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क्रिप्टोकरेंसी के विनियमन का प्रयास

  • 03 May 2018
  • 10 min read

चर्चा में क्यों? 
हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने) अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा के दौरान बैंकों समेत सभी विनियामक एजेंसियों को क्रिप्टोकरेंसी (cryptocurrency  से निपटने हेतु किसी भी व्यक्ति या इकाई द्वारा आभासी मुद्राओं (VC) के व्यवसाय को रोकने के लिये निर्देशित किया था।

प्रमुख बिंदु

  • RBI के दिशानिर्देशों के अनुसार बैंकों को आभासी मुद्राओं में काम करने वाले लोगों की सभी सेवाओं को रोकना है।
  • इसके तहत ऐसे व्यक्तियों के आभासी मुद्रा में विभिन्न गतिविधियों, जैसे- खातों को बनाए रखना, पंजीकरण करना, समाशोधन करना(clearing), आभासी टोकन के माध्यम से ऋण देना, संपार्श्विक(collateral ) आदि को रोकना है।
  • RBI और वित्त मंत्रालय ने बिटकॉइन जैसी वर्चुअल करेंसी को पोंजी स्कीम की तरह माना है और इन्हें मान्यता नहीं दी है।

पोंजी स्कीम

  • पोंजी स्कीम से आशय ऐसी फर्जी योजनाओं अथवा निवेश से है, जिसमें संचालक पुराने निवेशकों को रिटर्न नए निवेशकों से प्राप्त धनराशि से देता है।
  • यह एक ऐसी स्कीम होती है जिसमें किसी व्यावसायिक गतिविधि या कारोबार में पैसा नहीं लगाया जाता, बल्कि कुछ व्यक्तियों से पैसा इकठ्ठा कर एक व्यक्ति को रिटर्न के रूप में दे दिया जाता है।
  • इस  प्रकार यह एक चेन का रूप ले लेती है और जिसमें बाद में पैसा लगाने वाले ज्यादातर लोगों का पैसा बर्बाद हो जाता है।
  • साथ ही नीति निर्माताओं ने यह आशंका व्यक्त की है कि क्रिप्टोकरेंसियाँ, फिएट मुद्रा के मूल्य का वैकल्पिक स्रोत होने की वजह से इसका इस्तेमाल आतंकी फंडिंग, तस्करी और मनी लांड्रींग जैसे गैर-कानूनी गतिविधियों में किया जा सकता है। 
  • गौरतलब है कि ‘फिएट क्रिप्टोकरेंसी’ एक डिजिटल मुद्रा है, जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किया जाएगा।

क्रिप्टोकरेंसी (cryptocurrency) क्या है?

  • यह एक डिजिटल या आभासी मुद्रा है जिसमें सुरक्षा के लिये क्रिप्टोग्राफी तकनीक उपयोग में लाई जाती है। इसकी सुरक्षा वैशिष्ट्य के कारण इसका जाली रूप बनाना मुश्किल है।
  • इसे किसी केन्द्रीय या सरकारी प्राधिकरण द्वारा जारी नहीं किया जाता है। अतः सैद्धांतिक रूप से यह सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त है।
  • सन् 2009 में किसी समूह या व्यक्ति ने सतोशी नाकामोतो के छद्म नाम से ‘बिटकोइन’ के नाम से पहली क्रिप्टोकरेंसी बनाई। 

क्या है फिएट और नॉन-फिएट क्रिप्टोकरेंसी?

  • “नॉन-फिएट” क्रिप्टोकरेंसी (“non-fiat” cryptocurrency) को लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ-साथ सरकारें भी समय-समय पर एडवाइजरी ज़ारी करती रहती हैं।
  • एक ‘नॉन-फिएट’ क्रिप्टोकरेंसी जैसे कि बिटकॉइन, एक निजी क्रिप्टोकरेंसी है। जबकि ‘फिएट क्रिप्टोकरेंसी’ एक डिजिटल मुद्रा है जो देश के केद्रीय बैंक द्वारा जारी किया जाता है।
  • “नॉन-फिएट” क्रिप्टोकरेंसी को लेकर तमाम तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं और यह तकनीकी उन्नयन विनाशकारी साबित हो सकता है।
  • यदि भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा कोई आभासी मुद्रा जारी की जाती है, तो उसे फ़िएट क्रिप्टो-करेंसी कहा जाएगा।
  • उल्लेखनीय है कि सभी क्रिप्टो-करेंसी बिटकॉइन नहीं हैं, जबकि सभी बिटकॉइन क्रिप्टो-करेंसी हैं। बिटकॉइन (bitcoin), एथ्रॉम (ethereum) और रिप्पल (ripple) कुछ लोकप्रिय क्रिप्टो-करेंसी हैं।

