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राजद्रोह पर पुनर्विचार .

  • 31 Aug 2018
  • 3 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विधि आयोग ने राजद्रोह के संबंध में एक परामर्श पत्र प्रकाशित किया है जिसमें देशद्रोह के प्रावधानों पर पुनर्विचार करने को कहा गया है।

प्रमुख बिंदु

  • विधि आयोग ने अपने परामर्श पत्र में कहा है कि एक जीवंत लोकतंत्र में सरकार के प्रति असहमति और उसकी आलोचना सार्वजनिक बहस का प्रमुख तत्त्व है। 
  • इस संदर्भ में आयोग ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A, जिसके अंतर्गत राजद्रोह का प्रावधान किया गया है, पर पुनः विचार करने या रद्द करने का समय आ गया है।
  • आयोग ने इस बात पर विचार करते हुए कि मुक्त वाक् एवं अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतंत्र का एक आवश्यक घटक है, के साथ "धारा 124A को हटाने या पुनर्परिभाषित करने के लिये सार्वजनिक राय आमंत्रित की है। 
  • पत्र में कहा गया है कि भारत को राजद्रोह के कानून को क्यों बरकरार रखना चाहिये जबकि इसकी शुरुआत अंग्रेज़ों ने भारतीयों के दमन के लिये की थी और उन्होंने अपने देश में इस कानून को समाप्त कर दिया है। उल्लेखनीय है कि राजद्रोह के तहत तीन वर्ष से लेकर राजद्रोह का प्रावधान किया गया है।
  • इस तरह आयोग ने कहा कि राज्य की कार्रवाईयों के लिये असहमति की अभिव्यक्ति को राजद्रोह के रूप में नहीं माना जा सकता है।
  • एक ऐसा विचार जो कि सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं है,  की अभिव्यक्ति मात्र से व्यक्ति पर राजद्रोह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। गौरतलब है कि अपने इतिहास की आलोचना करने और प्रतिकार करने का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत सुरक्षित है।
  • राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करना आवश्यक है, लेकिन इसका दुरपयोग स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर नियंत्रण स्थापित करने के उपकरण के रूप में नहीं किया जाना चाहिये।
  • आयोग ने कहा कि लोकतंत्र में एक ही पुस्तक से गीतों का गायन देशभक्ति का मापदंड नहीं है। लोगों को उनके अनुसार देशभक्ति को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिये।
  • अनुचित प्रतिबंधों से बचने के लिये मुक्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों को सावधानी पूर्वक जाँच करनी चाहिये।
  • किंतु आयोग ने कहा है कि यदि न्यायालय की अवमानना के संदर्भ में सज़ा का प्रावधान है तो सरकार की अवमानना के संदर्भ में क्यों नहीं होना चाहिये?
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