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बांग्लादेश के पृथक द्वीप पर रोहिंग्या

  • 08 Dec 2020
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे 15 हज़ार से अधिक रोहिंग्या शरणार्थियों को बंगाल की खाड़ी में स्थित ‘भासन/भाषण चार’ (Bhasan Char) द्वीप पर भेजा गया।

Floating-Island

मुख्य बिंदु

पृष्ठभूमि:

  • इंडो-आर्यन जातीय समूह के रोहिंग्या लोग राज्य-रहित स्थिति में म्याँमार के रखाइन प्रांत में रहते हैं।
  • म्याँमार में 2016-17 के संकट से पहले लगभग 1 मिलियन रोहिंग्या रह रहे थे। एक अनुमान के अनुसार, अगस्त 2017 तक लगभग 625,000 रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर गए थे। इनमें अधिकांश मुस्लिम हैं, जबकि कुछ अल्पसंख्यक हिंदू भी हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा इन्हें दुनिया के सबसे अधिक सताए गए अल्पसंख्यकों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है।
  • म्याँमार ने म्याँमार राष्ट्रीयता कानून, 1982 के तहत रोहिंग्या आबादी को नागरिकता देने से इनकार कर दिया।
  • यद्यपि इस क्षेत्र में रोहिंग्या का इतिहास 8वीं शताब्दी से पाया जाता है फिर भी म्याँमार का कानून उनको आठ राष्ट्रीय स्वदेशी अल्पसंख्यकों की श्रेणियों में से एक के रूप में मान्यता नहीं देता है।
  • म्याँमार से रोहिंग्या लोगों का बहिर्गमन 2017 में तेज़ी से शुरू हो गया और बांग्लादेश का तटीय शहर कॉक्स बाज़ार (Cox’s Bazar) शरणार्थी बस्ती के रूप में बदल गया।
  • जून 2015 में बांग्लादेश सरकार ने अपनी आश्रय परियोजना के तहत रोहिंग्या शरणार्थियों को भासन/भाषण चार द्वीप पर पुनः बसाने का फैसला किया था।

हाल की पहल:

  • बांग्लादेश सरकार इन शरणार्थियों को एक अलग द्वीप में ले जा रही है जिसे भासन/भाषण चार द्वीप के नाम से जाना जाता है जो मुख्य भूमि से 21 मील (34 किलोमीटर) दूर स्थित है।
  • भासन/भाषण चार:
    • भासन/भाषण चार द्वीप का निर्माण लगभग दो दशक पहले मेघना नदी के मुहाने पर गाद द्वारा निर्मित द्वीप के रूप में बंगाल की खाड़ी में हुआ था।
    • यह निर्जन द्वीप दक्षिण-पूर्व बांग्लादेश में स्थित ‘हटिया’ द्वीप से 30 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व में स्थित है।
    • भासन/भाषण चार द्वीप बाढ़, कटाव और चक्रवात से प्रभावित क्षेत्र है, इसलिये बांग्लादेश सरकार यहाँ लगभग तीन मीटर ऊँचे तटबंध का निर्माण कर रही है।

चिंता:

  • चूँकि भासन/भाषण चार द्वीप बाढ़, कटाव और चक्रवात के कारण पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र है, इसलिये इसे मानव बस्तियों के लिये सुरक्षित नहीं माना जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार एजेंसियाँ इस पुनर्वास के खिलाफ हैं क्योंकि उनका मानना है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को द्वीप पर स्थानांतरित होने के बारे में प्रासंगिक, सटीक और अद्यतन जानकारी के आधार पर  स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिये।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने इस साल की शुरुआत में ही इस द्वीप पर रहने वाले रोहिंग्या की स्थिति के बारे में एक बहुत ही चिंतनीय रिपोर्ट जारी की है।
    •  इस रिपोर्ट में निवास की सीमित और अस्वच्छ स्थिति, भोजन तथा स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच, संचार सुविधा की कमी के साथ-साथ नौसेना एवं स्थानीय मज़दूरों द्वारा ज़बरन वसूली व यौन उत्पीड़न के मामले शामिल थे।

भारत का रुख:

  • रोहिंग्या लोग भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा हैं और अंतर्राष्ट्रीय आतंकी समूहों के साथ उनके संबंध हैं।
  • भारत ने रोहिंग्याओं को वापस बुलाने और उन्हें म्याँमार की नागरिकता देने के लिये म्याँमार पर किसी भी प्रकार का दबाव डालने से इनकार किया है।

रोहिंग्याओं के अधिकारों की रक्षा के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रावधान:

  • संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि,1951 एवं शरणार्थियों की स्थिति पर प्रोटोकॉल, 1967
    (The Refugee Convention, 1951 and its Protocol, 1967)
    • इस संधि (1951) एवं प्रोटोकॉल (1967) पर कुल 145 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं, साथ ही यह संधि संयुक्त राष्ट्र के तत्त्वावधान में की गई है।
    • द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् उपजे शरणार्थी संकट का समाधान तलाशने के क्रम में इस संधि को अंजाम दिया गया। इसमें शरणार्थी की परिभाषा, उनके अधिकार तथा हस्ताक्षरकर्त्ता देश की शरणार्थियों के प्रति ज़िम्मेदारियों का भी प्रावधान किया गया है।
    • यह संधि जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह से संबद्धता या पृथक राजनीतिक विचारों के कारण उत्पीड़न तथा अपना देश छोड़ने को मज़बूर लोगों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करती है। किंतु ऐसे लोग जो युद्ध अपराध से संबंधित हैं अथवा आतंकवाद से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं, उन्हें शरणार्थी के रूप में मान्यता नहीं देती है।
    • यह संधि वर्ष 1948 की मानवाधिकारों पर सार्वभौम घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 14 से प्रेरित है। UDHR किसी अन्य देश में पीड़ित व्यक्ति को शरण मांगने का अधिकार प्रदान करती है।
    • वर्ष 1967 का प्रोटोकॉल सभी देशों के शरणार्थियों को शामिल करता है, इससे पूर्व वर्ष 1951 में की गई संधि सिर्फ यूरोप के शरणार्थियों को ही शामिल करती थी। वर्तमान में यह संधि एवं प्रोटोकॉल शरणार्थियों के अधिकारों के संरक्षण के लिये प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इनके प्रावधान मौजूदा समय में भी उतने ही प्रासंगिक है जितने इनके गठन के वक्त थे।

आगे की राह

  • अंततः म्याँमार पर रोहिंग्याओं को वापस बुलाने के लिये दबाव डालते हुए बांग्लादेश और अन्य बाहरी साझीदारों को मिलकर रोहिंग्या के लिये कुछ ज़रूरी अल्पकालिक योजनाओं जैसे- सुरक्षित आवासों का निर्माण, शरणार्थियों के शैक्षिक और आजीविका के अवसरों में सुधार आदि को पूरा करना चाहिये। बांग्लादेश को भी भासन/भाषण चार द्वीप पर रोहिंग्याओं को भेजने का निर्णय वापस लेना चाहिये।
  • म्याँमार को भी स्वयं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलकर मानवाधिकारों पर ध्यान देने में देरी नहीं करनी चाहिये, ताकि मानवाधिकारों के संरक्षण, भेदभाव के मुद्दों का समाधान, पीड़ित-केंद्रित न्याय तंत्र को लागू करने के साथ ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों को जवाबदेह बनाया जा सके और इससे विश्व में म्याँमार की छवि बेहतर होगी।

स्रोत: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

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