क्रिप्टोकरेंसी की लोकप्रियता के कारण 
निजता बनाए रखने में मददगार: 

  • क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिये लेन-देन के दौरान छद्म नाम एवं पहचान बताए जाते हैं। ऐसे में अपनी निजता को लेकर अत्यधिक संवेदनशील व्यक्तियों को यह माध्यम उपयुक्त जान पड़ता है।

एक लागत-प्रभावी विकल्प:

  • क्रिप्टोकरेंसी में लेन-देन संबंधी लागत अत्यंत ही कम है। धरेलू हो या अंतर्राष्ट्रीय किसी भी लेन-देन की लागत एक समान ही होती है।
  • क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिये होने वाले लेन-देन में ‘थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन’ (third party certification) की आवश्यकता नहीं होती। अतः धन एवं समय दोनों की बचत होती है।

न के बराबर हैं प्रवेश जनक बाधाएँ:

  • गौरतलब है कि बैंक में अकाउंट खोलने से लेकर लगभग सभी लेन-देन के लिये कई तरह के प्रमाण पत्रों की ज़रूरत होती है, जबकि क्रिप्टोकरेंसी के मामले में ऐसा नहीं है।
  • वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले लेन-देन के लिये भी कई तरह की औपचारिकताओं से गुज़रना होता है, जबकि क्रिप्टोकरेंसी से होने वाले लेन-देन में इन बातों का संज्ञान नहीं लिया जाता है।

पारंपरिक बैकिंग व्यवस्था का एक विकल्प: 

  • बैंकिंग प्रणालियों तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले लेन-देन पर सरकार का सख्त नियंत्रण होता है।
  • वहीं क्रिप्टोकरेंसी उपयोगकर्त्ताओं को राष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाहर धन के आदान-प्रदान का एक विश्वसनीय और सुरक्षित माध्यम प्रदान करता है।

ओपन सोर्स पद्धति:

  • गौरतलब है कि अधिकांश क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म ओपन सोर्स पद्धति पर आधारित होते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स के सॉफ्टवेयर कोड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहते हैं।
  • इसका प्रभाव यह होता है कि क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफार्म में लगातार सुधार की संभावनाएँ बनी रहती हैं। 

वित्तीय दंड से सुरक्षा:

  • विदित हो कि सरकारों के पास बैंक खाते को फ्रीज या जब्त करने का अधिकार है, लेकिन क्रिप्टोकरेंसी के मामले में वे ऐसा नहीं कर सकती हैं।
  • अतः सरकार के नियंत्रण से बचाव के एक प्रभावकारी विकल्प के रूप में भी क्रिप्टोकरेंसी का प्रयोग किया जा रहा है।

क्रिप्टोकरेंसी का प्रचलन खतरनाक क्यों?
एक असुरक्षित मुद्रा:

  • क्रिप्टोकरेंसी की सम्पूर्ण व्यवस्था के ऑनलाइन होने के कारण इसकी सुरक्षा कमज़ोर हो जाती है और इसके हैक होने का खतरा बना रहता है।
  • क्रिप्टोकरेंसी की सबसे बड़ी समस्या है इसका ऑनलाइन होना और यही कारण है कि क्रिप्टोकरेंसी को एक असुरक्षित मुद्रा माना जा रहा है। 

देश की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: 

  • यह ‘मुख्य वित्तीय सिस्टम’ और ‘बैंकिंग प्रणाली’ से बाहर रहकर काम करती है। यही कारण है कि इसके स्रोत और सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहते हैं।
  • इस डिजिटल मुद्रा को फ्रॉड, हवाला मनी और आतंकी गतिविधियों को पोषित करने वाली मुद्रा के रूप में संबोधित किया जाता रहा है। 

नियंत्रण एवं प्रबन्धन की समस्या:

  • क्रिप्टो-करेंसी से संबंधित एक बड़ी समस्या इसके नियंत्रण एवं प्रबंधन की भी है। भारत जैसे कई देशों ने अभी तक इसे मुद्रा के रूप में स्वीकृति प्रदान नहीं की है, ऐसे में इसका प्रबंधन एक बड़ी समस्या है।
  • आर्थिक जानकारों का भी मानना है कि इसकी तकनीकी जानकारी रखे बिना इसमें निवेश करने के भारी दुष्परिणाम हो सकते हैं।

पर्यावरणीय चिंताएँ: 

  • गौरतलब है कि प्रत्येक बिटकॉइन लेन-देन के लिये लगभग 237 किलोवाट बिजली की खपत होती है और इससे प्रतिघंटा लगभग 92 किलो कार्बन का उत्सर्जन होता है।
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