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धारा 144

  • 24 Dec 2019
  • 11 min read

प्रीलिम्स के लिये:

धारा 144, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता 

मेन्स के लिये:

आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता से संबंधित मुद्दे, धारा 144 का अनुपालन और व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (Citizenship Amendment Act- 2019)  के खिलाफ प्रदर्शन के  दौरान लोक व्यवस्था को बनाए रखने हेतु आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure- CrPC), 1973  की धारा 144 (Section 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई।

धारा 144 क्या है?

  • धारा 144 आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत एक कानून है जो औपनिवेशिक काल से बना हुआ है। धारा 144 ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को हिंसा या उपद्रव की आशंका और उसे रोकने से संबंधित प्रावधान लागू करने का अधिकार देता है।
  • मजिस्ट्रेट को एक लिखित आदेश पारित करना होता है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष या स्थान विशेष या क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों या आमतौर पर किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में आने-जाने के संबंध में  लोगों को निर्देशित किया जा सकता है। आपातकालीन मामलों में मजिस्ट्रेट बिना किसी पूर्व सूचना के भी इन आदेशों को पारित कर सकता है।

इस कानून के तहत प्रशासन के पास क्या अधिकार हैं?

  • इसमें आमतौर पर आंदोलन पर प्रतिबंध, हथियार ले जाने और गैरकानूनी रूप से असेंबलिंग पर प्रतिबंध शामिल हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि धारा 144 के तहत तीन या अधिक लोगों की सभा निषिद्ध है।
  • धारा 144 के तहत पारित कोई भी आदेश उसके जारी होने के दिनांक से दो महीने तक ही लागू  रह सकता है किंतु यदि राज्य सरकार चाहती है तो इसे 6 महीने तक बढाया जा सकता है। किसी भी परिस्थिति में धारा 144 के अंतर्गत जारी किया गया आदेश 6 महीने से ज़्यादा प्रभावी नहीं रह सकता है।
  • धारा 144 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रतिबंधित करने का प्रावधान कर सकता है। गौरतलब है कि मजिस्ट्रेट यह आदेश किसी व्यक्ति को विधिवत रूप से नियोजित करने या मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के खतरे, सार्वजनिक सुरक्षा में गड़बड़ी को रोकने, दंगे रोकने इत्यादि संदर्भों में जारी कर सकता है।

धारा 144 के उपयोग पर प्रशासन की आलोचना क्यों की जाती है?

  • ज़िला मजिस्ट्रेट के पास इस कानून के तहत प्राप्त अत्यधिक शक्ति संकेंद्रण के कारण इसकी आलोचना की जाती है। ध्यातव्य है कि इस कानून के क्रियान्वयन में ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा अपनी शक्ति के दुरुपयोग की आशंका के कारण भी इस कानून की आलोचना की जाती है।
  • इस कानून के अंतर्गत व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, इसलिये भी इस कानून की आलोचना की जाती है। यद्यपि मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु न्यायालय जाने का विकल्प सदैव रहता है।

धारा 144 के संदर्भ में न्यायालय की राय:

  • वर्ष 1939 में बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि धारा 144 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट स्वतंत्रता को बाधित करता है किंतु उसे यह तभी करना चाहिये जब तथ्य सार्वजनिक सुरक्षा के संदर्भ में ऐसा करने को प्रमाणित करते हों तथा उसे ऐसे प्रतिबंध नहीं लगाने चाहिये जो मामले की आवश्यकताओं से परे हो।
  • वर्ष 1961 के बाबूलाल परते बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने इस कानून की संवैधानिकता को बरक़रार रखा।
  • वर्ष 1967 में राम मनोहर लोहिया मामले में इस कानून को  पुनः न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया और इस कानून के पक्ष में कहा कि “कोई भी लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता यदि उस देश के किसी एक वर्ग के लोगों को आसानी से लोक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने दिया जाए”।
  • वर्ष 1970 में मधुलिमये (Madhu Limaye) बनाम सब-डिवीज़नल मजिस्ट्रेट मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 7 सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने धारा 144 में मजिस्ट्रेट की शक्ति के संदर्भ में कहा कि “मजिस्ट्रेट की शक्ति प्रशासन द्वारा प्राप्त आम शक्ति नहीं है बल्कि यह न्यायिक तरीके से उपयोग की जाने जाने वाली शक्ति है जिसकी न्यायिक जाँच भी की जा सकी है।”
    • न्यायालय ने कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए कहा कि धारा 144 के अंतर्गत लगे प्रतिबंधों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अंतर्गत आता है।
  • वर्ष 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह के प्रावधान का उपयोग केवल सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिये गंभीर परिस्थितियों में किया जा सकता है और इस प्रावधान का उद्देश्य केवल हानिकारक घटनाओं को घटित होने से रोकना है।

