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कृषि

यूरिया गोल्ड

  • 17 Aug 2023
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

यूरिया गोल्ड, नीम लेपित यूरिया, तरल नैनो यूरिया, फलीदार फसलें, नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटैशियम (NPK), नाइट्रोजन उपयोग दक्षता

मेन्स के लिये:

यूरिया गोल्ड की विशेषताएँ, भारत में यूरिया की खपत की स्थिति

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आधिकारिक तौर पर 'यूरिया गोल्ड' उर्वरक' लॉन्च किया गया। इसे सार्वजनिक क्षेत्र में भारत की अग्रणी उर्वरक और रसायन विनिर्माण कंपनी राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइज़र्स लिमिटेड (RCF) द्वारा विकसित किया गया है।

यूरिया गोल्ड:

  • परिचय: यूरिया गोल्ड का निर्माण यूरिया को सल्फर के साथ मिलाकर 37% नाइट्रोजन (N) और 17% सल्फर (S) के साथ एक मिश्रित उर्वरक बनाकर किया जाता है। 
    • यह पोषक तत्त्व मिश्रण दो प्राथमिक उद्देश्यों को पूरा करता है: भारतीय मृदा में सल्फर की आवश्यकताओं को पूरा करना और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) में वृद्धि करना।

नोट: सामान्य यूरिया में एकल पौधे के पोषक तत्त्व का 46% नाइट्रोजन होता है।

  • विशेषताएँ: 
    • मृदा की कमियों को संबोधित करना: भारत की मृदा में प्राय: सल्फर की कमी होती है, जो एक आवश्यक तत्त्व है, यह विशेष रूप से तिलहन और दालों के लिये महत्त्वपूर्ण है।
      • उर्वरक संरचना में सल्फर को शामिल करके 'यूरिया गोल्ड' का लक्ष्य एक व्यापक पोषक तत्त्व की आपूर्ति प्रदान करना है, ताकि सल्फर पर निर्भर फसलों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
    • नाइट्रोजन दक्षता बढ़ाना: 'यूरिया गोल्ड' का एक प्रमुख नवाचार इसकी नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) में सुधार करने की क्षमता है।
      • यूरिया पर सल्फर कोटिंग, नाइट्रोजन को धीरे-धीरे जारी करने में सक्षम बनाती है, जिससे लंबे समय तक पोषक तत्त्व उपलब्ध रहते हैं।
      • परिणामस्वरूप पौधे अपना हरा रंग अधिक समय तक बनाए रखते हैं। इस घटना के कारण किसान अपने उपयोग की आवृत्ति को कम कर सकते हैं।
        • जब किसान देखते हैं कि पत्तियाँ पीली पड़ रही हैं तो वे प्राय: यूरिया का छिड़काव करते हैं।
    • संभावित उपज में वृद्धि: 'यूरिया गोल्ड' में बेहतर पोषक तत्त्वों के उपयोग के माध्यम से फसल की पैदावार बढ़ाने की क्षमता है।
      • पोषक तत्त्वों के क्रमिक तौर पर निर्मुक्त होने से बर्बादी को कम करने और पौधों में पोषक तत्त्वों के अवशोषण को बढ़ाने में मदद मिलती है, जो अंततः उत्पादकता में वृद्धि करता है।

भारत में यूरिया की खपत की स्थिति:

  • यूरिया का परिचय: 
    • यूरिया एक सफेद क्रिस्टलीय यौगिक है जिसका उपयोग आमतौर पर कृषि में सिंथेटिक उर्वरक के रूप में किया जाता है।
    • जब मिट्टी या फसलों पर इसका छिड़काव किया जाता है, तो यूरिया एंजाइमों द्वारा अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड में विघटित हो जाता है।
      • फिर अमोनिया अमोनियम आयनों में परिवर्तित हो जाता है, जिसे पौधों की जड़ों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है जो पौधों की वृद्धि तथा विकास के लिये उपयोगी है।
  • भारत में उपभोग की स्थिति:
    • यूरिया भारत में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने वाला उर्वरक है, जिसकी खपत/बिक्री वर्ष 2009-10 और 2022-23 के बीच 26.7 मिलियन टन (mt) से बढ़कर 35.7 मिलियन टन (mt) हो गई है।
  • यूरिया गोल्ड के समान उपाय:
    • नीम कोटेड यूरिया: यह यूरिया का एक संशोधित रूप है जिसे नीम के तेल से लेपित किया जाता है।
      • यह नाइट्रोजन के निक्षालन (Leaching) और वाष्पीकरण हानि को कम करता है, इसमें कीटनाशक और नेमाटीसाइडल (Nematicidal) गुण होते हैं तथा मिट्टी की बनावट और जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
    • तरल नैनो यूरिया: यह एक नैनो-प्रौद्योगिकी-आधारित उर्वरक है जिसे पत्तियों पर छिड़का जाता है तथा पौधों की कोशिकाओं द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है।
      • यह फसल की पोषण गुणवत्ता तथा उत्पादकता को बढ़ाता है, उर्वरक की खपत को कम करता है, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में सुधार करता है और इनपुट लागत को कम करता है।
  • चुनौतियाँ: 
    • यूरिया आयात और फीडस्टॉक निर्भरता: वर्ष 2022-23 में कुल 35.7 मिलियन टन यूरिया की बिक्री हुई, जिसमें से 7.6 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया का आयात किया गया था, आयात पर इस प्रकार की निर्भरता चिंता का विषय है।
      • यहाँ तक कि घरेलू स्तर पर यूरिया उत्पादन भी आयातित प्राकृतिक गैस (उत्पादन के लिये आवश्यक फीडस्टॉक) पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
    • नाइट्रोजन उपयोग दक्षता और हानिवायुमंडल में अमोनिया गैस के निष्काषित हो जाने और रूपांतरण के बाद नाइट्रेट का भूमिगत रूप से रिसाव जैसे अन्य विभिन्न कारकों के कारण लगभग 65% नाइट्रोजन नष्ट हो जाता है।
      • नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में गिरावट के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें किसानों को अच्छी फसल उपज प्राप्त करने के लिये अधिक उर्वरक का इस्तेमाल करना पड़ता है।
    • सब्सिडी का बोझ: किसानों के लिये सस्ती कीमतें सुनिश्चित करने के लिये भारत सरकार द्वारा यूरिया पर भारी सब्सिडी दी जाती है।
      • हालाँकि इस सब्सिडी के कारण यूरिया की खपत में काफी वृद्धि, अति उपयोग और अक्षमता के मुद्दे सामने आए हैं।
    • कम लागत होने के कारण किसान अक्सर आवश्यकता से अधिक यूरिया का उपयोग करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पोषक तत्त्वों के असंतुलन और पर्यावरणीय निम्नता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

