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खासी उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक, 2021

  • 03 Nov 2021
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

खासी उत्तराधिकार संपति विधेयक,2021,संविधान की 6वी अनुसूची,मेघालय की जनजातियाँ

मेन्स के लिये:

खासी उत्तराधिकार संपति विधेयक,2021 के उद्देश्य और महत्त्व 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में मेघालय में खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (KHADC) ने घोषणा की है कि वह ‘खासी उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक, 2021’ पेश करेगी। इस बिल का उद्देश्य खासी समुदाय में भाई-बहनों के बीच पैतृक संपत्ति का "समान वितरण" करना है।

  • यदि प्रस्तावित विधेयक लागू होता है, तो यह मातृवंशीय खासी जनजाति की विरासत की सदियों पुरानी प्रथा को संशोधित करेगा।

नोट:

  • खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (KHADC) संविधान की छठी अनुसूची के तहत एक निकाय है।
  • इसे कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
  • छठी अनुसूची का अनुच्छेद 12A राज्य विधानमंडल को कानून पारित करने का अंतिम अधिकार देता है।
  • संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय आबादी के अधिकारों की रक्षा के लिये आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान करती है।
  • यह विशेष प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 244 (2) और अनुच्छेद 275 (1) के तहत किया गया है।
  • यह स्वायत्त ज़िला परिषदों ((ADCs) के माध्यम से उन क्षेत्रों के प्रशासन को स्वायत्तता प्रदान करता है, जिन्हें अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार है।

प्रमुख बिंदु:

  • विरासत की मातृवंशीय प्रणाली के बारे में:
    • मेघालय की तीन जनजातियाँ- खासी, जयंतिया और गारो, विरासत की एक मातृवंशीय प्रणाली का अभ्यास करती हैं।
      • इस प्रणाली में वंश और वंश का पता माता के वंश से चलता है।
    • दूसरे शब्दों में बच्चे माँ का उपनाम लेते हैं, पति अपनी पत्नी के घर में चला जाता है और परिवार की सबसे छोटी बेटी (खतदुह) को पैतृक या कबीले की संपत्ति का पूरा हिस्सा सौंपा जाता है।
      • खतदुह भूमि की "संरक्षक" बन जाती है और भूमि से जुड़ी सभी ज़िम्मेदारी लेती है, जिसमें वृद्ध माता-पिता, अविवाहित या निराश्रित भाई-बहनों की देखभाल करना शामिल है।
    • यह विरासत परंपरा केवल पैतृक या कबीले/सामुदायिक संपत्ति पर लागू होती है, जो वर्षों से परिवार के साथ हैं। इसके अलावा स्व-अर्जित संपत्ति भाई-बहनों के बीच समान रूप से वितरित की जा सकती है।
    • इस पारंपरिक व्यवस्था में अगर किसी दंपति की कोई बेटी नहीं है, तो संपत्ति पत्नी की बड़ी बहन और उसकी बेटियों को सौंप दी जाती है।
    • यदि पत्नी की बहन नहीं है, तो आमतौर पर कबीला संपत्ति पर कब्जा कर लेता है।
  • महिला सशक्तीकरण  पर इस प्रणाली का प्रभाव: महिला कार्यकर्ताओं ने अक्सर बताया है कि मेघालय में मातृवंशीय व्यवस्था शायद ही कभी महिलाओं को सशक्त बनाती है। 
    • संरक्षकता संबंधी समस्या : संरक्षकता को अक्सर गलत समझा जाता है क्योंकि इसमें स्वामित्व केवल एक व्यक्ति में निहित होता है, जो कि सबसे छोटी बेटी होती है।
      • यह संरक्षकता वृद्ध माता-पिता, अविवाहित या निराश्रित भाई-बहनों और कबीले के अन्य सदस्यों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी के साथ आती है।
      • इसके अलावा संरक्षक अपने मामा की अनुमति के बिना ज़मीन खरीद या बेच नहीं सकती है।
    • मातृसत्तात्मक: लोग अक्सर मातृसत्तात्मक शब्द यानी जहाँ महिलाएँ प्रमुख के रूप में कार्य करती हैं, को लेकर भ्रमित होते हैं।
      • जहाँ महिलाएँ प्रमुख रूप से कार्य करती हैं, वहाँ महिलाओं को गतिशीलता की स्वतंत्रता और शिक्षा तक आसान पहुँच होती है, लेकिन मेघालय में महिलाएँ निर्णय लेने की भूमिका में नहीं हैं।
      • राजनीति या प्रमुख संस्थानों जैसे सत्ता के पदों पर मुश्किल से कोई महिला है।
  • विधेयक के बारे में:
    • प्रावधान:
      • प्रस्तावित विधेयक में पुरुष और महिला दोनों भाई-बहनों के बीच पैतृक  संपत्ति का ‘समान वितरण करने की परिकल्पना की गई है।
      • विधेयक माता-पिता को यह तय करने का अधिकार देगा कि वे अपनी संपत्ति किसके नाम करना चाहते हैं।
      • यह विधेयक एक गैर-खासी से शादी, जीवनसाथी के रीति-रिवाजों तथा संस्कृति को स्वीकार करने पर भाई-बहन को पैतृक संपत्ति प्राप्त करने से रोकता है।
    • कानून का उद्देश्य संपत्ति के समान वितरण के सिद्धांत पर आधारित आर्थिक सशक्तीकरण है।
    • विधेयक की आवश्यकता: कुछ समूहों ने वर्षों से लागू संपत्ति विरासत की व्यवस्था का विरोध करते हुए कहा है कि यह पुरुषों को ‘विघटित’ करती है और परिवार में सभी बच्चों के बीच समान संपत्ति वितरण के लिये दबाव डालती है।
    • प्रभाव: यह मातृवंशीय खासी जनजाति की विरासत की सदियों पुरानी प्रथा को संशोधित करेगा।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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