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भारतीय राजनीति

जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालय

  • 10 Nov 2020
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

न्याय मित्र, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम

मेन्स के लिये:

राजनीति का अपराधीकरण और इसके समाधान के प्रयास 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उच्चतम न्यायालय की एक तीन सदस्यीय पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार करते हुए यह स्पष्ट किया कि पूर्व सांसदों और विधायकों के विरुद्ध विभिन्न आपराधिक मामलों की तेज़ी से सुनवाई करने हेतु विशेष अदालतों की स्थापना का उद्देश्य लोगों के हितों की रक्षा और न्यायप्रणाली के प्रति लोगों के विश्वास को मज़बूत करना है।

प्रमुख बिंदु: 

  • उच्चतम न्यायालय की पीठ द्वारा विशेष अदालतों की स्थापना के उद्देश्य से मद्रास उच्च न्यायालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार किया जा रहा था, जिसमें समिति ने विभिन्न मामलों में आरोपी नेताओं के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिये विशेष अदालतों की स्थापना पर अनिच्छा दिखाई थी।

पृष्ठभूमि: 

  • गौरतलब है कि वर्ष 2017 में उच्चतम न्यायालय ने देश में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिये देश के विभिन्न हिस्सों में विशेष अदालतों की स्थापना का आदेश दिया था।
  • उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद देश के 11 राज्यों में 12 विशेष न्यायालयों को स्थापना की गई थी।
    • इसके तहत दिल्ली में 2, जबकि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में 1-1 विशेष न्यायालय की स्थापना की गई।
  • सितंबर 2020 में उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त न्याय मित्र अथवा एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में  विशेष अदालतों की स्थापना के प्रयासों के बावज़ूद वर्तमान में देश में लगभग 4,442 नेताओं के विरूद्ध आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें 2,556 ऐसे मामले हैं जो संसद सदस्य (सांसद) और विधानसभाओं (विधायकों) के सदस्यों पर हैं।
    •  इस रिपोर्ट में उन्होंने नेताओं के विरुद्ध मामलों के अधिक समय तक लंबित रहने के निम्नलिखित कारण बताए हैं:
  1. विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा मामलों पर लागू स्थगन।
  2. मुकदमे चलाने के लिये विशेष न्यायालयों की अपर्याप्त संख्या।
  3. अभियोजकों की कमी। 
  4. जाँच प्रक्रिया में देरी।
  • इस रिपोर्ट के मिलने के बाद उच्चतम न्यायालय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को संसद और विधानसभा सदस्यों (वर्तमान और पूर्व दोनों) के विरुद्ध लंबित मामलों की सूची तैयार करने का आदेश दिया। 
  • उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों की एक विशेष बेंच द्वारा ऐसे सभी मामलों की जाँच करने का आदेश दिया जिनमें नेताओं के मामलों की सुनवाई के खिलाफ स्थगन या स्टे प्रदान किया गया है, साथ ही विशेष बेंच द्वारा इस स्थगन को जारी रखने या रद्द करने के संदर्भ में दो माह के अंदर निर्णय लेने का भी आदेश दिया गया। 
    • उच्चतम न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट किया कि COVID-19 को मामलों की सुनवाई रोकने के एक कारण के रूप में नहीं लिया जाना चाहिये क्योंकि सुनवाई की प्रक्रिया को वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भी पूरा किया जा सकता है। 

समिति का तर्क:    

  • समिति ने संसद और विधानसभा सदस्यों के खिलाफ मामलों की सुनवाई हेतु विशेष अदालतों के गठन की संवैधानिक मान्यता पर प्रश्न उठाया। 
  • समिति के अनुसार, विशेष अदालतों की स्थापना केवल एक कानून के माध्यम से ही की जा सकती है,  कार्यपालिका या न्यायपालिका के आदेश से नहीं।     
  • समिति ने कहा कि विशेष न्यायालयों की स्थापना अपराध केंद्रित/आधारित (Offence-Centric) होनी चाहिये अपराधी आधारित नहीं।
    • उदाहरण के लिये यदि किसी संसद या विधानसभा सदस्य को पाॅक्सो अधिनियम से जुड़े अपराध में पकड़ा जाता है तो ऐसे मामलों की सुनवाई केवल पाॅक्सो के तहत स्थापित विशेष न्यायालय द्वारा ही की जा सकती है।
  • इसके साथ ही समिति ने ऐसे विशेष न्यायालयों में पहुँचने के लिये गवाहों को होने वाली यातायात से संबंधित समस्याओं और मामलों को राजनीतिक दलों द्वारा प्रभावित करने जैसी समस्याओं को भी रेखांकित किया।

राजनीति का अपराधीकरण:  

  • भारत में राजनीति के अपराधीकरण के प्रमुख कारणों में पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण, भ्रष्टाचार, कमज़ोर कानून, नैतिकता की कमी,  वोट बैंक की राजनीति और चुनाव आयोग के कार्य में व्याप्त कमियाँ आदि शामिल हैं।
  • एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (Association of Democratic Reforms)की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में लोकसभा के लिये निर्वाचित कुल सदस्यों की संख्या में से लगभग आधे के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे जो वर्ष 2014 के निर्वाचित सदस्यों की तुलना में 26% अधिक हैं।

कानूनी प्रावधान:  

  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 के तहत दोषी नेताओं (कुछ अपराधों के लिये) को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया है। हालाँकि मुकदमे का सामना करने वाले  (चाहे कितने भी गंभीर आरोप क्यों न हों) नेता चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं।

संबंधित पूर्व मामले:  

  • फरवरी 2020 में उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दलों को विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र अपने उम्मीदवारों के संपूर्ण आपराधिक इतिहास को प्रकाशित करने का आदेश दिया, साथ ही उच्चतम न्यायालय  ने राजनीतिक दलों को सभ्य लोगों के स्थान पर ऐसे संदिग्ध अपराधियों को चुने जाने के कारणों को स्पष्ट करने के लिये भी कहा।

निर्वाचन आयोग का मत:  

  • निर्वाचन आयोग ने आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की याचिका का समर्थन किया था।
  • निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव दिया गया था जो किसी ऐसे अपराध के आरोपी हैं जिसमें कम-से-कम पाँच साल के लिये कैद की सज़ा हो सकती है और उन पर किसी अदालत द्वारा आरोप भी तय किये जा चुके हों। हालाँकि कई राजनीतिक दलों द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किया गया। 
    •  राजनीतिक दलों के अनुसार, सत्ताधारी दल द्वारा अपने विरोधियों को दबाने के लिये इस प्रावधान का दुरुपयोग किया जा सकता है, साथ ही भारतीय कानून व्यवस्था में अपराध सिद्ध न होने तक सभी को निर्दोष माना जाता है, ऐसे में इस प्रावधान से नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। 

आगे की राह: 

  • देश की राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की सक्रियता को नियंत्रित करने के लिये विशेष अदालतों की स्थापना करना एक सकारात्मक पहल होगी। 
  • इसके साथ ही ऐसे मामलों के संदर्भ में निर्वाचन आयोग की शक्तियों में वृद्धि के साथ, जन प्रतिनिधियों के उत्तरदायित्व के निर्धारण हेतु आवश्यक विधायी सुधार किये जाने चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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