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सामाजिक न्याय

गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994

  • 02 May 2023
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये: गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994, प्रसव पूर्व निदान तकनीक

मेन्स के लिये: प्रसवपूर्व निदान और लिंग-चयनात्मक गर्भपात से संबंधित नैतिक एवं कानूनी मुद्दे, गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के प्रावधान, उद्देश्य, भारत में लिंग-चयन गर्भपात के अभ्यास को रोकने में इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है कि PCPNDT के प्रभावी कार्यान्वयन के लिये गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques- PCPNDT) अधिनियम के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार किये जाने की आवश्यकता है।

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निर्देश PCPNDT अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द करने की मांग करने वाले व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

PCPNDT अधिनियम:

  • परिचय:
    • गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम है जिसे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और भारत में गिरते लिंगानुपात को रोकने, प्रसवपूर्व लिंग चयन को प्रतिबंधित करने लिये अधिनियमित किया गया था।
  • उद्देश्य:
    • इस अधिनियम को लागू करने का मुख्य उद्देश्य गर्भाधान से पहले अथवा बाद में लिंग चयन तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना और लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना है।
  • प्रावधान:
    • यह अल्ट्रासाउंड मशीन जैसे- प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के उपयोग को विनियमित करता है और इस प्रकार की मशीनों को केवल आनुवंशिक असामान्यताओं, चयापचय संबंधी विकार, क्रोमोसोमल असामान्यताओं, कुछ जन्मजात विकृतियों, हीमोग्लोबिनोपैथी तथा लिंग संबंधी विकार का पता लगाने के लिये उपयोग में लाने की अनुमति देता है।
    • भ्रूण के लिंग का पता लगाने के उद्देश्य से प्रयोगशाला या केंद्र अथवा क्लिनिक अल्ट्रासोनोग्राफी सहित कोई परीक्षण किया जाना निषिद्ध है।
    • अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकों के प्रयोग से व्यक्ति द्वारा गर्भवती महिला अथवा उसके रिश्तेदारों को शब्दों, संकेतों अथवा किसी अन्य तरीके से भ्रूण के लिंग की जानकारी देना निषिद्ध है।
    • कोई भी व्यक्ति जो नोटिस, सर्कुलर, लेबल अथवा किसी दस्तावेज़ के रूप में प्रसवपूर्व और गर्भधारण पूर्व लिंग चयन संबंधी सुविधाओं का विज्ञापन देता है या फिर इलेक्ट्रॉनिक अथवा प्रिंट रूप में अन्य मीडिया के माध्यम से विज्ञापित करता है, ऐसे व्यक्ति, संस्थान या केंद्र के संचालक को तीन वर्ष तक की कैद हो सकती है और 10,000 रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराध:
    • इस अधिनियम के तहत अपंजीकृत स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसवपूर्व निदान तकनीकों का उपयोग करना एक अपराध है।
    • इस अधिनियम के तहत लिंग चयन निषिद्ध है।
    • इस अधिनियम में निर्दिष्ट उद्देश्य के अतिरिक्त किसी अन्य उद्देश्य के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीक का इस्तेमाल करना अपराध है।
    • इस अधिनियम के तहत किसी भी अल्ट्रासाउंड मशीन अथवा भ्रूण लिंग का पता लगाने में सक्षम किसी भी अन्य उपकरण की बिक्री, वितरण, आपूर्ति, किराए पर लेना आदि निषिद्ध है।

लिंग-चयनात्मक गर्भपात के खिलाफ पहल:

  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ:
    • यह अभियान भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015 में शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य लिंग आधारित चयन पर रोकथाम, बालिकाओं के अस्तित्त्व और सुरक्षा को सुनिश्चित करना तथा बालिकाओं के लिये शिक्षा की उचित व्यवस्था तथा उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के संबंध में जागरूकता का प्रसार करना है।
  • बच्चों के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना, 2016:
    • यह बच्चों के अधिकारों और कल्याण के लिये प्रमुख प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक के रूप में लिंग-पक्षपाती लिंग चयन के उन्मूलन की दिशा में कार्य करता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की चिंता का विषय:

