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खाद्य तेल पर राष्ट्रीय मिशन

  • 31 Aug 2021
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

खाद्य तेल पर राष्ट्रीय मिशन- ऑयल पाम, न्यूनतम समर्थन मूल्य, केंद्र प्रायोजित योजना

मेन्स के लिये:

खाद्य तेल पर राष्ट्रीय मिशन तथा पाम ऑयल बागानों को लगाने से पर्यावरणीय हानि

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री ने पाँच वर्ष की अवधि में 11,000 करोड़ रुपए से अधिक के निवेश के साथ ‘खाद्य तेल पर राष्ट्रीय मिशन’- ऑयल पाम (NMEO-OP) की घोषणा की।

  • हालाँकि कुछ पर्यावरणविदों ने पाम ऑयल के बागानों को लगाने के विनाशकारी प्रभाव पर चिंता जताई है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • NMEO-OP एक नई केंद्र प्रायोजित योजना है। वर्ष 2025-26 तक पाम ऑयल के लिये अतिरिक्त 6.5 लाख हेक्टेयर का प्रस्ताव है।
    • इसमें 2025-26 तक पाम ऑयल की खेती के क्षेत्र को 10 लाख हेक्टेयर और 2029-30 तक 16.7 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना शामिल होगा।
    • पाम ऑयल किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी और उन्हें मूल्य एवं व्यवहार्यता सूत्र के तहत पारिश्रमिक मिलेगा।
    • व्यवहार्यता सूत्र एक न्यूनतम समर्थन मूल्य है और सरकार इसे अब कच्चे पाम ऑयल (सीपीओ) मूल्य के 14.3% पर तय करेगी।
      • अंतत: यह बढ़कर 15.3% हो जाएगा।
    • योजना का एक अन्य फोकस क्षेत्र इनपुट/हस्तक्षेपों के समर्थन में पर्याप्त वृद्धि करना है।
    • पुराने बागानों को उनके कायाकल्प के लिये विशेष सहायता दी जाएगी।
  • विशेष ध्यान:
    • इस योजना का विशेष ध्यान भारत के उत्तर-पूर्वी (NE) राज्यों तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इन क्षेत्रों की अनुकूल मौसमी स्थिति के कारण होगा।
    • इस उद्योग को पूर्वोत्तर और अंडमान क्षेत्रों में आकर्षित करने के लिये उच्च क्षमता की आनुपातिक वृद्धि के साथ 5 करोड़ रुपए प्रति घंटा (मिलियन टन प्रति हेक्टेयर) का प्रावधान किया जाएगा।
  • उद्देश्य:
    • घरेलू खाद्य तेल की कीमतों का दोहन करना जो कि महँगे पाम ऑयल के आयात से तय होती हैं और खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनना।
    • वर्ष 2025-26 तक पाम ऑयल का घरेलू उत्पादन तीन गुना बढ़ाकर 11 लाख मीट्रिक टन करना।
  • योजना का महत्त्व:
    • किसानों की आय में वृद्धि:
      • इससे आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों को बाज़ार में नकदी संबंधी मदद करने से पाम ऑयल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने की उम्मीद है।
    • पैदावार में वृद्धि और आयात में कमी:
      • भारत विश्व में वनस्पति तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इसमें से पाम ऑयल का आयात उसके कुल वनस्पति तेल आयात का लगभग 55% है।
        • यह इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल, ब्राज़ील और अर्जेंटीना से सोया तेल तथा मुख्य रूप से रूस व यूक्रेन से सूरजमुखी तेल का आयात करता है।
      • भारत में 94.1% पाम ऑयल का उपयोग खाद्य उत्पादों में किया जाता है, विशेष रूप से खाना पकाने के लिये। यह पाम ऑयल को भारत की खाद्य तेल अर्थव्यवस्था हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है।
  • चिंताएँ
    • जनजातीय समुदायों की भूमि पर प्रभाव:
