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पीएमएफबीवाई से संबंधित मुद्दे

  • 19 Mar 2022
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, PMFBY से बाहर निकलने वाले राज्य।

मेन्स के लिये:

सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप, किसानों की सहायता में ई-प्रौद्योगिकी, PMFBY से संबंधित मुद्दे, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी।

चर्चा में क्यों?

महाराष्ट्र द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) से बाहर निकलने का संकेत दिया गया है, उसने कहा है कि यदि उसके द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह योजना से बाहर हो सकता है।

  • गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड कम दावा अनुपात (Low Claim Ratio) तथा वित्तीय बाधाओं के कारण पहले ही इस योजना से बाहर हो गए हैं।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): 

  • यह केंद्र-राज्य की एक संयुक्त योजना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2016-17 के खरीफ सीज़न के दौरान की गई थी।
  • इसका उद्देश्य किसानों को फसल के नुकसान से बचाना है।
  • केंद्र और राज्य सरकारें प्रीमियम राशि का 95% से अधिक भुगतान करती हैं, जबकि किसान प्रीमियम राशि का 1.5-5% वहन करते हैं।
  • चूँकि प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग किसानों के दावों को एक निर्धारित समयावधि के भीतर निपटाने के लिये किया जाता है, इसलिये किसानों को फसल के नुकसान की रिपोर्ट ऑनलाइन दर्ज़ करने की आवश्यकता होती है और मुआवज़े की राशि सीधे उनके खातों में भुगतान से पहले बीमा कंपनियों द्वारा मान्य होती है।
  • वर्ष 2020 से पहले संस्थागत वित्त प्राप्त करने वाले किसानों के लिये यह योजना अनिवार्य थी, लेकिन इसमें परिवर्तन कर इसे सभी किसानों के लिये स्वैच्छिक बना दिया गया।

PMFBY से संबंधित मुद्दे:

  • राज्यों की वित्तीय बाधाएँ: राज्य सरकारों की वित्तीय बाधाएँ तथा सामान्य मौसम के दौरान कम दावा अनुपात इन राज्यों द्वारा योजना को लागू न करने के प्रमुख कारण हैं।
    • राज्य ऐसी स्थिति से निपटने में असमर्थ हैं जहाँ बीमा कंपनियाँ किसानों को राज्यों और केंद्र से एकत्र किये गए प्रीमियम दर से कम मुआवज़ा देती हैं।
    • राज्य सरकारें समय पर धनराशि जारी करने में विफल रहीं जिसके कारण बीमा क्षतिपूर्ति जारी करने में देरी हुई है।
    • इससे किसान समुदाय को समय पर वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
  • दावा निपटान संबंधी मुद्दे: कई किसान मुआवज़े के स्तर और निपटान में देरी दोनों से असंतुष्ट हैं।
    • ऐसे में बीमा कंपनियों की भूमिका और शक्ति अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योकि कई मामलों में उन्होंने स्थानीय आपदा के कारण हुए नुकसान की जांँच नहीं की जिस वजह से दावों का भुगतान नहीं किया।
  • कार्यान्वयन संबंधी मुद्दे: बीमा कंपनियों द्वारा उन समूहों के लिये बोली लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है जो फसल के नुकसान से प्रभावित हो सकते हैं।
    • बीमा कंपनियाँ अपनी प्रकृति के अनुसार यह कोशिश करती हैं कि जब फसल कम खराब हो तो मुनाफा कमाया जाए।
  • पहचान संबंधी मुद्दे: वर्तमान में PMFBY योजना बड़े और छोटे किसानों के बीच अंतर नहीं करती है तथा इस प्रकार पहचान के मुद्दे को भी सामने लाती है। छोटे किसान सर्वाधिक कमज़ोर वर्ग है।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रस्तावित बदलाव:

  • प्रीमियम में शेयर/हिस्सेदारी:
    • महाराष्ट्र सरकार द्वारा गैर-भुगतान या सामान्य वर्ष के दौरान बीमा कंपनियों से एकत्र किये गए प्रीमियम में हिस्सेदारी का प्रस्ताव किया है।
  • बीड मॉडल:
    • राज्य सरकार द्वारा बीड मॉडल (Beed Model) का आह्वान किया गया जिसे पहली बार वर्ष 2020 की खरीफ फसलों के दौरान प्रयोग किया गया था।
    • इस मॉडल के तहत बीमा कंपनियांँ एकत्र किये गए प्रीमियम के 110% की सीमा तक कवर प्रदान करती हैं।
      • यदि मुआवज़े की राशि इससे अधिक हो जाती है तो राज्य सरकार द्वारा इसे पूरा किया जाएगा।
    • यदि मुआवज़े की राशि एकत्र किये गए प्रीमियम से कम है, तो कंपनी राज्य सरकार को धनराशि का 80% वापस कर देगी और 20% अपने प्रशासनिक खर्चों के लिये रखेगी।
      • मॉडल को सरकार द्वारा संचालित कृषि बीमा कंपनी (Government-Run Agricultural Insurance Company) द्वारा लागू किया गया था।
  • बीमा कंपनियों के लिये जवाबदेही:
    • राज्य द्वारा बीमा कंपनियों से और अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गई है। 
    • किसान नेताओं ने योजना को लागू करते समय आवश्यक बुनियादी ढांँचे की स्थापना और मानव हस्तक्षेप को खत्म करने में मदद हेतु प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिये कहा है।

आगे की राह:

  • बीमा कंपनियों को एक क्लस्टर के लिये करीब तीन साल की बोली लगानी चाहिये ताकि उन्हें अच्छे और बुरे दोनों वर्षों को संभालने का बेहतर मौका मिल सके। खरीफ/रबी सीजन की शुरुआत से पहले बोलियांँ बंद कर दी जानी चाहिये।
  • इसके तहत सब्सिडी देने के बजाय राज्य सरकार को उस धनराशि को नए बीमा मॉडल में निवेश करना चाहिये।
  • बीड मॉडल से राज्य पर सब्सिडी का बोझ कम होगा लेकिन यह देखना होगा कि क्या इससे किसानों को फायदा हो रहा है।

विगत वर्षों के प्रश्न: 

प्रश्न: ‘’आम आदमी बीमा योजना" के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2011)

  1. योजना के तहत बीमा का पात्र सदस्य ग्रामीण भूमिहीन परिवार का मुखिया या परिवार का कमाऊ सदस्य होना चाहिये।
  2. बीमा के पात्र सदस्य की आयु 30 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिये।
  3. बीमित व्यक्ति के अधिकतम दो बच्चों हेतु मुफ्त छात्रवृत्ति का प्रावधान है जो 9वीं से 12वीं कक्षा के छात्र हों।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 
(b) केवल 2 और 3 
(c)  केवल 1 और 3  
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

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