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पराली दहन

  • 06 Dec 2022
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

पराली दहन, टर्बो हैप्पी सीडर (THS) मशीन, CAQM, वायु प्रदूषण।

मेन्स के लिये:

पराली दहन के प्रभाव।

चर्चा में क्यों?

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management- CAQM) के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पराली जलाने की घटना में वर्ष 2021 की तुलना में वर्ष 2022 में 31.5% की कमी आई है।

  • वर्ष 2021 की तुलना में, वर्ष 2022 में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने में क्रमशः 30%, 47.60% और 21.435% की कमी आई है। यह आकलन नासा (National Aeronautics and Space Administration- NASA) के उपग्रहों से मिली जानकारी पर आधारित है।

पराली दहन में कमी के कारण:

  • राज्य सरकारों ने स्व-स्थाने और बाह्य-स्थाने पराली प्रबंधन को अपनाने के साथ-साथ पराली नहीं जलाने वाले किसानों को सम्मानित करने के लिये एक विशेष अभियान चलाया।
  • पराली का स्व-स्थाने प्रबंधन: उदाहरण के लिए, ज़ीरो-टिलर मशीन द्वारा फसल अवशेषों का प्रबंधन और बायो-डीकंपोज़र (जैसे, पूसा बायो-डीकंपोज़र) का उपयोग।
  • बाह्य-स्थाने (ऑफ-साइट) प्रबंधन: उदाहरण के लिए, मवेशियों के चारे के रूप में चावल के भूसे का उपयोग।
  • लगभग 10 मिलियन टन पराली का निपटान स्व-स्थाने प्रबंधन के माध्यम से किया गया था, जो पंजाब में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25% अधिक है।
    • इसी तरह 1.8 मिलियन टन पराली का प्रबंधन बाह्य-स्थाने प्रबंधन के माध्यम से किया गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33% अधिक है।
  • पंजाब ने तीन वर्ष के लिये कार्ययोजना बनाई थी, जिसे केंद्र सरकार के साथ साझा किया गया है।

पराली दहन (Stubble Burning):

  • परिचय:
  • पराली दहन, अगली फसल बोने के लिये फसल के अवशेषों को खेत में जलाने की क्रिया है।
  • इसी क्रम में सर्दियों की फसल (रबी की फसल) की बुवाई हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा कम अंतराल पर की जाती है तथा अगर सर्दी की छोटी अवधि के कारण फसल बुवाई में देरी होती है तो उन्हें काफी नुकसान हो सकता है, इसलिये पराली दहन पराली की समस्या का सबसे सस्ता और तीव्र तरीका है।
  • पराली दहन की यह प्रक्रिया अक्तूबर के आसपास शुरू होती है और नवंबर में अपने चरम पर होती है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी का समय भी है।
  • पराली दहन का प्रभाव:
    • प्रदूषण:
      • खुले में पराली दहन से वातावरण में बड़ी मात्रा में ज़हरीले प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं जिनमें मीथेन (CH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC) और कार्सिनोजेनिक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसें होती हैं।
      • वातावरण में छोड़े जाने के बाद ये प्रदूषक वातावरण में फैल जाते हैं, भौतिक और रासायनिक परिवर्तन से गुज़र सकते हैं तथा अंततः स्मॉग (धूम्र कोहरा) की मोटी चादर बनाकर मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
    • मृदा की उर्वरता:
      • भूसी को ज़मीन पर दहन से मृदा के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे इसकी उर्वरकता कम हो जाती है।
    • गर्मी उत्पन्न होना:
      • पराली दहन से उत्पन्न गर्मी मृदा में प्रवेश करती है, जिससे नमी और उपयोगी रोगाणुओं को नुकसान होता है।
  • पराली दहन के विकल्प:
    • पराली का स्व-स्थाने (In-Situ) प्रबंधन: ज़ीरो-टिलर मशीनों और जैव-अपघटकों के उपयोग द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन।
    • इसी प्रकार बाह्य-स्थाने (Ex-Situ) प्रबंधन: जैसे मवेशियों के चारे के रूप में चावल के भूसे का उपयोग करना।
    • प्रौद्योगिकी का उपयोग: उदाहरण के लिये टर्बो हैप्पी सीडर (Turbo Happy Seeder-THS) मशीन, जो पराली को जड़ समेत उखाड़ फेंकती है और साफ किये गए क्षेत्र में बीज बोवाई सकती है। इसके बाद पराली को खेत के लिये गीली घास के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • फसल पैटर्न बदलना: यह अधिक मौलिक समाधान है।
    • बायो एंज़ाइम-पूसा: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agriculture Research Institute) ने बायो एंज़ाइम-पूसा (bio enzyme-PUSA) के रूप में एक परिवर्तनकारी समाधान पेश किया है।
      • यह अगले फसल चक्र के लिये उर्वरक के खर्च को कम करते हुए जैविक कार्बन और मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि करता है।
  • अन्य कार्ययोजना:
    • पंजाब, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) राज्यों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) ने कृषि पराली दहन की समस्या से निपटने हेतु वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा दी गई रूपरेखा के आधार पर निगरानी के लिये विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है।

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Air Quality Management Commission- CAQM):

  • CAQM राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है।
    • इससे पहले आयोग का गठन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अध्यादेश, 2021 की घोषणा के माध्यम से किया गया था।
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 ने वर्ष 1998 में NCR में स्थापित पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्राधिकरण (EPCA) को भी भंग कर दिया।
  • यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिये वायु गुणवत्ता सूचकांक के बेहतर समन्वय, अनुसंधान, पहचान और समाधान एवं इससे संबंधित या आनुषंगिक मामलों हेतु स्थापित किया गया है।

आगे की राह

  • जैसा कि हम जानते हैं, पराली दहन से उपयोगी कच्चा माल नष्ट हो जाता है, वायु प्रदूषित हो जाती है, श्वसन संबंधी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाता है। इसलिये समय की मांग है कि पराली का पशु आहार के रूप में रचनात्मक उपयोग किया जाए तथा टर्बो-हैप्पी सीडर मशीन एवं बायो-डीकंपोज़र आदि जैसे विभिन्न विकल्पों को सक्षम करके प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए।
  • कागज और कार्डबोर्ड सहित उत्पाद बनाने के लिये पराली को पुनर्चक्रीकरण किया जा सकता है।
  • साथ ही इसे खाद के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिये, दिल्ली के बाहर पल्ला गाँव में नंदी फाउंडेशन ने किसानों से 800 मीट्रिक टन धान के अवशेषों को खाद में बदलने के लिये खरीदा।
  • फसल अवशेषों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे चारकोल गैसीकरण, विद्युत उत्पादन, जैव-इथेनॉल के उत्पादन के लिये औद्योगिक कच्चे माल के रूप में भी किया जा सकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रश्न. मुंबई, दिल्ली और कोलकाता देश के तीन मेगा शहर हैं लेकिन दिल्ली में अन्य दो की तुलना में वायु प्रदूषण अधिक गंभीर समस्या है। ऐसा क्यों है? (मुख्य परीक्षा, 2015)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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