      • ल पॉम एक लंबी अवधि के साथ पानी की खपत वाली, मोनोकल्चर फसल है, अतः इसकी लंबी अवधि छोटे किसानों के लिये अनुपयुक्त होती है और ऑल पॉम के लिये भूमि उत्पादकता तिलहन की तुलना में अधिक होती है, जो ऑल पॉम की खेती के लिये अधिक भूमि प्रयोग करने पर एक सवाल उत्पन्न करती है।
        • दक्षिण-पूर्व एशिया में ऑल पॉम/ताड़ के तेल के वृक्षारोपण ने वर्षावनों के विशाल भूभाग की जगह ले ली है।
      • यह जनजातीय/आदिवासियों को भूमि के सामुदायिक स्वामित्व से जुड़ी उनकी पहचान से अलग कर सकता है और "सामाजिक ताने-बाने को अस्त-व्यस्त कर सकता है"।
    • वन्यजीवों के लिये खतरा:
      •  "जैव विविधता हॉटस्पॉट और पारिस्थितिक रूप से नाजुक" क्षेत्र इसके मुख्य फोकस क्षेत्र हैं, ऑल पॉम के बागान लगाने से वन क्षेत्र में कमी होगी जिससे लुप्तप्राय वन्यजीवों (Endangered Wildlife) के आवास नष्ट होने का खतरा उत्पन्न होगा।
    • आक्रामक प्रजाति:
      •  पाम/ताड़ एक आक्रामक प्रजाति है जो पूर्वोत्तर भारत का प्राकृतिक वन उत्पाद नहीं है और यदि इसे गैर-वन क्षेत्रों में भी उगाया जाता है तो जैव विविधता के साथ-साथ मिट्टी की स्थिति पर इसके प्रभाव का विश्लेषण किया जाना चाहिये।
        • आक्रामक प्रजातियांँ देशज प्रजातियांँ नहीं हैं जो देशज/स्थानिक जैव विविधता के लिये गंभीर खतरा बनकर एक नए पारिस्थितिकी तंत्र में फैलती हैं और उसे नुकसान पहुँचा सकती हैं। वे स्थानीय प्रजातियों और वन्यजीवों की वृद्धि में बाधा उत्पन्न करती हैं।
    • स्वास्थ्य से संबंधित चिंताएँ:
      • पाम ऑयल के  प्रति पेड़ को प्रतिदिन 300 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, साथ ही उन क्षेत्रों में उच्च कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता होती है जहांँ यह एक देशी फसल नहीं है, जिससे उपभोक्ता स्वास्थ्य संबंधी चिंताएंँ भी पैदा होती हैं।
    • किसानों को उचित मूल्य की प्राप्ति नहीं:
      • पाम ऑयल की खेती में सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा ताज़ेफलों के गुच्छों (fresh fruit Bunches- FFBs) का किसानों को उचित मूल्य न मिल पाना है।
      • पाम ऑयल के ताज़े फलों के गुच्छे (FFBs) अत्यधिक भंगुर/नाज़ुक होते हैं जिन्हें कटाई के चौबीस घंटे के भीतर संसाधित (Processed) करने की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • यदि इसी तरह की सब्सिडी और समर्थन उन तिलहनों को दिया जाता है जो भारत के लिये स्वदेशी हैं तथा  शुष्क भूमि पर भी कृषि के लिये उपयुक्त हैं, तो पाम ऑयल पर निर्भरता के बिना भी आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सकती है।
  • यदि किसान पाम ऑयल की खेती करने के इच्छुक हैं और सरकार इसे प्रोत्साहित करती है तो कृषि भूमि पर पाम आयल के वृक्षों को उगाना एक समाधान होगा।
  • अंत में, मिशन ऑयल पाम की सफलता कच्चे पाम तेल पर आयात शुल्क पर भी निर्भर करेगी।
    • वर्ष 2012 में यह सिफारिश की गई थी कि जब भी कच्चे पाम तेल का आयात मूल्य 800 अमेरिकी डॉलर प्रति टन से नीचे आता है, तो आयात शुल्क को बढ़ाने की आवश्यकता होगी। 
  • इस फसल से आंध्र प्रदेश में किसान समुदायों के जीवन में जो परिवर्तन आया है, वह अन्य संभावित राज्यों में भी इसका अनुकरण करने में मदद कर सकता है। एक मज़बूत और दीर्घकालिक नीति तंत्र इस फसल को पूरे भारत में आवश्यक रूप से प्रोत्साहन देगा।

स्रोत: द हिंदू

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