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जैवविविधता और पर्यावरण

घास के मैदान जलाने से अकशेरुकी जीवों को हानि

  • 29 Jul 2019
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

शोधकर्त्ताओं द्वारा एराविकुलम नेशनल पार्क (Eravikulam National Park- ENP) में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, स्तनपायी (Ungulates) जीवों (विशेष रूप से नीलगिरी ताहर) के संरक्षण के लिये बड़े घास के मैदानों के निर्धारित क्षेत्रों को जलाना अर्थात् उनके लिये स्थान का प्रबंध करना वहाँ मौजूद अकशेरुकी जीवों एवं टिड्डों के लिये बेहद हानिकारक है।

प्रमुख बिंदु

  • घास के मैदान के प्रबंधन के लिये किये जाने वाले प्रयासों में टिड्डे सबसे ज़्यादा संवेदनशील एवं प्रभावित होते हैं।
  • टिड्डे घास के मैदान की गुणवत्ता एवं वृद्धि के सूचक होते हैं।
  • चूँकि टिड्डे घास के मैदानों में एक विशेष प्रकार के घटक से संबंध रखते हैं, ऐसे में घास के मैदान का इस प्रकार प्रबंधन करने से इन पर पड़ने वाले प्रभावों का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
  • स्थानिक और पंखहीन प्राणी/जीव पर्यावरण परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं तथा साथ ही इनके विलुप्त होने का जोखिम सबसे ज़्यादा होता है। इसलिये इस प्रकार के प्रबंधन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अधिक होती है।

घास के मैदान का प्रबंधन

  • परंपरागत रूप से घास के मैदानों का प्रबंधन स्थानीय आदिवासी समुदायों की सहायता से निश्चित समय में कोल्ड बर्निंग (Cold Burning) यानी ठंड के मौसम में इनमें आग लगाकर किया जाता है।
  • उल्लेखनीय है कि नीलगिरि ताहर के आवास क्षेत्र में ऐसा प्रबंधन ब्रिटिश औपनिवेशिक समय से ही किया जा रहा है, हालाँकि अन्य बायोटा पर नीलगिरि ताहर वास के जलने के प्रभाव का कभी भी उल्लेख नहीं किया गया है।

बायोटा: किसी स्थान विशेष में रहने वाले सभी जीवित प्राणी, जिनमें जीव-जंतु एवं पेड़-पौधे सभी शामिल होते हैं।

  • इस प्रबंधन के तहत 90 वर्ग किमी. क्षेत्र में पार्क में 50 हेक्टेयर की ग्रिड बनाकर वहाँ वास करने वाले स्तनपायी जीवों के चारे की व्यवस्था की जाती है।
  • ध्यातव्य है कि घास के मैदान जलाने की इस विधि को परम्बिकुलम टाइगर रिजर्व (Parambikulam Tiger Reserve- PKMTR) में भी इस्तेमाल किया गया था, जो नीलगिरि ताहर का एक अन्य वास स्थल है। यहाँ पर छोटे पैमाने पर (10 मीटर × 10 मीटर) पर ऐसा किया गया था।

प्रभाव

  • चूँकि इस प्रबंधन का लक्ष्य स्तनपायी प्रजातियों की स्थिति में सुधार हेतु चारे का प्रबंधन करना है, इसलिये अन्य समूहों, विशेष रूप से अकशेरुकी जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव की उपेक्षा की जाती है।
  • ध्यातव्य है कि केरल में टिड्डों की लगभग 130 प्रकार की प्रजातियाँ पाई गईं हैं, जिनमें से 54 परम्बिकुलम टाइगर रिजर्व में तथा 18 प्रजातियाँ एराविकुलम नेशनल पार्क में पाई गईं।
  • पिछले कई दशकों से पार्क में घास का प्रबंधन अर्थात् घास को जला देना टिड्डों की संख्या में गिरावट का एक प्रमुख कारण है।

परम्बिकुलम टाइगर रिज़र्व

(Parambikulam Tiger Reserve)

  • भारत में दक्षिणी-पश्चिमी घाटों के नेल्लम्पैथी-अनामलाई पहाड़ियों (Nelliampathy -Anamalai Hills) में एक संरक्षित पारिस्थितिक क्षेत्र है।
  • यह केरल के पालक्काड ज़िले में स्थित है।
  • यह जैव विविधता के गर्म स्थानों में से एक है, जिसमें विभिन्न प्रकार के वास स्थलों में रहने वाले जीव पाए जाते हैं।
  • इसे वर्ष 2009 में 643.66 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्रफल के साथ टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया था, जिसमें 390.89 वर्ग किमी. कोर क्षेत्र और 252.77 वर्ग किमी. बफर क्षेत्र शामिल है।
  • अपनी जैविक समृद्धि के मद्देनज़र वन्यजीवों एवं लैंडस्केप सौंदर्य की प्रचुरता के चलते परम्बिकुलम टाइगर रिज़र्व पश्चिमी घाट के पूरे खंड में सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है।

एराविकुलम नेशनल पार्क

(Eravikulam National Park)

  • यह पार्क केरल राज्य के इडुक्की ज़िले के देविकुलम तालुक में दक्षिणी पश्चिमी घाट के हाई रेंज (कन्नन देवन हिल्स) में स्थित है।
  • इसे वर्ष 1971 तक कन्नन देवन हिल प्रोड्यूस कंपनी (Kannan Devan Hill Produce Company) द्वारा एक गेम रिज़र्व के रूप में चलाया जाता था।
  • केरल सरकार ने वर्ष 1975 में इस क्षेत्र को नीलगिरि ताहर और उसके वास की सुरक्षा के लिये 'एराविकुलम-राजमलाई' वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया।
  • यह भारत के अग्रणी जैव विविधता वाले क्षेत्रों के रूप में जाना जाता है जो वन एवं वन्‍यजीव विभाग के प्रशासन के तहत आता है।

निष्कर्ष

  • शोधकर्त्ताओं द्वारा दिये गए सुझाव के अनुसार, घास के मैदान के इस तरह के प्रबंधन में पाँच साल से अधिक का समयांतराल होना चाहिये। जलाने का निर्धारित क्षेत्र केवल 25 मीटर X 25 मीटर या 50 मीटर X 50 मीटर के छोटे भूखंडों में बनाया जाना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू

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