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उत्तर भारत में दुनिया की सबसे खराब हवा के कारण

  • 03 May 2018
  • 7 min read

चर्चा में क्यों ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी वायु प्रदूषण पर एक नई वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया  है कि 2016 में PM 2.5 प्रदूषण के उच्चतम स्तर वाले 15 शहरों में से 14 भारत में थे। ये 14 शहर उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम तक एक बड़े हिस्से में फैले हुए हैं। 15वाँ शहर कुवैत का अली सुबह-अल-सलेम था। प्रभावी रूप से, नई डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट राजस्थान और कश्मीर घाटी के साथ-साथ दुनिया में सबसे खराब हवा के क्षेत्र के रूप में गंगा के मैदानी क्षेत्र की पहचान करती है। इस सूची में दुनिया के 20 शहर शामिल थे।

सबसे प्रदूषित भारतीय शहर

  • इस लिस्ट में शामिल शहरों में से दिल्ली, आगरा और कानपुर उच्च स्तरीय वायु प्रदूषण वाले शहर माने जाते हैं, जबकि वाराणसी, गया, श्रीनगर में प्रदूषणकारी उद्योगों का उच्च संकेंद्रण नहीं है और न ही इन शहरों में प्रदूषण के सामान्य स्रोत माने जाने वाले वाहनों का आधिक्य है फिर भी इन शहरों में पीएम 2.5 का उच्च स्तर पाया गया है।
रैंक शहर  पीएम 2.5 का स्तर
1. कानपुर  173
2. फरीदाबाद  172
3. वाराणसी  151
4. गया 149
5. पटना  144
6. दिल्ली  143
7. लखनऊ 138
8. आगरा  131
9. मुजफ्फरपुर  120
10. श्रीनगर  113
11. गुरुग्राम  113
12. जयपुर 105
13. पटियाला  101
14. जोधपुर 98

प्रदूषण में वृद्धि के कारण

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले लगभग एक दशक से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में पर्टिकुलेट मैटर में लगातार वृद्धि हो रही है और इसके बारे में समय-समय पर जानकारी भी दी गई है। अतः इस रिपोर्ट में कुछ भी  नया या आश्चर्यजनक नहीं है।
  • यहाँ तक कि सैटेलाइटों से लिये गए चित्र भी यह दर्शाते हैं कि गंगा का मैदानी क्षेत्र वायु प्रदूषण के बड़े हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहा है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का मैदान भी एक विशाल घाटी की तरह ही है, जो उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विंध्य श्रेणी के बीच में स्थित है। अतः यहाँ से प्रदूषक बहुत दूर तक नहीं जा पाते, जिससे यहाँ इनकी सांद्रता बढ़ रही है।
  • यह क्षेत्र दुनिया में सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों  में से एक है। इस क्षेत्र की आबादी 600 मिलियन से भी अधिक है। अतः इतनी बड़ी जनसंख्या की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बड़े स्तर पर ईंधन का दहन होता है, जिससे हवा में बड़ी मात्रा में प्रदूषक और पर्टिकुलेट मैटर मुक्त होते हैं।
  • यह भूमि आबद्ध क्षेत्र है एवं इसे मुंबई और चेन्नई जैसे तट का लाभ प्राप्त नहीं है। अतः यहाँ से प्रदूषण का शीघ्रता से समाप्त होना संभव नहीं है।
  • इसके अलावा यहाँ के बहुत से छोटे शहरों में अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति खराब है, बड़ी मात्रा में ठोस ईंधन जलाया जाता है, लोग गैर-मोटर चालित वाहनों के बजाय मोटर चालित वाहनों का अधिक उपयोग करने लगे हैं।
  • लेकिन लिस्ट में शामिल गया और मुज़फ्फरपुर जैसे शहरों में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ने के अलग कारण हो सकते हैं। मसलन, यहाँ पर वर्ष के अधिकांश समय मुख्यतः हवा की दिशा उत्तर-पश्चिम से पूर्व की ओर होती है और यह सर्दियों के दौरान और अधिक तेज़ी से बहती है। परिणामस्वरूप यह अन्यत्र उत्पन्न प्रदूषण को भी अपने साथ इन क्षेत्रों में ले आती है।
  • यहाँ तक कि दिल्ली में पाए जाने वाले सभी प्रदूषक भी वहाँ पैदा नहीं होते, बल्कि अन्य स्थानों से यहाँ पहुँचते हैं।
  • पूर्व में प्रकाशित किये गए कई शोध-पत्रों में दर्शाया गया है कि कानपुर में पाए गए 60 प्रतिशत से अधिक प्रदूषक कहीं और उत्पन्न हुए थे।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा के क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद प्रदूषक फँस कर रह जाते हैं और इसी क्षेत्र में निलंबित रहते हैं।
  • गया और मुज़फ्फरपुर में पाए गए अधिकांश प्रदूषक तत्त्व ऊपरी राज्यों से हवा के साथ बहकर आए थे।
  • जैसे-जैसे ये प्रदूषक पश्चिम से पूर्व की ओर जाते हैं, वैसे-वैसे इनका आकार और द्रव्यमान बढ़ने लगता है एवं उद्योगों या वाहनों से निकलने वाली गैसें भी संघनित होकर कणों में परिवर्तित हो जाती हैं जिससे प्रदूषकों की सांद्रता बढ़ती जाती है।
  • इस क्षेत्र में आर्द्रता का उच्च स्तर द्वितीयक एयरोसोल के गठन हेतु बेहद अनुकूल दशाएँ उत्पन्न करता है।

आगे की राह

  • हालाँकि, उत्तर भारत ही ऐसी भौगोलिक दशाओं वाला एकमात्र क्षेत्र नहीं है। दुनिया में कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ की दशाएँ कमोबेश ऐसी ही हैं। लेकिन उन स्थानों पर वहाँ की सरकारों द्वारा कड़े क़ानून लागू किये गए जिनसे प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण पाया गया है।
  • उदाहरणस्वरूप, अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया को लिया जा सकता है, जहाँ की दशाएँ प्रदूषण के निर्माण हेतु अनुकूल हैं। लेकिन यह अमेरिका का पहला राज्य था, जिसने 1940 के दशक में प्रदूषण विरोधी कानून लागू किया था।
  • भारत को भी ऐसे कड़े उपाय अपनाने की आवश्यकता है।
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