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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

व्यापार घाटे का यथार्थ

  • 25 Aug 2017
  • 3 min read

संदर्भ 

भारत और चीन के बीच बढ़ते राजनीतिक तनावों के कारण दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों पर भी दबाव बढ़ा है। वर्तमान में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 अरब डॉलर से अधिक है। कई भारतीय इसे ऐसी आर्थिक बुराई बता रहे हैं जिसे हर हाल में रोका जानाचाहिये । वे चीन से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर भारी शुल्क और प्रतिबंध लगाने की भी माँग कर रहे हैं।  

भय बेबुनियाद

  • व्यापार घाटा भारत की अर्थव्यस्था के लिये हानि और चीन के लिये फायदेमंद है अतः इसे कम करने का तर्क उचित है। 
  • हालाँकि, चीन अथवा किसी अन्य देश के साथ व्यापार घाटे को लेकर इतना परेशान  होने की आवश्यकता नहीं है। हमें इसमें अंतर्निहित वास्तविकता को समझना चाहिये।  

व्यापार संतुलन

  • हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने चीनी समकक्ष से भेंट कर चीन के बाज़ारों में भारतीय वस्तुओं के अधिक-से-अधिक पहुँच को सुलभ करने की माँग की थी।  
  • हालाँकि, व्यापार घाटे को लेकर इस तरह का भय बेबुनियाद है, क्योंकि आम धारणा के विपरीत, व्यापार घाटा या अधिशेष का संबंध किसी देश के व्यापार लाभ या घाटे से नहीं होता है। 
  • वास्तव में, देशों के बीच व्यापार स्वेच्छा से होता है। लोग अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये व्यापार करते हैं। अतः इससे दोनों पक्षों का लाभ अंतर्निहित रहता है। 
  • व्यापार संतुलन दर्शाता है कि कैसे कोई अर्थव्यवस्था किसी विदेशी मुद्रा की आय करती  है और बाद में इसे कैसे व्यय करेगी।  
  • भारत के व्यापार घाटे का उदाहरण लेते हैं। भारत में चीन के निवेशक परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं, जिससे हमें चीनी मुद्रा (युआन) प्राप्त होती है। इस तरह युआन से भारत के व्यापारी चीन की परिसंपत्तियों में निवेश करने के बजाय चीन की वस्तुएँ खरीदना पसंद करते हैं।  
  • अतः चीनी परिसंपत्तियों की बजाय चीन की वस्तुओं में निवेश को वरीयता दिए जाने के कारण भारत को व्यापार घाटा होता है। यदि यही मामला इसके विपरीत हो, तो भारत को व्यापारिक लाभ होगा और वहीं चीन को घाटा होने लगेगा।  
  • इस तरह हम जिसे व्यापार घाटा समझते हैं, दरअसल वह चीन से बड़ी मात्रा में आने वाली पूंजी है। अतः इस भय या आशंका को हमेशा के लिये दूर करने की आवश्यकता है।
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