हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स

जैवविविधता और पर्यावरण

नेट ज़ीरो कार्बन लक्ष्य और जलवायु परिवर्तन : ऑक्सफैम रिपोर्ट

  • 05 Aug 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये

ऑक्सफैम इंटरनेशनल, नेट ज़ीरो कार्बन लक्ष्य, अमेज़न वर्षावन, फिट फॉर 55

मेन्स के लिये

नेट  ज़ीरो बनाम जलवायु परिवर्तन, कार्बन सिंक की चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ऑक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट (टाइटनिंग द नेट) के अनुसार, नेट  ज़ीरो कार्बन टारगेट की घोषणा करना कार्बन उत्सर्जन में कटौती की प्राथमिकता से एक खतरनाक भटकाव हो सकता है।

  • न्यूज़ीलैंड, यूके, यूएस, चीन तथा यूरोपीय संघ जैसे कई देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर शुद्ध-शून्य लक्ष्य निर्धारित किये हैं।
  • रिपोर्ट में ज़ोर दिया गया है कि उत्सर्जन में कमी को उत्सर्जन में कटौती का विकल्प नहीं माना जा सकता है।
  • ऑक्सफैम इंटरनेशनल वर्ष 1995 में गठित स्वतंत्र गैर-सरकारी संगठनों का एक समूह है।

प्रमुख बिंदु

नेट  ज़ीरो:

  • नेट  ज़ीरो यानी कार्बन तटस्थता राज्य वह है जिसमें किसी देश के उत्सर्जन की खपत वातावरण से ग्रीनहाउस गैसों के अवशोषण और निष्कासन से होती है।
    • इसका मतलब यह नहीं है कि कोई देश अपने उत्सर्जन को शून्य पर लाएगा। यह ग्रॉस  ज़ीरो होगा, जिसका अर्थ है कि ऐसे राज्य में पहुँचाना जहाँ बिल्कुल भी उत्सर्जन न हो अर्थात् एक ऐसा परिदृश्य जिसे सुलझाना मुश्किल है।
  • यह कार्बन सिंक बनाने का एक तरीका है जिसके द्वारा कार्बन को अवशोषित किया जा सकता है। इस तरह किसी देश के लिये नकारात्मक उत्सर्जन होना भी संभव है, अगर अवशोषण और निष्कासन वास्तविक उत्सर्जन से अधिक हो।
    • कुछ समय पूर्व तक दक्षिण अमेरिका में अमेज़न वर्षावन, जो दुनिया के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय वन हैं, कार्बन सिंक थे। लेकिन इन जंगलों के पूर्वी हिस्सों  के  महत्त्वपूर्ण वनोन्मूलन के परिणामस्वरूप इन्होंने कार्बन उत्सर्जन को अवशोषित करने के बजाय CO2 का उत्सर्जन करना शुरू कर दिया है।
    • भूटान पहले से ही कार्बन नकारात्मक देश है अर्थात् यह CO2  के  उत्सर्जन की तुलना में अधिक अवशोषण करता है।

जिन देशों ने शुद्ध शून्य लक्ष्यों की घोषणा की है (कुछ उदाहरण):

  • यह यूरोपीय संघ की एक योजना है, जिसे कार्बन तटस्थता लक्ष्य प्रदान करने के लिये "फिट फॉर 55" कहा जाता है।
  • चीन ने यह भी घोषणा की कि वह वर्ष 2060 तक शुद्ध शून्य स्थिति प्राप्त लेगा और साथ ही अपने उत्सर्जन को 2030 के स्तर से अधिक नहीं होने देगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपना शुद्ध शून्य उत्सर्जन (NZE) रोडमैप जारी किया है, जिसका नाम 'नेट ज़ीरो बाय 2050' है।

रिपोर्ट के निष्कर्ष:

  • ऊर्जा क्षेत्र के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिये एक बहुत बड़े क्षेत्र की आवश्यकता है:
    • यदि संपूर्ण ऊर्जा क्षेत्र जिसका उत्सर्जन बढ़ता रहता है- समान 'शुद्ध शून्य' लक्ष्य निर्धारित करता है, तो उसे दुनिया भर में सभी कृषि भूमि के एक-तिहाई के बराबर अमेज़न वर्षावन के आकार की भूमि की आवश्यकता होगी।
  • अधिक वनों की आवश्यकता:
    • यदि परिवर्तन की चुनौती का समाधान केवल अधिक-से-अधिक पेड़ लगाकर किया जाता है, तो वर्ष 2050 तक दुनिया से अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन को दूर करने के लिये लगभग 1.6 बिलियन हेक्टेयर नए वनों की आवश्यकता होगी।
  • भूमि आधारित तरीके खाद्य संकट बढ़ा सकते हैं:
    • वर्तमान में उत्सर्जन में कटौती करने की देशों की योजना से वर्ष 2030 तक केवल 1% की कमी आएगी।
    • गौरतलब है कि अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये केवल भूमि आधारित तरीकों (वनीकरण) का इस्तेमाल किया जाए तो खाद्य संकट और भी बढ़ने की आशंका है। ऑक्सफैम का अनुमान है कि यह वर्ष 2050 तक 80% तक बढ़ सकता है।
  • उत्सर्जन में उल्लेखनीय कटौती की आवश्यकता:
    • ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर से नीचे सीमित करने और जलवायु परिवर्तन से अपरिवर्तनीय क्षति को रोकने हेतु वैश्विक स्तर पर सामूहिक रूप से प्रयास किया जाना चाहिये तथा सबसे बड़े उत्सर्जकों द्वारा तेज़ी के साथ वर्ष 2030 तक उत्सर्जन को वर्ष 2010 के स्तर से 45% की कटौती करने का लक्ष्य रखना चाहिये।

विश्लेषण (नेट-ज़ीरो बनाम जलवायु परिवर्तन):

  • 'नेट ज़ीरो' 'सबसे बड़े उत्सर्जक' की ज़िम्मेदारी को कम करता है:
    • कई सरकारें और कंपनियांँ शुद्ध शून्य जलवायु लक्ष्यों को अपना रही हैं क्योंकि वे जलवायु संकट की तात्कालिकता को पहचानती हैं।
    • हालांँकि एक  स्पष्ट परिभाषा के बिना ये लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिये कम आय वाले देशों में भूमि के विशाल क्षेत्रों का उपयोग करने के जोखिम पर निर्भर करते हैं, जिससे सबसे बड़े उत्सर्जक अपने स्वयं के उत्सर्जन में महत्त्वपूर्ण कटौती करने से बचते हैं।
  • ज़मीन की मांग बढ़ने की संभावना:
    • यह भूमि की मांग को और अधिक तीव्र कर सकता है, यदि सावधानीपूर्वक सुरक्षा उपायों को नहीं अपनाया गया है, तो भुखमरी व भूमि असमानता का जोखिम और अधिक बढ़ सकता है। 

आगे की राह: 

  • ग्रीनवाश/स्वच्छ और हरित कार्रवाइयों के स्थान पर शुद्ध शून्य वास्तविक व परिवर्तनकारी जलवायु कार्रवाई को अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान में कार्बन उत्सर्जन को कम करने की आवश्यकता है और भूमि आधारित जलवायु समाधान 'खाद्य-पहले' दृष्टिकोण पर ध्यान  केंद्रित करना चाहिये ताकि शून्य उत्सर्जन एवं शून्य भूख दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिल सके।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस  

एसएमएस अलर्ट
Share Page