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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

परमाणु ऊर्जा और जलवायु

  • 01 Dec 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट (GCP) द्वारा प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार, वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2021 में 4.9% के स्तर तक बढ़ सकता है। यह अध्ययन जलवायु संकट से निपटने के लिये दुनिया के प्रयासों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

  • 40% की हिस्सेदारी के साथ ऊर्जा क्षेत्र ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक बना हुआ है। इस संदर्भ में परमाणु ऊर्जा को एक गैर-प्रदूषणकारी विकल्प के रूप में देखा जाता है।
  • हालाँकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये परमाणु ऊर्जा को जीवाश्म ईंधन में बदलने की राय पर वैज्ञानिक समुदाय विभाजित है।

प्रमुख बिंदु

  • परमाणु ऊर्जा के लाभ:
    • गैर-बाधित बिजली आपूर्ति: पवन एवं सौर जैसी अक्षय ऊर्जा की एक समस्या यह है कि वे केवल तभी बिजली पैदा करते हैं जब हवा चल रही हो या सूरज चमक रहा हो।
      • जबकि परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा का एक नियमित स्रोत है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा संयंत्र एक वर्ष या उससे अधिक समय तक बिना किसी रुकावट या रखरखाव के संचालित हो सकते हैं, जिससे यह ऊर्जा का अधिक विश्वसनीय स्रोत बन जाता है।
    • संचालन की कम लागत: परमाणु ऊर्जा संयंत्र, कोयले या गैस की तुलना में अधिक मितव्ययी होते हैं।
      • यह अनुमान लगाया गया है कि रेडियोधर्मी ईंधन के प्रबंधन और परमाणु संयंत्रों के निपटान जैसी लागतों में भी एक कोयला संयंत्र के 33% से 50% और गैस संयुक्त चक्र संयंत्र के 20% से 25% के बीच खर्च होता है।
    • पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करना: वर्ष 2015 में पेरिस समझौते को अपनाने के साथ सभी देशों के लिये यह आवश्यक है कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करें और सदी के अंत तक वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित रखें।
      • जलवायु संबंधी वादों को पूरा करने में परमाणु ऊर्जा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  • परमाणु ऊर्जा से संबंधित समस्याएँ:
    • परमाणु ऊर्जा उत्सर्जन-मुक्त नहीं है: बिजली उत्पादन की प्रक्रिया के आधार पर या परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पूरे जीवन चक्र को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है परमाणु ऊर्जा भी CO2 उत्सर्जन करती है।
      • उदाहरण के लिये ‘संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (IPCC) द्वारा वर्ष 2014 में जारी एक रिपोर्ट में प्रति किलोवाट-घंटे (kWh) के बराबर CO2 के 3.7 से 110 ग्राम तक का अनुमान लगाया गया था।
      • इसके अलावा कड़े सुरक्षा नियमों के कारण नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्माण के दौरान पिछले दशकों में निर्मित संयंत्र की तुलना में अधिक CO2 उत्पन्न करते हैं।
    • अन्य नवीकरणीय विकल्पों की तुलना में खराब: यदि एक परमाणु संयंत्र के पूरे जीवन चक्र को गणना में शामिल किया जाता है, तो परमाणु ऊर्जा निश्चित रूप से कोयले या प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से बेहतर है।
      • हालाँकि अक्षय ऊर्जा की तुलना में तस्वीर काफी अलग है।
      • कई आँकड़ों के अनुसार, परमाणु ऊर्जा फोटोवोल्टिक सौर पैनल सिस्टम, पवन और जल विद्युत की तुलना में कई गुना अधिक प्रति किलोवाट-घंटे CO2 छोड़ती है।
    • उच्च प्रारंभिक लागत: परमाणु ऊर्जा संयंत्र पवन या सौर ऊर्जा से लगभग चार गुना महँगे होते हैं और निर्माण में पाँच गुना अधिक समय लेते हैं।
      • इसके अलावा परमाणु ऊर्जा उपलब्ध होने में बहुत अधिक समय लगता है (पहुँचने में लगने वाला समय)।
      • इस प्रकार परमाणु ऊर्जा को जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने योग्य प्रभाव डालने के लिये उच्च इनपुट की आवश्यकता होती है।
    • परमाणु ऊर्जा पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: परमाणु ऊर्जा भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुई है।
      • वैश्विक तापमान के बढ़ने के दौरान कई परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को पहले ही अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है या ग्रिड को बंद करना पड़ा है।
      • इसके अलावा परमाणु ऊर्जा संयंत्र अपने रिएक्टरों को ठंडा करने के लिये आस-पास के जलस्रोतों पर निर्भर हैं और कई नदियों के सूखने के साथ पानी के स्रोत समाप्त हो गए हैं।
    • परमाणु दुर्घटना का खतरा: परमाणु विरोधी प्रचारक हाल के समय की तीन प्रमुख परमाणु मंदी, वर्ष 1979 में थ्री माइल आइलैंड, वर्ष 1986 में चर्नोबिल और हाल ही में 2011 में फुकुशिमा का प्रचार करेंगे।
      • इन परमाणु संयंत्रों के लिये सभी सुरक्षा उपायों के बावजूद विभिन्न कारकों के कारण वे ठंडे बस्ते में डाल दिये गए, जो कि पर्यावरण और स्थानीय निवासियों के लिये विनाशकारी थे तथा जिन्हें प्रभावित क्षेत्रों से पलायन करना पड़ा था।
    • न्यूक्लियर वेस्ट: न्यूक्लियर पावर का एक साइड इफेक्ट उसके द्वारा पैदा किये जाने वाले न्यूक्लियर वेस्ट की मात्रा है।
      • परमाणु अपशिष्ट का जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है, उदाहरण के लिए कैंसर के विकास का कारण बन सकता है, या जानवरों और पौधों की कई पीढ़ियों के लिये आनुवंशिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।

भारत में परमाणु ऊर्जा की स्थिति:

  • भारत ने बिजली उत्पादन के उद्देश्य से परमाणु ऊर्जा के दोहन की संभावना का पता लगाने के लिये सक्रिय रूप से कदम बढ़ाया है।
  • इस दिशा में 1950 के दशक में होमी भाभा द्वारा त्रिस्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तैयार किया गया था।
  • परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 को भारतीय परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों में परमाणु ईंधन के रूप में उपयोग करने की अच्छी क्षमता वाले दो प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्त्वों यूरेनियम और थोरियम के उपयोग के निर्धारित उद्देश्यों के साथ तैयार और कार्यान्वित किया गया था।

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आगे की राह

  • अत्यधिक लागत, पर्यावरणीय परिणाम और सार्वजनिक समर्थन की कमी आदि परमाणु ऊर्जा के खिलाफ तर्क प्रस्तुत किये गए। 
    • हालाँकि परमाणु ऊर्जा के अपने लाभ भी हैं।
    • इसलिये देशों को जहाँ भी संभव हो अक्षय ऊर्जा के मिश्रण के उपयोग पर विचार करना चाहिये।
  • थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा को यथाशीघ्र व्यवहार्य बनाया जाना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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