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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

मुर्गों की जब्ती पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक

  • 07 Jan 2017
  • 6 min read

सन्दर्भ

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों को एक बड़ी राहत देते हुए 6 जनवरी, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने हैदराबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगा दी है जिसमें इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से प्रचलित मुर्गों की लड़ाई को रोकने के लिये मुर्गों (roosters) की जब्ती के आदेश दिये गए थे|

पृष्ठभूमि

  • आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रांति के अवसर पर पारंपरिक रूप से मुर्गों की लड़ाई का आयोजन किया जाता है|
  • दरअसल, हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, ‘ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल/इंडिया’ और ‘पीपुल फॉर एनिमल’ के अलावा अन्य संगठनों की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था।
  • याचिकार्ताओं ने अदालत के संज्ञान में लाया था कि इस प्रथा पर रोक और पूर्व में दिये गए अदालत के आदेशों का उल्लंघन करते हुए हर साल संक्रांति के अवसर पर (14 जनवरी को) मुर्गों की लड़ाई का आयोजन होता है|
  • याचिका में कहा गया था कि पशु क्रूरता रोकथाम कानून का उचित तरीके से पालन होना चाहिये और लोगों को इसके प्रावधानों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिये ताकि पशुओं के खिलाफ क्रूरता को रोका जा सके|
  • इसमें कहा गया कि मुर्गों की लड़ाई से इन पक्षियों को नुकसान होता है और इसलिये इनका आयोजन नहीं होना चाहिये। इस मामले में न्यायालय द्वारा सरकार से इस चलन को समाप्त करवाने का अनुरोध किया गया था।
  • हैदराबाद उच्च न्यायालय ने मुर्गों की लड़ाई पर लगी रोक को बरकरार रखते हुए आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संक्रांति उत्सव के दौरान मुर्गों की लड़ाई का आयोजन न हो|
  • अदालत ने मुर्गों की लड़ाई को न केवल जनवरी महीने में होने वाले संक्रांति उत्सव के लिये प्रतिबंधित किया गया बल्कि इस पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया था ।
  • हैदराबाद उच्च न्यायालय के 26 दिसम्बर, 2016 के इस आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी, जिसकी सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुर्गों की जब्ती पर रोक लगा दी गई|

प्रमुख बिंदु 

  • दरअसल, भारत के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर और जस्टिस एन.वी. रमण तथा डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ हैदराबाद उच्च न्यायलय के विरुद्ध दायर याचिका की सुनवाई कर रही थी|
  • विदित हो कि आंध्र प्रदेश में मुर्गों की लड़ाई का यह खेल विगत 6000 वर्षों से प्रचलित है जिसे पोंगल/संक्रांति उत्सव के एक हिस्से के रूप में किसानों द्वारा ज़ोर-शोर से आयोजित किया जाता है।
  • उच्चतम न्यायलय के अधिवक्ता सतीश गाला द्वारा दायर याचिका में दलील दी गई थी कि लड़ाई  के इस खेल के लिये किसानों द्वारा मुर्गों को आजीविका के साधन के रूप में तैयार किया जाता है|
  • 26 दिसंबर के हैदराबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद से  पुलिस और अधिकारियों ने मुर्गों की दुर्लभ नस्ल को उनके मालिकों से जब्त कर लिया था और किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया था|
  • हैदराबाद उच्च न्यायलय के फैसले के बाद निरीक्षण टीमों द्वारा किसानों के खिलाफ की गई मनमानी कार्यवाही से किसानों को काफी नुकसान हुआ है और उत्सव के माहौल का आनंद उठाने की बजाय वे डर के साये में जीने को विवश हो गए| 
  • याचिका में यह भी कहा गया था इस आदेश के फलस्वरूप स्वदेशी मुर्गों की सम्पूर्ण प्रजाति के सफाए की आशंका है जो न सिर्फ पोल्ट्री बाज़ार बल्कि किसानों की -आजीविका को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है | 
  • दरअसल, इन किसानो की आजीविका का प्रमुख स्रोत पोल्ट्री है और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आजीविका के अधिकार को उनसे छीना नहीं जा सकता| यह पूरी तरह से लोकतंत्र का हनन है|
  • अतः आवश्यक है कि पक्षियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उनको पालने वाले मनुष्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाए|

उच्चतम न्यायलय ने श्री राव की याचिका पर भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और उन्हें चार सप्ताह में अपना जवाबी हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है|

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