क्या धारा 144 दूरसंचार व्यवस्था पर भी प्रतिबंध लगाती है?

  • दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन ( लोक आपात या लोक सुरक्षा ) नियम, 2017 के अंतर्गत देश के गृह मंत्रालय के सचिव या राज्य के सक्षम पदाधिकारी  को दूरसंचार सेवाओं के निलंबन का अधिकार दिया गया है।
    • यह कानून भारतीय टेलीग्राफ़ अधिनियम,1885 से शक्ति प्राप्त करता है। ध्यातव्य है कि भारतीय टेलीग्राफ़ अधिनियम,1885 की धारा 5(2) के तहत केंद्र एवं राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया है कि वे लोक संकट या जन सुरक्षा या भारत की संप्रभुता और अखंडता तथा राज्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संदेश सेवा (Messaging) को प्रतिबंधित कर सकती हैं।
  • हालाँकि भारत में शटडाउन हमेशा सुरक्षा उपायों और प्रक्रियाओं के निर्धारित नियमों के तहत नहीं होते हैं। धारा 144 का इस्तेमाल अक्सर दूरसंचार सेवाओं पर रोक लगाने और इंटरनेट बंद करने के आदेश के लिये किया जाता रहा है।
    • उत्तर प्रदेश में ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 144 के तहत इंटरनेट सेवाएँ निलंबित कर दी गईं। पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक तनाव के कारण मोबाइल इंटरनेट, केबल सेवाओं और ब्रॉडबैंड को ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 144 के तहत बंद कर दिया गया।

आपराधिक दंड  प्रक्रिया संहिता :

  • आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्यवन के लिये मुख्य कानून है। यह सन् 1973  में पारित हुआ तथा 1 अप्रैल, 1974 से लागू हुआ।
  • CrPC आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता का संक्षिप्त नाम है। जब कोई अपराध किया जाता है तो सदैव दो प्रक्रियाएँ होती हैं, जिन्हें पुलिस अपराध की जाँच करने में अपनाती हैं।
  • एक प्रक्रिया पीड़ित के संबंध में और दूसरी आरोपी के संबंध में होती है। CrPC में इन प्रक्रियाओं का ब्यौरा दिया गया है।

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की कुछ प्रमुख धाराएँ :

  • धारा 41 (b): गिरफ्तारी की प्रक्रिया तथा गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के कर्त्तव्य
  • धारा 41 (d): इस धारा  के अनुसार, जब कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है तथा पुलिस द्वारा उससे परिप्रश्न किये जाते हैं, तो परिप्रश्नों के दौरान उसे अपने पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार होगा किंतु पूरे परिप्रश्नों के दौरान नहीं।
  • धारा 46: गिरफ्तारी कैसे की जाएगी?
  • धारा 51: गिरफ्तार व्यक्ति की तलाशी लेने की प्रक्रिया। 
  • धारा 52: आक्रामक आयुध का अधिग्रहण - गिरफ्तार व्यक्ति के पास यदि कोई आक्रामक आयुध पाए जाते है तो उन्हें अधिग्रहीत करने के प्रावधान हैं।
  • धारा 55 (a): इसके अनुसार अभियुक्त को अभिरक्षा में रखने वाले व्यक्ति का यह कर्त्तव्य होगा कि वह अभियुक्त के स्वास्थ्य तथा सुरक्षा की युक्तियुक्त देख-रेख करे।

इस प्रकार धारा 144 आपातकालीन स्थिति में कानून व्यवस्था को सुचारु रूप से क्रियान्वित करने के लिये एक अच्छा उपकरण है किंतु इसका गलत प्रयोग इसके संबंध में चिंता उत्पन्न करता है।

स्रोत: द हिंदू

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