इंदौर शाखा: IAS और MPPSC फाउंडेशन बैच-शुरुआत क्रमशः 6 मई और 13 मई   अभी कॉल करें
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

नेपाल के नए मानचित्र को लेकर संविधान संशोधन पारित

  • 16 Jun 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये

सुगौली संधि, विभिन्न स्थानों की भौगोलिक अवस्थिति

मेन्स के लिये

अंतर्राष्ट्रीय विवादों को हल करने में कूटनीतिक संवाद की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेपाल की संसद के निचले सदन (Lower House) ने नेपाल के अद्यतित (Updated) राजनीतिक मानचित्र को संवैधानिक मान्यता देने के लिये द्वितीय संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है, उल्लेखनीय है कि इस मानचित्र में उत्तराखंड (भारत) के कुछ हिस्सों को नेपाली क्षेत्र के रूप में प्रदर्शित किया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • गौरतलब है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था, जिसका विरोध करते हुए नेपाल ने 20 मई को अपने नए नक्शे का अनावरण किया था।
  • इससे  पूर्व भी जब भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने के बाद अपना नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था तो भी नेपाल ने काफी विरोध किया था।
  • नेपाल के अनुसार, भारत को 1950 के दशक में इस क्षेत्र में सेना तैनात करने की अनुमति दी गई थी, किंतु बाद में भारत ने इस क्षेत्र से अपनी सेना हटाने से इनकार कर दिया, जिसके कारण नेपाल को यह कदम उठाना पड़ा।

विवाद

  • उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया था, जिसमें उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को नेपाल का हिस्सा बताया गया था।
  • भारत ने नेपाल के नवीन मानचित्र को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि नेपाल के नए मानचित्र में देश के क्षेत्र का अनुचित रूप से विस्तार किया गया है, जो कि ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है।
  • भारत के अनुसार, नेपाल का कृत पूर्णतः एकपक्षीय है और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से शेष सीमा मुद्दों को हल करने के लिये द्विपक्षीय समझौते के विपरीत है।
  • नेपाल के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली नदी के पूर्व में अवस्थित सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं, भारत इस क्षेत्र को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा मानता है।
    • 1 नवंबर, 1814 को अंग्रेज़ों ने नेपाल के विरोध युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध आगामी दो वर्षों तक चला और वर्ष 1815 तक ब्रिटिश सेना ने गढ़वाल और कुमाऊँ से नेपाली सेना को बाहर निकल दिया।
    • एक वर्ष बाद (वर्ष 1816) में सुगौली संधि पर हस्ताक्षर के साथ युद्ध समाप्त हो गया। इस संधि के तहत नेपाल की सीमाओं का निर्धारण किया गया, जो कि आज भी मौजूद है।

कालापानी

  • कालापानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले के पूर्वी हिस्से में स्थित एक क्षेत्र है। यह क्षेत्र उत्तर में चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ अपनी सीमा साझा करता है, वहीं पूर्व और दक्षिण में इसकी सीमा नेपाल से लगती है।
  • इस क्षेत्र का प्रशासन भारत द्वारा किया जाता है, किंतु नेपाल ऐतिहासिक और भौगोलिक कारणों से इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।
  • यह क्षेत्र नेपाल और भारत के बीच सबसे बड़ा क्षेत्रीय विवाद है, जिसमें कम-से-कम 37,000 हेक्टेयर भूमि शामिल है।

भारत-नेपाल संबंध और मौजूदा संशोधन का प्रभाव

  • नेपाल, भारत का एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देश है और सदियों से चले आ रहे भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंधों के कारण नेपाल भारत की विदेश नीति में भी विशेष महत्त्व रखता है।
  • भारत और नेपाल के बीच सीमा पार लोगों की मुक्त आवाजाही की एक लंबी परंपरा रही है।
  • भारत और नेपाल हिंदू धर्म एवं बौद्ध धर्म के संदर्भ में समान संबंध साझा करते हैं, उल्लेखनीय है कि बुद्ध का जन्मस्थान लुम्बिनी नेपाल में है और उनका निर्वाण स्थान कुशीनगर भारत में स्थित है। 
  • दोनों देशों के बीच 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है, जिससे भारत के पाँच राज्य- सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं।
  • भारत और नेपाल के संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से काफी सुगम रहे हैं, किंतु हाल के दिनों में पैदा हुए विवादों पर नजर डालें तो ज्ञात होता है कि धीरे-धीरे दोनों देशों के संबंधों में तनाव की स्थिति पैदा हो रही है।
  • नेपाल की संसद के निचले सदन द्वारा पारित हालिया संशोधन ने दोनों देशों के संबंधों को एक नए मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के नए मानचित्र का नेपाल और भारत के संबंधों पर काफी अधिक प्रभाव पड़ेगा।
  • नेपाल के जानकार मानते हैं कि इस संशोधन के साथ ही भारत-नेपाल सीमा वार्ता अब और अधिक जटिल हो जाएगी, क्योंकि सचिव स्तर के अधिकारियों को संविधान के प्रावधानों पर बातचीत करने का कोई अधिकार नहीं है।

आगे की राह

  • नेपाल के साथ भारत के संबंधों के महत्त्व को देखते हुए भारत को इस मामले को निपटाने के लिये पहल करने में देरी नहीं करनी चाहिये।
  • सीमा पार लोगों की मुक्त आवाजाही को देखते हुए नेपाल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है, ऐसे में नेपाल के साथ स्थिर और मैत्रीपूर्ण संबंध एक अनिवार्य शर्त है जिसे भारत द्वारा नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • आवश्यक है कि विभिन्न सीमा विवादों को एक साथ एक मंच पर आकर कूटनीतिक माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया जाए, क्योंकि एकपक्षीय कार्यवाही किसी भी विवाद को सुलझाने का एक उपाय नहीं हो सकती है।

स्रोत: द हिंदू

close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2