 25% और साझेदारी फर्म, ट्रस्ट तथा व्यक्तियों के असंगठित संघ के मामले में 15% होगी।
  • ‘उच्च जोखिम क्षेत्राधिकार’ ((high risk jurisdictions) से आने वाले FPI के संदर्भ में मध्यस्थ BO की पहचान करने की लिये 10% की न्यूनतम भौतिकता सीमा लागू की जा सकती है और श्रेणी-III FPI के लिये लागू KYC दस्तावेज़ भी सुनिश्चित किये जा सकते हैं।
  • यदि कोई भी इकाई इन सीमाओं को पूरा नहीं करती है, तो FPI का वरिष्ठ प्रबंध अधिकारी नामित BO होगा।
  • वकीलों/लेखाकारों जैसे सेवा प्रदाताओं के प्रतिनिधित्व वाली कंपनियों/ट्रस्टों के मामले में FPI को उन कंपनियों/ट्रस्ट के असली मालिक/प्रभावी नियंत्रकों के बारे में जानकारी प्रदान करनी चाहिये।
  • NRIs और OCIs केवल इसी शर्त पर FPI लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं कि वे अपनी भूमिका को केवल निवेश सलाहकारों तक सीमित रखें और अपने पैसे का निवेश नहीं कर सकते हैं।
  • नियामक ने श्रेणी II और III के FPIs से BO के नाम और पते का खुलासा करने के लिये कहा था।
  • श्रेणी II के FPI में बड़े पैमाने पर विनियमित संस्थान, व्यक्तिय, व्यापक-आधारित फंड और विश्वविद्यालय, पेंशन तथा एंडॉवमेंट फंड शामिल हैं।

परिपत्र जारी करने के पीछे सेबी का उद्देश्य

  • हालाँकि नियामक द्वारा इस परिपत्र को जारी करने के पीछे स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है लेकिन यह माना जा सकता है कि मनी-लॉंडरिंग और राउंड ट्रिपिंग (ब्लैक मनी जो विदेशों में जाकर फिर से व्हाइट मनी में तब्दील हो जाती है और वापस उसी देश में निवेश के रूप में लौट आती है) पर चिंताओं ने इस निर्देश को प्रेरित किया होगा।

FPIs क्यों महत्वपूर्ण है?

  • FPI इस लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वे भारतीय शेयर बाज़ारों के लिये प्रमुख निवेशक रहे हैं।

क्यों खुश नहीं हैं विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक?

  • वर्तमान में FPIs को एक सूचीबद्ध भारतीय कंपनी में 10% तक निवेश करने की अनुमति है। सेबी ने अब कहा है कि यदि उनके पास एक ही BO है तो उनकी निवेश सीमा को और अधिक बढाया जाएगा।
  • दूसरा, अभी तक ऑफशोर फंड के BO को निर्धारित करने के लिये आर्थिक स्वामित्व बुनियादी मानदंड रहा है। इसका मतलब है कि एक फंड में अधिकाँश हिस्सेदारी रखने वाली इकाई को BO माना जाता है। लेकिन नए परिपत्र में नियामक ने FPIs से शेयरहोल्डिंग और नियंत्रण दोनों के आधार पर स्वामित्व निर्धारित करने के लिये कहा है।
  • इस संदर्भ में नियंत्रण का मतलब अन्य प्रशासनिक अधिकारों के साथ निदेशकों को नियुक्त करने और हटाने का अधिकार है।
  • सेबी ने कहा है कि उच्च जोखिम वाले राष्ट्र अधिक कठोर KYC मानदंडों के अंतर्गत आएंगे।

सेबी द्वारा गठित समिति

  • FPIs को राहत देते हुए हाल ही में सेबी द्वारा रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर एच आर खान की अध्यक्षता वाली समिति ने पहले परिपत्र के संबंध में कुछ सुझाव दिए हैं।

समिति के सुझाव

सेबी द्वारा नियुक्त समिति ने महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये हैं:

  • अनिवासी भारतीयों, विदेशों में भारतीय निवासी और निवासी भारतीयों को विदेशी फंडों का प्रबंधन करने की अनुमति दी जानी चाहिये जो कुछ शेयर धारण की सीमाओं के अंतर्गत भारत में निवेश करते हैं।
  • FPI के प्रबंधन के तहत एक एकल NRI, OCI या RI संपत्तियों का 25% से अधिक धारण नहीं कर सकते और विदेशी संस्थाओं के निवेश में ऐसी इकाइयों की कुल शेयर धारण क्षमता 50% से कम होनी चाहिये।
  • FPI के वरिष्ठ प्रबंधकों और सूचीबद्ध संस्थाओं के लाभकारी मालिकों की पहचान के संबंध में परिवर्तनों का सुझाव दिया गया है।
  • सेबी को धन-शोधन रोधी कानून (PMLA) के तहत निर्धारित लाभार्थी मालिक की परिभाषा का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है।
  • उच्च जोखिम वाले अधिकार क्षेत्र को परिभाषित करने के लिये एक और उद्देश्य पूर्ण मानदंड विकसित करने हेतु केंद्र से परामर्श करने का भी सुझाव दिया गया है।
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