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‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के पास स्वतः संज्ञान की शक्तियाँ

  • 13 Oct 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, अनुच्छेद-21

मेन्स के लिये 

पर्यावरणीय मुद्दों से निपटने में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ (NGT) को एक ‘विशिष्ट’ मंच के रूप में घोषित करते हुए कहा कि वह देश भर में पर्यावरणीय मुद्दों को उठाने हेतु ‘स्वत: संज्ञान’ (Suo Motu) लेने की शक्तियों से संपन्न है।

प्रमुख बिंदु 

  • निर्णय संबंधी मुख्य बिंदु: 
    • निर्णायक भूमिका तक सीमित नहीं: ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ की भूमिका केवल न्यायनिर्णयन तक सीमित नहीं है, ट्रिब्यूनल को कई अन्य महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ भी निभानी होती हैं, जो प्रकृति में निवारक, सुधारात्मक या उपचारात्मक हो सकती हैं।
      • ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ को कार्यात्मक क्षमता प्रदान करने का उद्देश्य पर्यावरणीय जनादेश में पूर्ण न्याय हेतु व्यापक शक्तियों का लाभ उठाना है।
      • न्यायालय के अनुसार, अनुच्छेद-21 के तहत सम्मिलित अधिकार, व्याख्या के संकीर्ण दायरे पर टिके नहीं रह सकते। ज्ञात हो कि संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।
    • बहु-विषयक भूमिका: ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के पास विशेष मंच के रूप में सभी पर्यावरण संबंधी बहु-विषयक मुद्दों से निपटने के लिये ‘मूल’ एवं ‘अपीलीय’ क्षेत्राधिकार मौजूद है।
    • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता: ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के क्षेत्राधिकार में पर्यावरण के प्रति भारत की तमाम अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को भी शामिल किया गया है।
      • न्यायालय ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ को दुनिया के सबसे प्रगतिशील न्यायाधिकरणों में से एक के रूप में मान्यता दी है।
      • न्यायालय के इस निर्णय ने भारत को उन राष्ट्रों के एक विशिष्ट समूह में प्रवेश करने की अनुमति दी है, जिन्होंने व्यापक शक्तियों के साथ ऐसे संस्थान स्थापित किये हैं।
  • ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के विषय में
    • यह पर्यावरण संरक्षण और वनों एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी तथा शीघ्र निपटान हेतु ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम’ (2010) के तहत स्थापित एक विशेष निकाय है।
    • ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ की स्थापना के साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद एक विशेष पर्यावरण न्यायाधिकरण स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया और साथ ही वह ऐसा करने वाला पहला विकासशील देश भी है।
    • ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम’ (2010) ने ट्रिब्यूनल को उन मुद्दों पर कार्रवाई करने हेतु एक विशेष भूमिका प्रदान की है, जहाँ सात निर्दिष्ट कानूनों (अधिनियम की अनुसूची I में उल्लिखित) के तहत विवाद उत्पन्न हुआ: जल अधिनियम, जल उपकर अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, वायु अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम और जैविक विविधता अधिनियम।
    • ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ को आवेदनों या अपीलों के दाखिल होने के 6 महीने के भीतर अंतिम रूप से उनका निपटान करना अनिवार्य है।
    • NGT का मुख्यालय दिल्ली में है, जबकि अन्य चार क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल, पुणे, कोलकाता एवं चेन्नई में स्थित हैं।
    • ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष होता है, जो कि प्रधान पीठ में बैठता है और इसमें कम-से-कम दस न्यायिक सदस्य (बीस से अधिक नहीं) होते हैं और कम-से-कम दस विशेषज्ञ सदस्य (बीस से अधिक नहीं) होते हैं।
    • ट्रिब्यूनल का निर्णय बाध्यकारी होता है। ट्रिब्यूनल के पास अपने निर्णय की समीक्षा करने का अधिकार है। इस निर्णय को 90 दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।
  • संबद्ध चुनौतियाँ
    • रिक्तियाँ: पिछले 9 वर्षों के दौरान ट्रिब्यूनल में पर्यावरणीय मुकदमों की बढ़ती संख्या को संबोधित करने के लिये न्यूनतम 10 न्यायिक और 10 विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति भी नहीं की गई है।
    • आदेशों का क्रियान्वयन: ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के आदेशों के कार्यान्वयन के संबंध में भी गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं।
      • ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि ट्रिब्यूनल द्वारा आदेशित मुआवज़े की राशि आदेश की तारीख से 30 दिनों की अवधि के भीतर पर्यावरण राहत कोष के प्राधिकरण को प्रेषित की जानी चाहिये।
      • हालाँकि यह देखा गया है कि कई प्रदूषक इस नियम का पालन नहीं करते हैं।
      • इसके अलावा यह सुनिश्चित करने के लिये कोई संस्थागत तंत्र नहीं है कि पर्यावरण नियामक प्राधिकरण, ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन करें।
      • सर्वोच्च न्यायालय में अपील: ट्रिब्यूनल के कई आदेशों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा रही है, इसमें कई ऐसे मामले भी शामिल हैं जिनमें ट्रिब्यूनल द्वारा भारी जुर्माना लगाया गया है।

आगे की राह

  • मानव विकास गतिविधियों के साथ संतुलन में पर्यावरण की प्रभावी सुरक्षा हेतु अधिक स्वायत्तता और ट्रिब्यूनल के दायरे को व्यापक बनाने की आवश्यकता है।
  • सरकार को ट्रिब्यूनल के अस्तित्त्व को बनाए रखने हेतु पर्याप्त वित्तीय एवं मानव संसाधन उपलब्ध कराने पर ज़ोर देना चाहिये।
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र स्थापित करके पर्यावरण न्यायशास्त्र के विकास के लिये मार्ग प्रदान करता है। यह पर्यावरणीय मामलों पर उच्च न्यायालयों में मुकदमों के बोझ को कम करने में भी मदद करता है।

स्रोत: द हिंदू

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