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जैव विविधता और पर्यावरण

पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद 2023

  • 09 May 2023
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जलवायु वित्त, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), ग्लोबल स्टॉकटेक, पीटर्सबर्ग संवाद

मेन्स के लिये:

जलवायु वित्त और इसका महत्त्व, जलवायु परिवर्तन की राजनीति, संवेदनशील समुदायों एवं देशों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

चर्चा में क्यों?

जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात, जो कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (United Nations Framework Convention on Climate Change- UNFCCC) के पक्षकारों के 28वें सम्मेलन (COP28) की मेज़बानी कर रहे हैं, ने 1-2 मई, 2023 को बर्लिन, जर्मनी में जलवायु परिवर्तन पर पीटर्सबर्ग संवाद आयोजित किया। 

पीटर्सबर्ग संवाद: 

  • पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (United Nations Climate Change Conferences- COP) से पहले आयोजित एक वार्षिक उच्च स्तरीय राजनीतिक एवं अंतर्राष्ट्रीय मंच है।
  • इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में जर्मनी की पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल ने की थी।
  • इस फोरम का उद्देश्य पक्षकारों के जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में सफल वार्ताओं की तैयारी करना है
  • इसका केंद्रीय लक्ष्य बहुपक्षीय जलवायु वार्ताओं और राज्यों के बीच विश्वास को मज़बूत करना है।
  • यह संवाद जलवायु अनुकूलन, जलवायु वित्त और नुकसान एवं क्षति से निपटने पर केंद्रित है।

प्रमुख बिंदु 

  • स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकता: 
  • वैश्विक नवीकरणीय लक्ष्य: 
    • जर्मनी के विदेश मंत्री ने अगले जलवायु सम्मेलन में नवीकरणीय ऊर्जा के संभावित वैश्विक लक्ष्य को लेकर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिये ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में त्वरित कटौती करने की आवश्यकता पर बल दिया।
  • जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से कम करना: 
    • COP28 के अध्यक्ष ने वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने और उसके बाद वर्ष 2040 तक दोगुना करने का आह्वान किया। उन्होंने प्रतिभागी देशों से नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता निर्माण में तेज़ी लाने तथा जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से कम करते हुए व्यवहार्य एवं लागत प्रभावी शून्य-कार्बन विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।
  • जलवायु वित्त की स्थिति: 
    • विकसित देशों ने वर्ष 2009 में COP15 के दौरान वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करने का वादा किया था और वे ऐसा करते आए हैं।
      • हालाँकि हाल ही के एक अनुमान के मुताबिक, अकेले उभरते बाज़ारों के लिये वर्ष 2030 तक सालाना 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जलवायु वित्त की जरूरत है, इससे पता चलता है कि वित्तीय क्षतिपूर्ति की तत्काल आवश्यकता है।
  • वैश्विक वित्तीय प्रणाली में तत्काल परिवर्तन आवश्यक: 
    • उपरोक्त संवाद में वैश्विक वित्तीय प्रणाली में तत्काल परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित किया गया ताकि विश्व के सबसे जलवायु सुभेद्य देशों के लिये जलवायु वित्त का प्रबंधन किया जा सके।
      • वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का बोझ गरीब देशों पर नहीं डालना चाहिये क्योंकि वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा के लिये वे सबसे कम ज़िम्मेदार हैं।
  • ग्लोबल स्टॉकटेक: 
    • वर्ष 2023 ग्लोबल स्टॉकटेक का वर्ष है, जिसका उद्देश्य यह आकलन करना है कि क्या मौजूदा प्रयास हमें पेरिस समझौते में निर्धारित उद्देश्यों तक पहुँचने में सक्षम बनाएंगे।
      • पिछले दो वर्षों से रिपोर्ट पर कार्य चल रहा है और इसके सितंबर 2023 में प्रकाशित होने का अनुमान है।
        • केंद्रीय मंत्री भारतीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कहा कि पहले ग्लोबल स्टॉकटेक के नतीजे इस बात पर केंद्रित होने चाहिये कि कैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, कार्रवाई और प्रतिक्रियाएँ विकासशील देशों की विकासात्मक प्राथमिकताओं पर असर डालती हैं, जिसमें गरीबी उन्मूलन भी शामिल है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों और उन्नत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अगले दौर को सूचित करने के लिये स्थायी जीवनशैली तथा टिकाऊ खपत पर एक संदेश देने की कोशिश करनी चाहिये।

जलवायु परिवर्तन और हरित ऊर्जा के लिये भारत की पहल:

  • जलवायु परिवर्तन के लिये राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCC):
    • इसे वर्ष 2015 में भारत के विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की लागत को पूरा करने हेतु स्थापित किया गया था।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष:
    • यह कोष स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये बनाया गया था और इसे उद्योगों द्वारा कोयले के उपयोग पर लगने वाले प्रारंभिक कार्बन कर के माध्यम से वित्तपोषित किया गया था।
  • यह एक अंतर-मंत्रालयी समूह द्वारा शासित है जिसका अध्यक्ष वित्त सचिव होता है।
    • इसका जनादेश जीवाश्म और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षेत्रों में नवीन स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अनुसंधान एवं विकास का वित्तपोषण करना है।
  • राष्ट्रीय अनुकूलन कोष:
    • इस निधि की स्थापना वर्ष 2014 में आवश्यकता और उपलब्ध धन के बीच के अंतर को कम करने के उद्देश्य से 100 करोड़ रुपए के कोष के साथ की गई थी।
    • यह कोष पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत संचालित है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनो में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016) 

  1. इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 में लागू होगा।  
  2. यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2ºC या कोशिश करे की 1.5ºC से भी अधिक न होने पाए।
  3. विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता हेतु 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: (b) 


मेन्स:

प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मलेन (यू.एन.एफ.सी.सी.सी.) के सी.ओ.पी. के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई वचनबद्धताएँ क्या हैं? (2021) 

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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