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प्रचार के अधिकारों की जटिलताओं की समझ

  • 09 Oct 2023
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्रचार अधिकार, डीपफेक टेक्नोलॉजी, निषेधाज्ञा, वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

मेन्स के लिये:

प्रचार अधिकारों के पक्ष और विपक्ष में तर्क

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश जारी किया है, जिसमें 16 संस्थाओं को अनधिकृत व्यावसायिक लाभ के लिये बॉलीवुड अभिनेताओं के नाम, छवि, वाक् और विशेषता सहित व्यक्तित्व का दुरुपयोग करने से रोका गया है।

यह मामला भारत में पहला उदाहरण है जहाँ छवि विरूपण और प्रसार से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिये प्रचार के अधिकारों की जाँच की जा रही है।

प्रचार का अधिकार:

  • परिचय:
    • प्रचार का अधिकार एक कानूनी अवधारणा है जो किसी व्यक्ति के नाम, छवि, विशिष्टता या उसकी पहचान के अन्य पहलुओं के व्यावसायिक उपयोग से नियंत्रण और लाभ के अधिकार की रक्षा करती है।
    • ये अधिकार दूसरों को उनकी अनुमति के बिना व्यावसायिक उद्देश्य हेतु किसी व्यक्ति की पहचान का उपयोग करने से रोकने के लिये डिज़ाइन किये गए हैं।
      • हालाँकि वर्तमान में भारत में प्रचार के अधिकार की अवधि निर्धारित करने वाला कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
  • पक्ष में तर्क:
    • व्यक्तिगत पहचान की सुरक्षा: किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान की रक्षा करने तथा यह सुनिश्चित करने के लिये प्रचार अधिकार आवश्यक हैं कि उनका इस पर नियंत्रण हो कि उनके नाम एवं समानता का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिये कैसे किया जाता है
      • एआई-जनित डीप फेक एवं सिंथेटिक मीडिया के युग में यह अधिकार प्रमुख भूमिका निभाता है। ये प्रौद्योगिकियाँ अत्यधिक विश्वसनीय वीडियो व छवियां बनाने में सक्षम हैं जो ऐसा प्रतीत करा सकती हैं जैसे कि कोई सेलिब्रिटी उन गतिविधियों को स्वयं से कर रहा है जो कि वास्तव में उसने नहीं की हैं।
      • यह अधिकार व्यक्तियों को उनकी गरिमा एवं गोपनीयता बनाए रखने में मदद करता है।
    • आर्थिक प्रोत्साहन: प्रचार अधिकार व्यक्तियों, विशेषकर विख्यात हस्तियों को उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व एवं प्रसिद्धि में निवेश करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।
      • यह लोगों को मनोरंजन, खेल तथा विज्ञापन जैसे क्षेत्रों में कॅरियर बनाने के लिये प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे समग्र रूप से अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
    • स्पष्टता एवं उत्तरदायित्व: किसी व्यक्ति की पहचान का अनधिकृत उपयोग कब उल्लंघन बनता है, इसका मूल्यांकन करने के लिये एक सटीक रूपरेखा प्रचार के अधिकार द्वारा बनाई गई है। विवादों को सुलझाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये यह कानूनी स्पष्टता आवश्यक है।
    • उपभोक्ताओं की सुरक्षा: प्रचार अधिकार उपभोक्ताओं को यह विश्वास करने से रोककर कि कोई सेलिब्रिटी विज्ञापन में दिखाए गए किसी उत्पाद या सेवा का समर्थन नहीं कर रहा है उन्हें भ्रामक रणनीति से बचा सकते हैं ।
      • इससे विज्ञापन में विश्वास बनाए रखने में सहायता मिलती है।
  • प्रचार अधिकारों के विरुद्ध तर्क:
    • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: प्रचार अधिकारों को कभी-कभी अभिव्यक्ति और वाक् स्वतंत्रता को सीमित करने के रूप में देखा जा सकता है। वे विभिन्न रचनात्मक, कलात्मक या आलोचनात्मक कार्यों में किसी व्यक्ति की छवि या समानता के उपयोग को प्रतिबंधित कर सकते हैं, भले ही गुमराह करने या हानि पहुँचाना उनका उद्देश्य न हो।
    • मशहूर सेलिब्रिटीज़ को अधिक धनराशि: आलोचकों का तर्क है कि कई मशहूर सेलिब्रिटीज़ को उनके कार्य, समर्थन और उपस्थिति के लिये पहले से ही अत्यधिक धनराशि दे दी जाती है।
      • प्रचार अधिकारों के विस्तार को दोहरी गिरावट या पहले से ही धनी व्यक्तियों को अत्यधिक वित्तीय लाभ प्रदान करने के रूप में देखा जा सकता है।
    • जटिलता और स्पष्टता का अभाव: प्रचार अधिकारों का प्रयोग जटिल हो सकता है, जिससे कानूनी विवाद एवं अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है
      • यह निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है कि कब किस व्यक्ति की पहचान का उपयोग उल्लंघन की सीमा पार कर सकता है, जो संभावित रूप से उसके वैध उपयोग को रोकता है।
      • इसके अलावा भारत में प्रचार अधिकार अक्सर निगमों को हस्तांतरणीय होते हैं। इन अधिकारों का अत्यधिक विस्तार करने से मशहूर हस्तियों और निगमों को सार्वजनिक कल्पना और सांस्कृतिक उत्पादों पर अनुचित नियंत्रण मिल सकता है।

आगे की राह

  • कानूनों को स्पष्ट और सुसंगत बनाना: लोगों के अधिकारों की रक्षा और रचनात्मकता को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाने के लिये न्याय क्षेत्रों को प्रचार अधिकारों को स्पष्ट और सुसंगत बनाना चाहिये।
    • इसमें इन अधिकारों के दायरे और अवधि को परिभाषित करना, साथ ही उल्लंघन के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना शामिल हो सकता है।
  • आवश्यकतानुरूप उपाय: समस्याओं के समाधान के लिये अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जाना चाहिये। न्यायालय प्रत्येक उपयोग की विशिष्ट प्रकृति तथा प्रभाव पर सावधानीपूर्वक विचार करते हुए तद्नुसार उपाय कर सकते हैं।
    • व्यापक निषेधाज्ञा के बजाय न्यायालय ऐसे उपाय लागू कर सकते हैं जो अभिव्यक्ति के वैध रूपों को जारी रखने की अनुमति देते हुए होने वाले नुकसान को कम करते हों।
  • एआई विनियमन: विशेष रूप से AI-जनित डीप फेक और सिंथेटिक मीडिया को लक्षित करने वाले नियमों को विकसित और लागू करना।
    • इसमें AI द्वारा तैयार की गई सामग्रियों को इंगित करने के लिये वॉटरमार्किंग या लेबलिंग के अन्य रूपों की आवश्यकता शामिल हो सकती है।
    • ऐसे विनियमों को कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित किये बिना नुकसान को कम करने के लिये भी डिज़ाइन किया जाना चाहिये।
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