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सार्वजनिक उपक्रमों को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता से छूट

  • 05 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) नियम, 1957, न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता, आईपीओ 

मेन्स के लिये:

सार्वजनिक उपक्रमों को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता से छूट संबंधी प्रावधान का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

वित्त मंत्रालय ने सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंड से छूट देने के लिये प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) नियम, 1957 में संशोधन किया है।

प्रमुख बिंदु:

संशोधन:

  • सरकार अब किसी भी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (एमपीएस) मानदंड से छूट दे सकती है, जो सभी सूचीबद्ध संस्थाओं के लिये कम-से-कम 25% सार्वजनिक फ्लोट को अनिवार्य करता है।

नए संशोधन का औचित्य:

  • बड़ी कंपनियों के लिये आईपीओ लॉन्च करना आसान बनाने के लिये एमपीएस के ढाँचे को संशोधित किया गया है।
  • यह कदम तब उठाया गया है जब सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के आईपीओ की तैयारी कर रही है, जो अब तक की सबसे बड़ी लिस्टिंग होगी।

चिंताएँ:

  • पीएसयू शेयरों में तरलता को प्रभावित कर सकता है:
    • निवेशक विशेष रूप से विदेशी, तरलता की कमी के कारण ऐसे शेयरों में निवेश करने से सावधान रहते हैं- उच्च प्रमोटर होल्डिंग के कारण।
  • विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकता है:
    • सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा न्यूनतम सार्वजनिक फ्लोट का रखरखाव उच्च विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में मदद करता है और MSCI (मॉर्गन स्टेनली कैपिटल इंटरनेशनल) तथा FTSE (फाइनेंशियल टाइम्स स्टॉक एक्सचेंज) जैसे अंतर्राष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का वज़न बढ़ाता है।
    • इन मानदंडों का पालन नहीं करने वाली सरकारी कंपनियाँ विदेशी पूंजी के प्रवाह पर दबाव डाल सकती हैं।
  • सामरिक विनिवेश कार्यक्रम को प्रभावित कर सकता है:
    • यह उस समय हानिकारक हो सकता है जब सरकार बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन और एयर इंडिया सहित विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों में रणनीतिक बिक्री की योजना बना रही है।
    • ‘लो फ्री फ्लोट’ का एक कारण पीएसयू शेयरों का बाज़ार में कम मूल्यांकन है।
  • गैर-समान शासन मानक:
    • विभिन्न सरकारी विशेषज्ञ समितियों ने अपनी रिपोर्ट में तर्क दिया है कि सभी सूचीबद्ध संस्थाओं, सरकारी या निजी को शासन मानकों के समान माना जाना चाहिये।

न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MSP):