आगे की राह

  • परिशुद्ध कृषि: वेरिएबल रेट एप्लीकेशन जैसे परिशुद्ध कृषि तकनीकों को लागू करने से विशिष्ट फसल और मृदा की ज़रूरत के आधार पर उर्वरक प्रयोग दर में बदलाव करके यूरिया के उपयोग को अनुकूलित करने में मदद मिल सकती है।
    • यह अति प्रयोग को रोकने और पोषक तत्त्वों की बर्बादी को कम करता है।
  • पोषक तत्त्व प्रबंधन योजना: फसलों की नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटैशियम (NPK) की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए किसानों को व्यापक पोषक तत्त्व प्रबंधन योजनाओं को अपनाने के लिये प्रोत्साहित करने से संतुलित उर्वरक अनुप्रयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।
    • इससे यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है और यह इष्टतम संतुलन (N:P:K= 4:2:1) के साथ अन्य पोषक तत्त्वों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देता है।
  • फसल चक्र और विविधीकरण: विविध फसल पैटर्न और फसल चक्र को बढ़ावा देने से यूरिया की अत्यधिक मांग को कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण के लिये फलीदार फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर सकती हैं, जिससे नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
  • सब्सिडी में सुधार: संतुलित उर्वरक प्रथाओं के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिये उर्वरक सब्सिडी प्रणाली को धीरे-धीरे तर्कसंगत बनाने तथा इसमें सुधार करने की आवश्यकता है।
    • इसमें वैकल्पिक पोषक स्रोतों के लिये सब्सिडी प्रदान करना, किसानों को यूरिया की खपत कम करने के लिये प्रोत्साहित करना शामिल हो सकता है।
  • फोर्टिफिकेशन: यूरिया, DAP और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के साथ उपयोगी उर्वरकों का फोर्टिफिकेशन, फसल की पैदावार बढ़ाने तथा आयातित पोषक तत्त्वों की उपयोग दक्षता को अधिकतम करने का तरीका है।
    • चूँकि भारत में प्राकृतिक गैस, रॉक फॉस्फेट, पोटाश तथा सल्फर के भंडार सीमित हैं, इसलिये इन उर्वरकों को द्वितीयक पोषक तत्त्वों (कैल्शियम तथा मैग्नीशियम) और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों (ज़स्ता, बोरान, मैंगनीज, मोलिब्डेनम, लोहा, ताँबा एवं निकल) के साथ लेपित किया जाना चाहिये।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   

प्रश्न. भारत में रासायनिक उर्वरकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. वर्तमान में रासायनिक उर्वरकों का खुदरा मूल्य बाज़ार-संचालित है और यह सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं है।
  2.  अमोनिया जो यूरिया बनाने में काम आता है, वह प्राकृतिक गैस से उत्पन्न होता है।
  3.  सल्फर, जो फॉस्फोरिक अम्ल उर्वरक के लिये कच्चा माल है, वह तेल शोधन कारखानों का उपोत्पाद है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 2
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


प्रश्न. भारत सरकार कृषि में 'नीम-आलेपित यूरिया (Neem-coated Urea) के उपयोग को क्यो प्रोत्साहित करती है? (2016)

(a) मृदा में नीम तेल के निर्मुक्त होने से मृदा सूक्ष्मजीवों द्वारा नाइट्रोजन यौगिकीकरण बढ़ता है
(b) नीम लेप, मृदा में यूरिया के घुलने की दर को धीमा कर देता है
(c) नाइट्रस ऑक्साइड, जो कि एक ग्रीनहाउस गैस है, फसल वाले खेतों से वायुमंडल में बिलकुल भी विमुक्त नहीं होती है
(d) विशेष फसलों के लिये एक अपतृणनाशी (वीडिसाइड) और एक उर्वरक का संयोजन है।

उत्तर: (b)

स्रोत: पी.आई.बी.

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