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मुद्रा लोन और ऋण जोखिम

  • 24 Sep 2018
  • 6 min read

संदर्भ

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन द्वारा संसद में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा गया था कि कॉर्पोरेट ऋण के कारण उत्पन्न होने वाली गैर-निष्पादित संपत्तियाँ (Non-Performing Assets- NPA) मौजूदा समय में एक समस्या है और सरकार को इन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिये।

रघुराम राजन द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार :

  • मुद्रा (MUDRA) लोन, ऋण जोखिम के संभावित कारणों में से एक है। इसके अलावा सरकार द्वारा महत्त्वाकांक्षी क्रेडिट लक्ष्यों को प्राप्त करने और ऋणों में दी जाने वाली छूट की संस्कृति भी ऋण जोखिम का कारण बनती है।
  • कभी-कभी क्रेडिट लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये उचित प्रक्रियाओं को छोड़ दिया जाता है जो भविष्य में NPA जैसी स्थिति का कारण बनता है।
  • MUDRA लोन और किसान क्रेडिट कार्ड दोनों ही लोकप्रिय ऋण हैं लेकिन सरकार को इनके कारण उत्पन्न होने वाले संभावित जोखिम के बारे में अधिक बारीकी से जाँच करने की आवश्यकता है।
  • MSME के लिये सिडबी द्वारा संचालित क्रेडिट गारंटी योजना एक बढ़ती आकस्मिक देयता है और इसकी भी तत्काल जाँच किये जाने की आवश्यकता है।

मुद्रा (MUDRA) क्या है?

  • ‘मुद्रा’ अर्थात् माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी (Micro Units Development & Refinance Agency-MUDRA) की शुरुआत प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के अंतर्गत 8 अप्रैल, 2015 को की गई थी।
  • इसका उद्देश्य माइक्रो फाइनेंस को आर्थिक विकास के एक उपकरण के रूप में उपयोग करना है जो पिरामिड के निचले हिस्से में लोगों, छोटे विनिर्माण इकाइयों, दुकानदारों, फल और सब्जी विक्रेताओं, ट्रक और टैक्सी ऑपरेटरों को लक्षित करने, खाद्य सेवा इकाइयों, मरम्मत की दुकानों, मशीन ऑपरेटरों, कारीगरों और खाद्य उत्पादकों को आय सृजित करने का अवसर प्रदान करने में मदद करता है।

क्या पुनर्भुगतान एक चुनौती है?

  • योजना के आलोचकों का कहना है कि ऋण को प्राधिकृत करने और वितरित करते समय बहुत सी सर्वोत्तम प्रथाओं की उपेक्षा की गई है।
  • इस साल की शुरुआत में ही सीबीआई ने 65 लाख रुपए मूल्य के 26 मुद्रा ऋणों मंज़ूर करने और वितरित करने में आधिकारिक स्थिति के कथित दुरुपयोग के लिये पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
  • भले ही व्यवसायियों विकास के नाम पर ऋण की मांग की जाती है और बैंकरों द्वारा यह जानते हुए भी कि उन लोगों द्वारा किया जाने वाला पुनर्भुगतान एक चुनौती है, आर्थिक विकास के नाम पर उनके ऋण को मंज़ूरी दे दी जाती है। इस प्रकार पुनर्भुगतान की समस्या बनी रहती है।
  • यह योजना उन लोगों के लिये है, जिन्हें कम धनराशि के ऋण की आवश्यकता है, लेकिन ऐसे फंडों तक वे नहीं पहुँच पाते है, क्योंकि समस्या यह होती है कि ऐसे उधारकर्त्ताओं के कारोबार की प्रकृति अस्थिर होती है और उनके व्यापार का वार्षिक चक्र अतिसंवेदनशील होता है जैसे- सब्जी विक्रेता। अतः उन्हें दिये गए ऋण की वसूली कर पाना आसान नहीं होता।
  • जब संग्रह की बात आती है तो बैंक कर्मचारी 10 लाख रुपए के ऋण की वसूली के लिये एक लाख रुपए वाले 10 ऋण के स्थान पर 10 लाख रुपए का एक बकाया वसूलने का विकल्प चुनते हैं।

ऋण का औसत आकार

  • मुद्रा योजना के तहत ऋण को तीन स्तरों पर वितरित किया जाता है जिसकी सीमा 50,000 रुपए से शुरू होकर 10 लाख रुपए तक होती है।
  • वित्तीय वर्ष 2017-18 में सभी तीन स्तरों के तहत लगभग 4.81 करोड़ PMMY ऋणों के लिये 2.53 लाख करोड़ रुपए का ऋण मंज़ूर किया गया था।
  • वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिये स्वीकृत ऋण की औसत राशि 52,706 रुपए थी।
  • स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार, उसने वित्त वर्ष 2017-18 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत 28,556 करोड़ रुपए का ऋण दिया।
  • इस योजना से उत्पन्न गैर-निष्पादित संपत्ति भारत के सबसे बड़े बैंक के लिये लगभग 5.2% है।
  • PMMY को समर्पित वेबसाइट से संबंधित ऋणों की मात्रा या संग्रह के ब्योरे का कोई संकेत नहीं मिलता है।
  • सरकार के अनुसार, 2015 में अपनी स्थापना के बाद से मुद्रा योजना के तहत लगभग 12 करोड़ लाभार्थियों को कुल 6 लाख करोड़ रुपए का ऋण उपलब्ध कराया गया था।
  • इनमें से 3.25 करोड़ उद्यमी ऐसे थे जिन्होंने पहली बार कोई उद्यम शुरू किया हो और 9 करोड़ उधारकर्त्ता महिलाएँ थीं।
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