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जैव विविधता और पर्यावरण

सर्वोच्च न्यायालय ने ESZ आदेश में किया संशोधन

  • 28 Apr 2023
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र/इको-सेंसिटिव ज़ोन, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (2002-2016)

मेन्स के लिये:

ESZ के आसपास गतिविधियाँ, ESZ का महत्त्व, ESZ से संबद्ध चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने संरक्षित वनों के आसपास इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) के संबंध में पूर्व के अपने फैसले को संशोधित करते हुए कहा कि ESZ पूरे देश में एक समान नहीं हो सकते हैं, अतः इसे विशिष्ट संरक्षित क्षेत्र के अनुरूप होने की आवश्यकता है।

ESZ पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के फैसले:

  • पूर्व के फैसले:
    • जून 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि देश भर में संरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास न्यूनतम एक किलोमीटर के क्षेत्र को ESZ के रूप घोषित किया जाना चाहिये।
      • न्यायालय का मानना था कि ESZ संरक्षित क्षेत्रों के लिये "शॉक अब्ज़ॉर्बर" के रूप में कार्य करेगा और अतिक्रमण, अवैध खनन, निर्माण तथा पर्यावरण एवं वन्य जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले अन्य गतिविधियों को रोकने में मदद करेगा।
      • न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को 6 महीने के भीतर ESZ को सूचित करने तथा अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था।
  • फैसले को चुनौती देने हेतु केंद्र और राज्यों का तर्क:
    • जून 2022 के आदेश के कारण वनों की परिधि में सैकड़ों गाँव प्रभावित हुए। ESZs पूरे देश में एक समान नहीं हो सकते हैं और इन्हें मामला-दर-मामला आधार पर तय किया जाता है।
    • भौगोलिक विशेषताओं, जनसंख्या घनत्त्व, भूमि उपयोग पैटर्न और प्रत्येक संरक्षित क्षेत्र के अन्य कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिये।
    • यह आदेश ESZ में रहने वाले लोगों की विकास गतिविधियों और उनकी आजीविका के साथ-साथ वन विभाग के संरक्षण प्रयासों को बाधित करेगा।

सर्वोच्च न्यायालय के संशोधित आदेश के प्रमुख बिंदु:

  • न्यायमूर्ति बी.आर. गवई (भूषण रामकृष्ण गवई) ने केंद्र तथा राज्यों की दलीलों पर सहमति जताई और अपने पिछले आदेश में यह कहते हुए संशोधन किया कि:
    • ESZ घोषित करने का उद्देश्य पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करना है।
    • जून 2022 के आदेश का सख्ती से पालन करने से अधिक नुकसान होगा क्योंकि इससे मानव-पशु संघर्ष में वृद्धि होगी, ग्रामीणों के लिये बुनियादी सुविधाएँ बाधित होंगी और संरक्षित क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण-विकास संबंधित गतिविधियाँ प्रभावित होंगी।
    • केंद्र और राज्यों को अपने प्रस्तावों के अनुसार या 6 महीने के भीतर विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के अनुसार ESZ को अधिसूचित करना चाहिये।
      • हालाँकि राष्ट्रीय उद्यानों/वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर और उनकी सीमा से 1 किमी. के क्षेत्र के भीतर खनन की अनुमति नहीं होगी।

पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र/इको-सेंसिटिव ज़ोन:

  • शासी विधान:
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत MoEFCC की राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (2002-2016) में निर्धारित किया गया है कि राज्य सरकारों को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं के 10 किमी. के भीतर आने वाली भूमि को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों (ESZs) के रूप में घोषित करना चाहिये।
  • विस्तार:
    • हालाँकि 10 किलोमीटर के नियम को एक सामान्य सिद्धांत के रूप में कार्यान्वित किया गया है, लेकिन इसके अनुप्रयोग की सीमा अलग-अलग हो सकती है।
    • पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण एवं विस्तृत क्षेत्रों, जिनका क्षेत्रफल 10 किमी. से अधिक हो, को केंद्र सरकार द्वारा ESZ के रूप में अधिसूचित किया जा सकता है।
  • ESZs के भीतर प्रतिबंधित गतिविधियाँ:
    • वाणिज्यिक खनन
    • आरा मिलें
    • प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग
    • प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ
    • लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग
  • अनुमत गतिविधियाँ:
  • महत्त्व:
    • ESZs इन-सीटू संरक्षण में मदद करते हैं
    • वनों की कमी एवं मानव-पशु संघर्ष को कम करते हैं
    • नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव को कम करते हैं
  • ESZs संबंधी चुनौतियाँ:
    • जलवायु परिवर्तन के कारण ESZs पर भूमि, जल और पारिस्थितिक तनाव पैदा हो रहा है।
    • वन अधिकार कमज़ोर होने के कारण वन समुदायों के जीवन एवं आजीविका पर प्रभाव।

आगे की राह

  • विशिष्ट संरक्षित क्षेत्रों के लिये ESZ का निर्माण:
    • सर्वोच्च न्यायालय के संशोधित आदेश में स्वीकार किया गया है कि ESZ पूरे देश में एक समान नहीं हो सकते हैं और मामले-दर-मामले के आधार पर निर्णय लेने की आवश्यकता है।
    • यह दृष्टिकोण सुनिश्चित कर सकता है कि ESZ प्रत्येक संरक्षित क्षेत्र की विशिष्ट आवश्यकताओं और कमज़ोरियों के अनुरूप हैं और परिधि में रहने वाले लोगों पर किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को कम करते हैं।
  • हितधारकों के साथ परामर्श:
    • ESZ तय करने की प्रक्रिया में केंद्र और राज्यों को स्थानीय समुदायों, वन विभागों, पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों सहित सभी हितधारकों को शामिल करना चाहिये।
      • यह सुनिश्चित कर सकता है कि अंतिम निर्णय में सभी पक्षों की चिंताओं और सुझावों पर विचार कर उनका समाधान किया जाए।
  • संरक्षण और विकास को संतुलित करना:
    • संशोधित आदेश में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ESZ घोषित करने का उद्देश्य नागरिकों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों में बाधा डालना नहीं है बल्कि पर्यावरण और वन्य जीवन की रक्षा करना है।
      • इसलिये केंद्र एवं राज्यों को संरक्षित क्षेत्रों और परिधि में रहने वाले लोगों की विकास संबंधी ज़रूरतों के बीच संतुलन बनाना चाहिये।
      • यह ESZ में पर्यावरणीय पर्यटन, स्थायी आजीविका और हरित बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देकर प्राप्त किया जा सकता है।
  • निगरानी और प्रवर्तन:
    • संशोधित आदेश केंद्र और राज्यों को छह महीने के अंदर ESZ को सूचित करने और अनुपालन रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश देता है।
    • यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है कि किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधिय, अतिक्रमण या उल्लंघन को रोकने के लिये ESZs की निगरानी की जाए और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
      • यह नियमित निरीक्षण, निगरानी और उल्लंघनकर्त्ताओं के लिये दंड का प्रावधान कर किया जा सकता है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न: 

प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किस वर्ग के आरक्षित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को जैवभार एकत्र करने और उसके उपयोग की अनुमति नहीं है? (2012)

(a) जैव मंडलीय आरक्षित क्षेत्रों में
(b) राष्ट्रीय उद्यानों में
(c) रामसर सम्मेलन में घोषित आर्द्रभूमियों में
(d) वन्यजीव अभयारण्यों में

उत्तर: (b)

स्रोत: द हिंदू

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