  • छापे और बरामदगी में पुलिस की भागीदारी की व्यावहारिकता:
    • न्यायालय ने कहा कि हालाँकि PCPNDT नियमों में इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि “जहाँ तक संभव हो” पुलिस छापेमारी, जब्ती आदि में शामिल न हो, लेकिन इस पहलू की व्यावहारिकता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि ऐसी कार्रवाई सुविधा केंद्रों/क्लीनिकों पर छापे मारने के लिये CrPC के अनुसार होनी चाहिये"।
  • जाँच और गिरफ्तारी की शक्तियाँ:
    • न्यायालय ने पाया कि यद्यपि उपयुक्त प्राधिकारी को PCPNDT अधिनियम का उल्लंघन करने वाले चिकित्सा केंद्रों और सुविधाओं के पंजीकरण की जाँच करने तथा छापेमारी, रद्द या निलंबित करने की शक्तियाँ दी गई हैं, लेकिन उसके पास इस अधिनियम के तहत किसी को भी गिरफ्तार करने की शक्ति नहीं है
      • इस अधिनियम के तहत अपराधों को 'संज्ञेय' बनाया गया है, जिसका अर्थ है कि पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।
      • हालाँकि न्यायालय ने अधिनियम को लागू करने में उपयुक्त प्राधिकरण की भूमिका की प्रभावशीलता के बारे में चिंता जताई क्योंकि उसके पास गिरफ्तारी की शक्ति नहीं है।
  • सज़ा की कम दर:
    • कम दोष सिद्धि दर उन मामलों के प्रतिशत को संदर्भित करती है जिनमें अभियुक्त दोषी पाए जाते हैं और उस अपराध हेतु दोषी पाए जाते हैं जिसके लिये उन्हें आरोपित किया गया था।
    • PCPNDT अधिनियम के संदर्भ में इसका मतलब है कि वास्तव में अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिये दोषी ठहराए गए लोगों की संख्या बहुत कम है।
      • यह अपराधियों पर प्रभावी ढंग से मुकदमा चलाने और लिंग-चयन गर्भपात के अवैध अभ्यास को रोकने के लिये न्याय प्रणाली की विफलता को इंगित करता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी के निहितार्थ:

  • पुलिस की जाँच और गिरफ्तारी की शक्तियों पर स्पष्टता:
    • न्यायालय द्वारा उठाई गई चिंताओं ने अधिनियम को लागू करने में पुलिस की भूमिका के साथ-साथ उपयुक्त प्राधिकारियों में निहित जाँच और गिरफ्तारी की शक्तियों पर अधिक स्पष्टता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
  • दोषसिद्धि दर में वृद्धि:
    • PCPNDT अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की कम दर एक सतत् चुनौती रही है और अदालत की टिप्पणी लिंग-चयनात्मक गर्भपात से संबंधित मामलों में दोषसिद्धि दर बढ़ाने में मदद कर सकती है।

प्रसवपूर्व निदान और लिंग-चयनात्मक गर्भपात से जुड़े नैतिक मुद्दे :

  • अधिकारों और मानवीय गरिमा का उल्लंघन: लिंग-चयनात्मक गर्भपात लैंगिक भेदभाव एवं महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक रूप है जो उनके जीवन, सम्मान और समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
    • यह मानव जीवन के मूल्य और गरिमा तथा मानव समाज की विविधता को भी कमज़ोर करता है।
  • सामाजिक समस्याओं में वृद्धि: समाज पर इसके प्रतिकूल परिणाम देखे जाते हैं जैसे- विषम लिंगानुपात, बढ़ती तस्करी और महिलाओं के खिलाफ हिंसा, पुरुषों के लिये विवाह की संभावनाएँ कम होना आदि।
    • यह गैर-चिकित्सा उद्देश्यों के लिये प्रसवपूर्व निदान के उपयोग और अजन्मे बच्चे के प्रति माता-पिता और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की ज़िम्मेदारी को लेकर नैतिक प्रश्न भी उठाता है।
  • हेल्थकेयर तक पहुँच: प्रसवपूर्व निदान और लिंग-चयनात्मक गर्भपात मौजूदा स्वास्थ्य असमानता और अन्य असमानताओं को बढ़ा सकता है, विशेष रूप से हाशिये पर रहने वाले उन समुदायों के लिये जिनकी स्वास्थ्य सेवा और जानकारी तक सीमित पहुँच हो सकती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न:

मेन्स:

प्रश्न. आप उन आँकड़ों की व्याख्या कैसे करेंगे जो दिखाते हैं कि अनुसूचित जातियों के बीच लिंगानुपात की तुलना में भारत में जनजातियों में लिंगानुपात महिलाओं के लिये अधिक अनुकूल है? (2015)

स्रोत: द हिंदू

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