  • MSP के बारे में:
    • MPS (जिसे फ्री फ्लोट भी कहा जाता है) नियम के लिये भारत में सभी सूचीबद्ध कंपनियों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उनके इक्विटी शेयरों का कम-से-कम 25% गैर-प्रवर्तकों, अर्थात् जनता के पास है।
    • सार्वजनिक शेयरधारक व्यक्तिगत या वित्तीय संस्थान हो सकते हैं और वे आमतौर पर सार्वजनिक पेशकश या द्वितीयक बाज़ारों के माध्यम से शेयरों की खरीद करते हैं।
    • न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता की अवधारणा सूचीबद्ध कंपनियों के कामकाज में अधिक पारदर्शिता लाने हेतु पेश की गई थी।
      • वर्ष 2010 में सेबी ने निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिये 25% सार्वजनिक फ्लोट पर ज़ोर देने हेतु प्रतिभूति अनुबंध विनियमन नियमों में संशोधन किया।
    • भारत में औसत प्रमोटर होल्डिंग (Promoter Holding) वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा है।
      • वर्ष 2019-20 के बजट में सरकार ने न्यूनतम सार्वजनिक फ्लोट (Minimum Public Float) को 25% से बढ़ाकर 35% करने का प्रस्ताव किया था।
  • अनुपालन की स्थिति:
    • सूचीबद्ध कंपनियों के लिये 25% MPS प्राप्त करने की समय-सीमा वर्ष 2013 तक निर्धारित की गई थी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों अर्थात्  PSU और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) हेतु समय-सीमा के अनुपालन के लिये ऐसी कंपनियों के प्रयासों की कमी के कारण समय-सीमा को कई बार बढ़ाया गया था।
      • पिछले ऐसे विस्तार हेतु उन्हें अनुपालन के लिये 2 अगस्त, 2021 तक का समय दिया गया था।
    • नवीनतम संशोधन के साथ केंद्र सरकार ने चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को 25% MPS मानदंड से छूट देने का अधिकार दिया है।
  • महत्त्व:
    • यह एक सूचीबद्ध कंपनी में फ्री फ्लोट ट्रेडिंग स्टॉक में पर्याप्त तरलता प्रदान करने हेतु आवश्यक है जिससे उचित मूल्य और बाज़ार की एकता को बनाए रखने में सुविधा हो।
    • पब्लिक फ्लोट यह सुनिश्चित करता है कि स्टॉक की कीमतों में कम हेरफेर हो।
    • सूचीबद्ध कंपनियों पर अपनी पकड़ कम करने के लिये प्रवर्तकों को मजबूर कर व सार्वजनिक शेयरधारकों और संस्थानों को कॉर्पोरेट कार्यों में अधिक-से-अधिक हिस्सेदारी देकर कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार किया जा सकता है।
      • शेयर बाज़ार में निवेश के बहुत कम अवसर विद्यमान हैं और इसलिये  प्रमोटरों को शेयर बेचने के लिये मजबूर करने से शेयरों की आपूर्ति में सुधार होगा।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड

  • सेबी, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के तहत अप्रैल 1992 में स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड का मूल कार्य प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना और प्रतिभूति बाज़ार को बढ़ावा देना एवं विनियमित करना है।

सूचीबद्ध कंपनियाँ

  • ‘सूचीबद्ध कंपनियों’ का आशय ऐसी कंपनी से है जो किसी विशिष्ट स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होती है ताकि उसके स्टॉक का कारोबार किया जा सके।

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम (CPSE)

  • ‘केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम’ (CPSE) का आशय इन कंपनियों से है, जिनमें केंद्र सरकार या अन्य CPSEs की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी 51% या उससे अधिक होती है।
  • 31 मार्च, 2019 तक कुल 348 ‘केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम’ (बीमा कंपनियों को छोड़कर) थे। इनमें से 86 उद्यमों ने अब तक वाणिज्यिक परिचालन शुरू नहीं किया था, जबकि 13 CPSEs परिसमापन के अधीन हैं। शेष 249 उद्यम अभी भी संचालित हैं।

प्रवर्तक

  • कंपनी अधिनियम, 2013 और सेबी (ICDR) विनियम, 2018 में 'प्रवर्तक' एवं 'प्रवर्तक समूह' को परिभाषित किया गया है।
  • प्रायः प्रवर्तक किसी विशिष्ट स्थान पर एक विशेष व्यवसाय स्थापित करने के लिये विचार की कल्पना करता है और कंपनी शुरू करने के लिये आवश्यक विभिन्न औपचारिकताओं को पूरा करता है।

प्राथमिक बाज़ार और द्वितीयक बाज़ार

  • प्राथमिक बाज़ार वह है जहाँ प्रतिभूतियों का सृजन किया जाता है, जबकि द्वितीयक बाज़ार वह होता है जहाँ निवेशकों द्वारा उन प्रतिभूतियों का कारोबार किया जाता है।
  • प्राथमिक बाज़ार में कंपनियाँ पहली बार जनता को नए स्टॉक और बॉण्ड बेचती हैं, जैसे कि प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (IPO)।
  • द्वितीयक बाज़ार मूल रूप से शेयर बाज़ार है, जैसे- न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज आदि।

स्टॉक तरलता

  • तरलता आम तौर पर यह संदर्भित करती है कि द्वितीयक बाज़ार में स्टॉक को कितनी आसानी से या जल्दी से खरीदा या बेचा जा सकता है। तरल निवेश को ज़रूरत पड़ने पर बिना किसी भारी शुल्क के आसानी से बेचा जा सकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

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