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भारतीय राजनीति

केंद्र सरकार बनाम कॉलेजियम व्यवस्था

  • 10 May 2019
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिये कॉलेजियम (Collegium) ने दो जजों की सिफारिश की थी किंतु केंद्र सरकार ने उनके नामों पर आपत्ति दर्ज कराई। जवाब में कॉलेजियम ने केंद्र सरकार की आपत्तियों को खारिज कर दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • 12 अप्रैल को कॉलेजियम की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिये झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए.एस. बोपन्ना के नामों की सिफारिश की गई थी।
  • केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की ओर से भेजे गए उच्च न्यायालय के इन दो न्यायाधीशों के नामों पर आपत्ति दर्ज़ कराते हुए वरिष्ठता के आधार पर इन नामों पर दोबारा विचार करने को कहा था।
  • जवाब में कॉलेजियम का कहना है कि जज नियुक्त करते समय हालाँकि वरिष्ठता को ध्यान में रखना चाहिये किंतु योग्यता को वरीयता मिलनी चाहिये।
  • कॉलेजियम ने कहा कि सरकार से सहमत होने का कोई कारण नहीं है क्योंकि दोनों न्यायाधीशों के आचरण एवं योग्यता में कुछ भी प्रतिकूल नहीं पाया गया और सभी मापदंडों पर विचार किये जाने के बाद उनके नामों की सिफारिश की गई थी।
  • इस प्रकार कॉलेजियम की तरफ से केंद्र की दलील खारि कर दी गई और दोबारा जस्टिस बोस एवं जस्टिस बोपन्ना का नाम भेजा गया।
  • साथ ही सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिये दो अन्य न्यायाधीश, बॉम्बे हाईकोर्ट के जज बी. आर. गवई और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का नाम भी भेजा गया।
  • ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय में इस वक्त 27 जज हैं, जबकि 31 जजों के पद स्वीकृत हैं। अगर इन चारों न्यायाधीशों के नामों पर सहमति बन जाती है तो जजों की अधिकतम संख्या पूरी हो जाएगी।
  • उल्लेखनीय है कि भारत के मूल संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, “भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा एवं इसके मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 7 अन्य न्यायाधीश होंगे और जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती तब तक संख्या यही रहेगी।“
  • संसद द्वारा समय-समय पर इस संख्या को बढाया गया एवं वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में 31 न्यायाधीश पद स्वीकृत हैं जिनमे से 1 मुख्य न्यायाधीश एवं 30 अन्य न्यायाधीश शामिल है।

क्या है कॉलेजियम व्यवस्था ?

देश की अदालतों में जजों की नियुक्ति की प्रणाली को कॉलेजियम व्यवस्था कहा जाता है।

  • 1990 में सर्वोच्च न्यायालय के दो फैसलों के बाद यह व्यवस्था बनाई गई थी। कॉलेजियम व्यवस्था के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में बनी वरिष्ठ जजों की समिति जजों के नाम तथा नियुक्ति का फैसला करती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
  • हाईकोर्ट के कौन से जज पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
  • उल्लेखनीय है कि कॉलेजियम व्यवस्था का उल्लेख न तो मूल संविधान में है और न ही उसके किसी संशोधन प्रावधान में।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)

  • गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले के लिये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम बनाया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
  • वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया था कि ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ अपने वर्तमान स्वरूप में न्यायपालिका के कामकाज में एक हस्तक्षेप मात्र है।
  • उल्लेखनीय है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाले इस आयोग की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश को करनी थी। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्रीय विधि मंत्री और दो जानी-मानी हस्तियाँ भी इस आयोग का हिस्सा थीं।
  • आयोग में जानी-मानी दो हस्तियों का चयन तीन सदस्यीय समिति को करना था, जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल थे।
  • आयोग के संबंध में एक दिलचस्प बात यह थी कि अगर आयोग के दो सदस्य किसी नियुक्ति पर सहमत नहीं हुए तो आयोग उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफ़ारिश नहीं करेगा।
  • गौरतलब है कि शीर्ष न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में व्यापक पारदर्शिता लाने की बात हमेशा से होती रही है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है और शीर्ष न्यायालयों में न्यायाधीशों के बहुत से पद रिक्त हैं।

स्रोत: द हिंदू

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